
संसद में राइट टू रिकॉल की मांग, क्या बदलेगा जनप्रतिनिधियों का भविष्य?
आप सांसद राघव चड्ढा ने राज्यसभा में राइट टू रिकॉल की मांग उठाई। उन्होंने कहा, काम न करने वाले जनप्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार मतदाताओं को मिलना चाहिए।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बुधवार को संसद में ‘राइट टू रिकॉल’ (जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) की मांग उठाकर नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया। शून्यकाल के दौरान बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मतदाताओं को केवल प्रतिनिधि चुनने का ही नहीं, बल्कि काम न करने की स्थिति में उन्हें कार्यकाल समाप्त होने से पहले हटाने का भी अधिकार मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा, “जब मतदाता अपने नेताओं को चुन सकते हैं, तो उन्हें काम न करने पर हटाने का अधिकार भी होना चाहिए। ‘राइट टू रिकॉल’ व्यवस्था जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करेगी और लोकतंत्र को अधिक सशक्त बनाएगी।”
‘राइट टू रिकॉल’ क्या है?
राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया के माध्यम से भी इस अवधारणा को स्पष्ट किया। उनके अनुसार, ‘राइट टू रिकॉल’ एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को उसका कार्यकाल समाप्त होने से पहले पद से हटाने की पहल कर सकते हैं।अर्थात, यदि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधि के कामकाज से संतुष्ट नहीं है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसे हटाने की मांग कर सकती है।
महाभियोग और अविश्वास प्रस्ताव का हवाला
अपने पक्ष को मजबूत करते हुए चड्ढा ने कहा कि भारत में पहले से ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग की व्यवस्था है। वहीं, सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों के लिए भी जवाबदेही तय करने का समान तंत्र होना चाहिए।उनका कहना था कि यह व्यवस्था लोकतंत्र को कमजोर नहीं करेगी, बल्कि उसे और अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाएगी।
दुरुपयोग रोकने के लिए सुझाए उपाय
राघव चड्ढा ने स्पष्ट किया कि ‘राइट टू रिकॉल’ किसी के खिलाफ राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए उन्होंने कुछ शर्तों का सुझाव दिया। जनप्रतिनिधि को हटाने के लिए स्पष्ट और ठोस आधार तय हों। कम से कम 35 से 40 प्रतिशत मतदाताओं के हस्ताक्षर आवश्यक हों। जनप्रतिनिधि को 18 महीने का ‘परफॉर्मेंस पीरियड’ दिया जाए, ताकि उसे सुधार का अवसर मिल सके। उन्होंने कहा कि इससे राजनीतिक दल भी बेहतर प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देंगे।
किन देशों और राज्यों में लागू है व्यवस्था?
चड्ढा के अनुसार, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा समेत 20 से अधिक लोकतांत्रिक देशों में ‘राइट टू रिकॉल’ लागू है। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, वेनेज़ुएला, पेरू, इक्वाडोर, जापान और ताइवान जैसे देश शामिल हैं। भारत में भी कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की ग्राम पंचायतों में यह व्यवस्था लागू है।

