अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम आहत भावना: ‘घूसखोर पंडत’ विवाद की कानूनी पड़ताल
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नीरज पांडे की कंपनी फ्राइडे स्टोरी टेलर्स एलएलपी द्वारा निर्मित और मनोज बाजपेयी अभिनीत यह फ़िल्म एक एक-रात की थ्रिलर है, जो एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी अजय दीक्षित के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे “पंडत” उपनाम दिया गया है। और यहीं से विवाद शुरू होता है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम आहत भावना: ‘घूसखोर पंडत’ विवाद की कानूनी पड़ताल

नेटफ्लिक्स विवाद रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमाओं और बहुल समाज में सामुदायिक गरिमा को लेकर एक संवैधानिक दुविधा में बदल गया है


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नेटफ्लिक्स की आने वाली फ़िल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर उठा विवाद अब किसी एक फ़िल्म के भविष्य तक सीमित नहीं रह गया है। जो विवाद नामकरण पर आपत्तियों से शुरू हुआ था, वह अब रचनात्मक अभिव्यक्ति की सीमाओं, सामुदायिक गरिमा के अर्थ और बहुल समाज में आहत भावनाओं के मध्यस्थ के रूप में अदालतों की भूमिका को लेकर एक व्यापक संवैधानिक बहस में बदल गया है। नीरज पांडे की फ्राइडे स्टोरी टेलर्स एलएलपी द्वारा निर्मित और मनोज बाजपेयी अभिनीत यह फ़िल्म एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी अजय दीक्षित पर आधारित है, जिसे “पंडत” कहा जाता है।

विवाद का केंद्र

यह विवाद घूसखोर, जोकि रिश्वतखोरी का द्योतक है और “पंडत”, जो “पंडित” का बोलचाल का रूप है और सांस्कृतिक रूप से ब्राह्मण समुदाय से जुड़ा माना जाता है, इन दोनों शब्दों के संयोजन से पैदा हुआ है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह का संयोजन एक सामाजिक समूह पर नैतिक भ्रष्टता का आरोप मढ़ता है, जबकि फ़िल्म निर्माताओं का कहना है कि यह किरदार पूरी तरह काल्पनिक और व्यक्तिगत है, और किसी जाति या समुदाय के प्रतिनिधित्व का दावा नहीं करता।

इसके कानूनी परिणाम भी जल्द सामने आए। लखनऊ में दर्ज एक प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं का हवाला दिया गया है, जो वैमनस्य फैलाने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों को दंडित करती हैं। इसके समानांतर, दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग की गई है, जिसमें संविधान के तहत समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लेख किया गया है, साथ ही यह स्वीकार किया गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तिसंगत सीमाएँ लागू होती हैं।

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक जानी-पहचानी संवैधानिक दुविधा है और वो यह है कि बिना लोकतंत्र की मुक्त अभिव्यक्ति के प्रति प्रतिबद्धता को कमजोर किए सरकार अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने में कितनी दूर तक जा सकती है।

अदालतों का मार्गदर्शक सिद्धांत

भारतीय संवैधानिक कानून लंबे समय से यह मानता आया है कि केवल असहजता या विरोध पैदा करने के आधार पर अभिव्यक्ति को रोका नहीं जा सकता। अदालतें लगातार इस बात पर ज़ोर देती रही हैं कि किसी भी प्रतिबंध को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए स्पष्ट और निकटवर्ती खतरे से उचित ठहराया जाना चाहिए, न कि अनुमानित या व्यक्तिपरक आहत भावनाओं के आधार पर।

श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अभिव्यक्ति पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध सीमित और सटीक होने चाहिए — एक ऐसा सिद्धांत जो आज भी सशक्त विमर्श और सामुदायिक आक्रोश के बीच टकराव से जुड़े मामलों में अदालतों का मार्गदर्शन करता है।

यह सिद्धांत खास तौर पर उन मामलों में अधिक प्रभावी होता है, जहां कलात्मक कृतियों को संभावित प्रतिक्रियाओं के आधार पर चुनौती दी जाती है। न्यायिक मिसालों ने इस धारणा को खारिज किया है कि शत्रुतापूर्ण प्रतिक्रियाओं को पहले से रोकने के लिए अभिव्यक्ति को दबा दिया जाए। इसके बजाय, इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह व्यवस्था बनाए रखे और साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करे। इस न्यायशास्त्र से जो मानक उभरता है, वह सबसे आसानी से आहत हो जाने वाले व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज के एक ऐसे समझदार और सहनशील सदस्य का है, जो उकसाने वाले विचारों से संवाद कर सके।

