
17 लाख मौतों के बीच वायु प्रदूषण बजट में कटौती, विशेषज्ञों ने उठाए गंभीर सवाल
केंद्रीय बजट 2026 में प्रदूषण नियंत्रण का आवंटन घटाकर 1,091 करोड़ किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ते स्वास्थ्य व आर्थिक संकट के बीच गलत प्राथमिकता है।
भारत की वायु प्रदूषण संकट से निपटने की कोशिशें उस समय कमजोर पड़ती दिख रही हैं, जब इसके आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों के प्रमाण लगातार सामने आ रहे हैं। एनालिटिकल इंटेलिजेंस के एक एपिसोड में द फेडरल ने पर्यावरणविद् और ग्रीन द मैप के सीईओ विमलेंदु झा तथा निकोर एसोसिएट्स की संस्थापक और मुख्य अर्थशास्त्री मिताली निकोरे से बातचीत की। चर्चा का केंद्र यह रहा कि केंद्रीय बजट 2026 में प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवंटन में की गई कटौती, वैश्विक और घरेलू विशेषज्ञों की बार-बार दी गई चेतावनियों के बावजूद, गलत प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
यह चर्चा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026–27 के बाद हुई, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण मद के तहत आवंटन घटाकर 1,091 करोड़ रुपये कर दिया गया। यह पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से 209 करोड़ रुपये कम है, जबकि प्रदूषण से जुड़ी मौतें और आर्थिक नुकसान लगातार बढ़ रहे हैं।
बजट संकेत और राजनीतिक इच्छाशक्ति
विमलेंदु झा ने कहा कि प्रदूषण को लेकर राजनीतिक मंशा का सबसे स्पष्ट संकेत संसाधनों के आवंटन से मिलता है। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा के बावजूद, प्रदूषण नियंत्रण के लिए बजटीय समर्थन लगातार कम बना हुआ है।
उन्होंने बताया कि मौजूदा करीब 1,000 करोड़ रुपये का आवंटन 80 से 100 शहरों में बांटा जाता है, यानी प्रति शहर लगभग 10 करोड़ रुपये। उनके अनुसार, इतने बड़े संकट से निपटने के लिए यह राशि पूरी तरह अपर्याप्त है। झा ने फंड के कम उपयोग की समस्या भी उठाई। उन्होंने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि एक वित्त वर्ष में 900 करोड़ रुपये के आवंटन में से केवल 16 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए, जो यह दर्शाता है कि प्रदूषण नियंत्रण को प्रशासनिक प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और असमानता
झा ने कहा कि सार्वजनिक विमर्श में प्रदूषण को सामान्य मान लिया गया है और इसे अक्सर मौसमी या केवल अभिजात वर्ग की चिंता बताकर टाल दिया जाता है, जबकि वास्तव में इसका सबसे अधिक असर गरीब तबकों पर पड़ता है। उन्होंने अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ द्वारा उद्धृत वर्ल्ड बैंक और लैंसेट की रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदूषण से हर साल 17 लाख से अधिक मौतें होती हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 30 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
उनके अनुसार, उत्तर भारत, खासकर दिल्ली-एनसीआर के लोग खराब वायु गुणवत्ता के कारण अपनी जीवन प्रत्याशा के 8–10 वर्ष खो देते हैं। झा ने कहा कि निष्क्रियता की लागत, निर्णायक कार्रवाई की लागत से कहीं अधिक है और लगातार कम निवेश से दीर्घकालिक आर्थिक नुकसान और बढ़ता जाएगा।
बिखरा हुआ खर्च, स्पष्ट फोकस का अभाव
सरकार के इस तर्क पर कि परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा और नियामक संस्थाओं के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण नियंत्रण पर खर्च किया जा रहा है, झा ने कहा कि यह खर्च बिखरा हुआ और असंगठित है। उन्होंने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग जैसे संस्थानों के लिए मामूली बढ़ोतरी का जिक्र किया, लेकिन कहा कि ये छोटे-छोटे बदलाव एक व्यापक स्वच्छ वायु रणनीति नहीं बनाते।
