एक थे अजित दादा : चाचा शरद पवार की छाया से निकलकर खुद की शख्सियत बनाने वाले नेता
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अजित पवार की बुधवार 28 जनवरी की सुबह बारामती एयरपोर्ट के पास विमान लैंडिंग के वक्त हुए हादसे में मौत हो गई

एक थे 'अजित दादा' : चाचा शरद पवार की छाया से निकलकर खुद की शख्सियत बनाने वाले नेता

1982 में राजनीति में प्रवेश करने के पांच साल बाद ही अजित पवार साल 1987 में पहली बार बारामती से विधायक चुन लिए गए थे। इसके बाद उन्होंने बारामती में अपनी पैठ बना ली


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महाराष्ट्र में एक समय सहकारिता आंदोलन की यहां की राजनीति में बड़ी भूमिका रही है। किसी दौर में शरद पवार ने उसकी ताकत को समझा, जाना और उससे राजनीतिक ताकत हासिल करते गए। अजित पवार की राजनीति का प्रस्थान बिंदु भी वही सहकारिता आंदोलन है, जब 1982 में अजित पवार एक सहकारी चीनी कारखाने के बोर्ड सदस्य बने। इसे एक तरह से अजित पवार की राजनीति की पाठशाला मान सकते हैं क्योंकि यहीं से उन्होंने राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ने की शुरुआत की। तब तक उनके चाचा शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति में अपना सिक्का जमा ही चुके थे।

अजित पवार ने राजनीति अपने चाचा की छत्रछाया में ही सीखी। लोगों को कैसे जोड़ना है, संगठन कैसे बनाना है, असल सवालों को कैसे एड्रेस करना है, ये सब हुनर उसी राजनीतिक पाठशाला में सीखे गए। और कई साल के बाद वह वक्त भी आया जब अजित पवार राजनीति के विराट व्यक्तित्व वाले अपने चाचा शरद पवार की छाया से बाहर निकल आए। न सिर्फ बाहर निकले, बल्कि चाचा की बनाई पार्टी को भी उन्होंने अपना बना लिया। उन्होंने ऐसी राजनीतिक समीककरण बैठाए कि अजित पवार 'अजित दादा' के नाम से बहुत मशहूर हो गए।

शरद पवार से अजित पवार के रिश्ते को समझने लिए ये बता दें कि शरद पवार के बड़े भाई थे अनंतराव पवार, जोकि मुंबई के मशहूर राजकमल स्टूडियो में काम किया करते थे। अजित पवार उन्हें के बेटे थे। 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देओलाली प्रवरा गांव में उनका जन्म हुआ था। पिता के निधन के बाद अजित पवार को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी और उन पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। लेकिन निजी जीवन की जिम्मेदारियों के अलावा वो सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारियां निभाना भी बहुत जल्दी सीख गए थे।

1982 में राजनीति में प्रवेश करने के पांच साल बाद ही अजित पवार साल 1987 में पहली बार बारामती से विधायक चुन लिए गए थे। इसके बाद उन्होंने बारामती में अपनी पैठ बना ली और लगातार कई बार बारामती विधानसभा सीट से अजित पवार जीतते रहे। 1990 के दशक की शुरुआत में उन्हें महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार में पहली बार राज्यमंत्री बनने का अवसर मिला। वह 1991–1993 के दौरान महाराष्ट्र सरकार में राज्य मंत्री रहे।

अपनी सांगठनिक क्षमताओं और अपनी राजनीतिक सूझबूझ को विस्तार देने का मौका उन्हें तब मिला जब उनके चाचा शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ दी और 1999 में अपनी पार्टी एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) का गठन किया। अजित पवार एनसीपी की स्थापना के बाद बेहद सक्रिय भूमिका में दिखाई दिए। उनके सांगठनिक कौशल का उनके चाचा शरद पवार ने भी लोहा माना।

इसका अजित पवार को पहली बार बड़ा इनाम तब मिला जब महाराष्ट्र में 2009 में कांग्रेस–एनसीपी गठबंधन की सरकार बनी। बाद में जब कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बने तो एनसीपी के कोटे से उपमुख्यमंत्री अजित पवार को बनाया गया और उनके पास वित्त, योजना और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभाग आ गए।

दूसरी बार वह 2019 में बहुत ही विवादास्पद तरीके से उपमुख्यमंत्री बने थे, जब बीजेपी को बहुमत न होने के बावजूद महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने बहुत सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। गुपचुप हुए इस शपथ ग्रहण को लेकर तब बहुत सवाल भी उठे थे। अजित पवार बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से शरद पवार को छोड़कर तब बीजेपी के मददगार बने लेकिन वो खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया था और फडणवीस और अजित पवार दोनों को इस्तीफा देना पड़ा था लेकिन उस राजनीतिक एपिसोड ने अजित पवार को एक बेहद चतुर नेता के तौर पर स्थापित कर दिया था।

गजब की बात यह है कि 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अजित पवार ने बाद में महाविकास अघाड़ी सरकार बनने के बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार में भी उपमुख्यमंत्री का पद झटक लिया। फिर शिवसेना में टूटफूट के बाद उद्धव की सरकार गिरने के बाद एकनाथ शिंदे की अगुआई में सरकार बनी तो डिप्टी सीएम के साथ वित्त मंत्री की जिम्मेदारी भी अजित पवार को ही मिली।

मजेदार बात ये है कि साल 2024 में जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी, तब भी अजित पवार से उनकी डिप्टी सीएम की कुर्सी कोई नहीं छीन पाया। कभी अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले अजित पवार ने तो बाद में चाचा से पार्टी भी छीन ली। 2023 में एनसीपी में राजनीतिक विभाजन हो गया। बारामती में एक छोटे विमान के हादसे का शिकार हो जाने से पहले तक एनसीपी के असली बॉस अजित पवार ही थे। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सत्ता में उनकी भागीदारी रही है।

अब एक विमान हादसे में अजित पवार की अकाल मृत्यु के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब एनसीपी का क्या होगा? अजित पवार के परिवार में पत्नी सुनेत्रा के अलावा बड़े बेटे पार्थ और छोटे बेटे जय पवार शामिल हैं। अजित पवार के बड़े बेटे पार्थ चुनाव भी लड़ चुके हैं, हालांकि उन्हें बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। पत्नी सुनेत्रा पवार के पास इतना राजनीतिक अनुभव नहीं है कि वो पार्टी को लीड कर सकें।

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