डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड: साइबर धोखाधड़ी का नया खेल| AI WITH SANKET
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डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड: साइबर धोखाधड़ी का नया खेल| AI WITH SANKET

पैनल ने साफ किया कि सिर्फ रोकथाम पर्याप्त नहीं है। एक बार धोखाधड़ी होने के बाद पीड़ितों को संस्थागत सहारा नहीं मिलता।


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भारत में डिजिटल धोखाधड़ी अब सिर्फ ओटीपी चोरी या फ़िशिंग लिंक तक सीमित नहीं रह गई है। एक नया और जबरदस्त तरीका 'डिजिटल अरेस्ट'लोगों को वित्तीय रूप से बर्बाद कर रहा है और उन्हें कोई संस्थागत सहारा नहीं मिल रहा। इस विषय पर मुकेश चौधरी, बिलाल ज़ैदी, बिरेन यादव और विराग गुप्ता ने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे फ्रॉड करने वाले सिस्टम से तेज़ी से विकसित हो रहे हैं और अपराध के बाद पीड़ितों को लंबे समय तक न्याय नहीं मिल पाता।

बढ़ता हुआ खतरा

डिजिटल अरेस्ट के फ्रॉड पूरे भारत में तेजी से फैल रहे हैं। फ्रॉड करने वाले कॉल के माध्यम से लोगों को कानून-व्यवस्था या जांच एजेंसियों का झांसा देकर डराते हैं और उन्हें नकदी या बैंक ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि Awareness Campaigns केवल रोकथाम पर ध्यान देती हैं, लेकिन धोखाधड़ी के बाद पीड़ितों को क्या भुगतना पड़ता है, इस पर कम ध्यान दिया जाता है। पीड़ित अक्सर पुलिस थानों, बैंकों और अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन उन्हें कोई ठोस राहत नहीं मिलती।


कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां

वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता के अनुसार, समस्या की जड़ संविधान और कानूनी ढांचे में है। साइबरक्राइम, टेलीकॉम और आईटी मामलों में केंद्र सरकार जिम्मेदार होती है, जबकि पुलिसिंग राज्य का विषय है। उन्होंने बताया कि आईटी एक्ट 2000 राज्य पुलिस को पर्याप्त अधिकार नहीं देता, जबकि एफआईआर राज्य स्तर पर दर्ज होती हैं। इसके अलावा गृह मंत्रालय की हाई-लेवल कमेटी में केवल केंद्र की एजेंसियां शामिल हैं, राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि जब साइबरक्राइम नेटवर्क राज्य या देश के बाहर से काम करते हैं तो कार्रवाई में बाधा आती है।

अपराधों की कम रिपोर्टिंग

गुप्ता ने आंकड़ों की गड़बड़ी की ओर ध्यान दिलाया। एनसीआरबी के अनुसार 2021-23 में लगभग 2.05 लाख साइबरक्राइम एफआईआर दर्ज हुईं। वहीं, गृह मंत्रालय हेल्पलाइन ने लगभग 49 लाख साइबर फ्रॉड शिकायतें दर्ज कीं। इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में साइबर फ्रॉड के मामले कभी अधिकारिक न्याय प्रणाली में नहीं पहुंचते। इसके अलावा, धोखाधड़ी की राशि का बड़ा हिस्सा हवाला, क्रिप्टोकरेंसी और विदेश चैनलों से गुजरता है और केवल एक छोटा हिस्सा ही पीड़ितों तक पहुंचता है।

नियामक असफलताएं

गुप्ता ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की अनुपालन विफलताओं को भी उजागर किया। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद, कई प्लेटफ़ॉर्म्स ने IT Rules, 2021 के तहत ग्रिवेंस और कंप्लायंस अधिकारी नियुक्त नहीं किए। इसका फायदा धोखेबाज उठा रहे हैं।

पीड़ित की कहानी

बिरेन यादव, जो डिजिटल गिरफ्तारी का शिकार हुए, ने बताया कि कैसे उन्हें सुबह-सुबह फोन आया कि उनके फोन का इस्तेमाल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में हुआ है और उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया गया है। कॉलर ने उनका आधार, पैन और बैंक विवरण बताकर धमकी को वास्तविक बनाया। उन्हें पूरे दिन फोन पर रखा गया और निर्देश दिए गए कि आरटीजीएस के जरिए फिक्स्ड डिपॉज़िट तोड़कर बैंक में पैसे ट्रांसफर करें।

बैंकिंग सिस्टम की चुप्पी

यादव ने बताया कि उन्होंने ICICI, HDFC, Axis और Canara Bank समेत कई बैंकों में बड़े ट्रांज़ैक्शन कराए, लेकिन किसी अधिकारी ने पैसे भेजने की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाया। अंततः उन्होंने ₹1.6 करोड़ गंवा दिए। अगले दिन जब उन्होंने शिकायत दर्ज कराई तो साइबर सेल ने भी कोई गिरफ्तारी या रिकवरी नहीं की और डेढ़ साल बाद तक उन्हें कोई स्थिर सूचना नहीं मिली।

जागरूकता बनाम कार्रवाई

मुकेश चौधरी, Cyberops के फाउंडर और CEO, ने बताया कि आम जागरूकता के नारे जैसे “OTP शेयर न करें” अधूरे और भ्रमित करने वाले हैं। क्योंकि डिजिटल जीवन में OTP शेयर करना आम बात है—कैब, कूरियर और बैंकिंग में। उन्होंने कम्युनिटी पोलिसिंग का सुझाव दिया और कहा कि साइबर जागरूकता घरों तक सीधे पहुंचनी चाहिए, न कि सिर्फ कॉलर ट्यून या सेलिब्रिटी प्रचार पर निर्भर रहना चाहिए।

वरिष्ठ नागरिकों की समस्या

बिलाल ज़ैदी, Elderra.io के फाउंडर और CEO, ने बताया कि वरिष्ठ नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। उनका संगठन घर-घर जाकर प्रशिक्षण देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि बार-बार की विफलताओं से बुजुर्ग डिजिटल सेवाओं से ही डरने लगे हैं, जिससे डिजिटल बहिष्कार बढ़ रहा है।

डेटा की संवेदनशीलता

ज़ैदी ने बताया कि फ्रॉडर्स के पास अक्सर पीड़ितों का वित्तीय इतिहास, संपत्ति लेनदेन और बैंक बैलेंस मौजूद होता है। यह जानकारी केवल बैंकों या कानून प्रवर्तन एजेंसियों को होनी चाहिए। यह विश्वसनीयता ही डिजिटल गिरफ्तारी फ्रॉड को मन-मन से दबाव डालने वाला और प्रभावशाली बनाती है।

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