झा ने यह भी कहा कि “प्रदूषण नियंत्रण” शीर्ष के तहत आवंटन वास्तव में स्वच्छ वायु बजट नहीं है, क्योंकि इसमें कई असंबंधित मदें शामिल हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इसमें से कितनी राशि सीधे वायु गुणवत्ता सुधार पर खर्च होती है।
रक्षा प्राथमिकता बनाम स्वास्थ्य आपातकाल
मिताली निकोरे ने इस मुद्दे को वित्तीय दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने प्रदूषण पर खर्च की तुलना अन्य बजटीय प्राथमिकताओं से की। उन्होंने बताया कि रक्षा बजट में साल-दर-साल 15 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है और यह अब कुल केंद्रीय व्यय का लगभग 15 प्रतिशत है, जबकि प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवंटन घटाया गया है।
उनका कहना था कि बजट प्राथमिकताओं की अभिव्यक्ति होते हैं। प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किए जाने के बावजूद उसके लिए फंड में कटौती, जोखिम और संसाधनों के बीच असंतुलन को दर्शाती है। निकोरे ने कहा कि वायु प्रदूषण अब केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने अपनी यात्राओं के दौरान 30 से अधिक भारतीय शहरों में प्रदूषण की गंभीर समस्या देखी है। उनके अनुसार, लोग प्रदूषित हवा से निपटने के लिए नेब्युलाइज़र और स्टेरॉयड जैसी चिकित्सीय सहायता लेने को मजबूर हो रहे हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा और दीर्घकालिक समाधान
निकोरे ने कहा कि सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों में अधिक निवेश से प्रदूषण की समस्या का समाधान हो सकता है और साथ ही भारत की आर्थिक व ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। उन्होंने तर्क दिया कि घरेलू सौर विनिर्माण को मजबूत प्रोत्साहन देने से आयातित जीवाश्म ईंधन और विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता कम होगी और दीर्घकालिक सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ भी मिलेंगे।
उनके अनुसार, स्वच्छ वायु में निवेश से श्रम उत्पादकता बढ़ेगी, हरित नौकरियों का सृजन होगा और सर्कुलर इकॉनमी से जुड़े एमएसएमई और स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा, जिससे आर्थिक लाभ भी प्राप्त होंगे।
राष्ट्रीय, सालभर चलने वाला संकट
विमलेंदु झा ने प्रदूषण को केवल सर्दियों या दिल्ली-केंद्रित समस्या के रूप में देखने की धारणा को खारिज किया। उन्होंने इसे सालभर चलने वाला राष्ट्रीय संकट बताया। उनके अनुसार, भारत की लगभग 70 प्रतिशत वायु गुणवत्ता पूरे वर्ष खराब से अत्यंत खतरनाक श्रेणी में बनी रहती है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के बड़े हिस्सों में प्रदूषण की निगरानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिससे नीति निर्माण प्रतिक्रियात्मक बन जाता है, न कि प्रमाण आधारित। झा के मुताबिक, सार्थक कार्रवाई के लिए बड़े पैमाने पर केंद्रीकृत निवेश, मजबूत निगरानी तंत्र, प्रदूषण स्रोतों की स्पष्ट पहचान और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार की जरूरत है, न कि पानी का छिड़काव जैसे तात्कालिक उपायों की।
अनुत्तरित सवाल
चर्चा का निष्कर्ष एक अहम सवाल पर आकर टिका कि जब प्रदूषण हर साल 17 लाख से अधिक भारतीयों की जान लेता है और भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, तो क्या 1,091 करोड़ रुपये का आवंटन पर्याप्त प्रतिक्रिया है? दोनों विशेषज्ञों ने कहा कि जब तक युद्धस्तर पर कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक प्रदूषण भारत के स्वास्थ्य, उत्पादकता और विकास को कमजोर करता रहेगा, चाहे अन्य क्षेत्रों में कितनी ही प्रगति क्यों न हो।