‘घूसखोर पंडत’ विवाद समूह मानहानि के अब तक अनसुलझे प्रश्न को भी सामने लाता है। चाहे इस विवाद का समाधान न्यायिक स्पष्टता के जरिए हो, स्वैच्छिक संशोधन के माध्यम से हो, या अंततः फ़िल्म को मंज़ूरी मिलने से इसका महत्व इस एक प्रोडक्शन से कहीं आगे तक जाएगा। यह इस बात को प्रभावित करेगा कि फ़िल्मकार रचनात्मक जोखिम का आकलन कैसे करते हैं, प्लेटफ़ॉर्म अनुपालन को कैसे संतुलित करते हैं, और अदालतें स्वतंत्रता तथा संयम के बीच की सीमा को कैसे परिभाषित करती हैं।

भारतीय क़ानून आम तौर पर बड़े और अनिश्चित वर्गों की ओर से मानहानि के दावों को आसानी से मान्यता नहीं देता। कठिनाई इस बात में है कि किसी काल्पनिक पात्र के चित्रण को, बिना किसी स्पष्ट सामान्यीकरण या दुर्भावनापूर्ण इरादे के, पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला कैसे माना जाए। आहत भावनाओं को ही क्षति के समान मान लेना, व्यक्तिपरक दुख को रचनात्मक अभिव्यक्ति पर वीटो में बदल देने का जोखिम पैदा करता है।

स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म से जुड़ी स्थिति

नियामक संदर्भ इस बहस में जटिलता की एक और परत जोड़ता है। सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों के विपरीत, जिन पर पहले से प्रमाणन लागू होता है, स्ट्रीमिंग कंटेंट सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत संचालित होता है। ये नियम रिलीज़ से पहले जांच के बजाय प्रकाशन के बाद शिकायत निवारण पर निर्भर करते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था सामाजिक संवेदनशीलताओं के प्रति पर्याप्त रूप से उत्तरदायी नहीं है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि डिजिटल क्षेत्र में पूर्व सेंसरशिप लागू करने से वह रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र ही बदल जाएगा, जिसे स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म ने संभव बनाया है।

पिछले विवाद इस क्षेत्र में संवैधानिक संरक्षण के असमान प्रयोग को दर्शाते हैं। कुछ प्रोडक्शनों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर न्यायिक ज़ोर के चलते संरक्षण मिला, जबकि अन्य को कानूनी दबाव और जन प्रतिक्रिया के बाद बदला गया या वापस ले लिया गया। अक्सर नतीजे एकसमान कानूनी मानकों से कम, और उस समय के राजनीतिक माहौल तथा अदालतों की इस इच्छा पर अधिक निर्भर रहे हैं कि वे आहत-आधारित प्रतिबंधों की विस्तृत व्याख्या का विरोध करें या नहीं।

असमान दृष्टिकोण

पिछले विवाद न्यायपालिका के असमान रवैये को उजागर करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'पद्मावत' की रिलीज़ की रक्षा करते हुए ज़ोर दिया था कि प्रमाणित फ़िल्मों को दबाने के बजाय राज्यों की ज़िम्मेदारी क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने की है। इसके विपरीत, 'तांडव' मामले में आपराधिक शिकायतों के बाद माफ़ीनामे और बदलाव देखने को मिले, जबकि 'मिर्ज़ापुर' के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई जानबूझकर इरादा नहीं था। नतीजे अक्सर इस बात पर निर्भर रहे हैं कि अदालतें अनुच्छेद 19(2) के आधार पर किए गए दावों के मुक़ाबले अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए कितनी तैयार हैं।

“सामान्य दर्शक” का मानक बहुलतावाद को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है, क्योंकि यह सबसे अधिक संवेदनशील आवाज़ों को सार्वजनिक विमर्श की सीमाएँ तय करने से रोकता है।

तत्काल विवाद से आगे बढ़कर, 'घूसखोर पंडत' डिजिटल मीडिया के लिए दीर्घकालिक प्रभाव वाले सवाल खड़े करता है। यदि अदालतें शीर्षकों या पात्रों के नामों की प्रतीकात्मक व्याख्याओं के लिए प्लेटफ़ॉर्म को ज़िम्मेदार ठहराने लगें, तो स्ट्रीमिंग सेवाओं को स्थानीय संवेदनशीलताओं के अनुरूप व्यापक पूर्व-समीक्षा तंत्र अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

ऐसा बदलाव वैश्विक रूप से एकरूप प्रोग्रामिंग से हटने का संकेत होगा और जोखिम प्रबंधन के तौर पर आत्म-सेंसरशिप को प्रोत्साहित कर सकता है।

हेकलर का वीटो

यह मामला “हेकलर के वीटो” की अवधारणा पर भी विचार के लिए आमंत्रित करता है—जहां विरोध या अशांति की आशंका को अभिव्यक्ति को चुप कराने का आधार बना लिया जाता है। संवैधानिक लोकतंत्रों ने ऐतिहासिक रूप से इस तर्क का विरोध किया है, क्योंकि इसके आगे झुकना असहिष्णुता को पुरस्कृत करता है और क़ानून के शासन को कमजोर करता है। इसलिए न्यायपालिका का कार्य जन आक्रोश की तीव्रता को तौलना नहीं, बल्कि यह परखना है कि विवादित अभिव्यक्ति वास्तव में कोई वास्तविक और तात्कालिक ख़तरा पैदा करती है या नहीं, जो प्रतिबंध को उचित ठहरा सके। संवैधानिक प्रतिबद्धता की असली कसौटी सहमत करने वाली अभिव्यक्ति की रक्षा में नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति की रक्षा में है जो प्रचलित संवेदनशीलताओं को चुनौती देती है।

एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989) मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने जाति-आधारित आरक्षण पर बनी एक फ़िल्म को दिया गया ‘यू’ प्रमाणपत्र रद्द कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहाल करते हुए कहा कि प्रदर्शन और हिंसा की धमकी के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया नहीं जा सकता, और राज्य को क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने बाद में यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किसी असुरक्षित या अतिसंवेदनशील व्यक्ति के नजरिये से नहीं, बल्कि एक समझदार और दृढ़ सोच वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने हाल ही में कर्नाटक में कमल हासन की फ़िल्म 'ठग लाइफ' की सुरक्षित रिलीज़ सुनिश्चित करते हुए एस. रंगराजन मामले में दिए गए अपने फैसले का ही अनुसरण किया। (हालांकि इसके बाद वितरकों ने कर्नाटक में फ़िल्म रिलीज़ न करने का निर्णय लिया।)

फ़िलहाल, नेटफ्लिक्स ने फ़िल्म से जुड़ा प्रचार सामग्री हटा ली है और इसकी रिलीज़ को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यह विवाद चाहे न्यायिक स्पष्टता, स्वैच्छिक बदलाव या अंततः अनुमति के ज़रिये सुलझे, लेकिन इसका महत्व केवल इसी एक प्रोडक्शन तक सीमित नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि फ़िल्मकार रचनात्मक जोखिम का आकलन कैसे करते हैं, प्लेटफ़ॉर्म अनुपालन की रणनीति कैसे तय करते हैं और अदालतें स्वतंत्रता व प्रतिबंध की सीमा को कैसे परिभाषित करती हैं।

अंततः यह प्रकरण भारतीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े न्यायशास्त्र में चल रहे पुनर्संतुलन को दर्शाता है। संवैधानिक प्रतिबद्धता की असली परीक्षा स्वीकार्य या लोकप्रिय अभिव्यक्ति की रक्षा में नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति के संरक्षण में है जो प्रचलित संवेदनाओं को चुनौती देती है। यदि कानूनी ढांचे को निरंतरता और संयम के साथ लागू किया जाए, तो यह एक मूलभूत सिद्धांत को दोहराएगा: एक संवैधानिक गणराज्य में अभिव्यक्ति तक पहुंच सबसे तेज़ आवाज़ उठाने वालों या सबसे अधिक आहत होने का दावा करने वालों द्वारा तय नहीं की जा सकती, बल्कि कानून, तर्क और असहमति के प्रति साझा सहिष्णुता द्वारा तय होनी चाहिए।

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