AI With Sanket : हमेशा विवादों से दूर रहने वाले और अपनी विनम्रता के लिए मशहूर ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान के एक हालिया बयान ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री में भूचाल ला दिया है। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में रहमान ने बॉलीवुड के बदलते स्वरूप को 'सांप्रदायिक' (Communal) करार देकर एक नई बहस छेड़ दी है। 'द फेडरल' के शो 'AI with Sanket' में मेजबान संकेत उपाध्याय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर एक विशेषज्ञ पैनल के साथ चर्चा की कि क्या वाकई बॉलीवुड अपनी समावेशी पहचान खो रहा है या यह सिर्फ एक रचनात्मक बदलाव का नतीजा है।
क्या है रहमान के आरोपों की हकीकत?
एआर रहमान अक्सर सार्वजनिक रूप से राजनीति या भेदभाव पर बोलने से बचते रहे हैं। लेकिन इस बार जब उनसे पूछा गया कि क्या 'तमिल आउटसाइडर' होने के कारण उन्हें बॉलीवुड में पक्षपात झेलना पड़ा, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। रहमान ने कहा कि उन्हें कभी सीधे तौर पर भेदभाव नहीं दिखा, लेकिन पिछले आठ सालों में इंडस्ट्री के पावर सेंटर बदल गए हैं। उनके अनुसार, रचनात्मकता कम हुई है और अब फैसले 'गैर-रचनात्मक' ताकतों द्वारा लिए जा रहे हैं।
गंभीर आरोप या महज प्रतिस्पर्धा?
शो के दौरान फिल्म ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखेड़े ने कहा कि रहमान का बयान एक बहुत ही गंभीर आरोप है और इसकी व्याख्या बहुत सावधानी से होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि बॉलीवुड का इतिहास हमेशा से समावेशी रहा है, जहाँ मुस्लिम गीतकारों, गायकों और संगीतकारों का दशकों तक दबदबा रहा है। वानखेड़े ने सुझाव दिया कि रहमान की चिंता सांप्रदायिक भेदभाव के बजाय बदले हुए 'म्यूजिक इकोसिस्टम' को लेकर हो सकती है। आज एक फिल्म में कई संगीतकार होते हैं और प्रोड्यूसर्स व म्यूजिक लेबल्स का दखल काफी बढ़ गया है। उन्होंने कहा, "रहमान एक जीनियस हैं, लेकिन आज प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है और इंडस्ट्री अब नए साउंड और तेज प्रोडक्शन की तरफ भाग रही है।"
बीजेपी और फिल्म जगत की प्रतिक्रिया
फिल्म निर्माता और बीजेपी प्रवक्ता अभिषेक त्रिपाठी ने रहमान के दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'गैर-जिम्मेदाराना' बताया। उन्होंने कहा कि रहमान को आज भी हिंदी सिनेमा में वही सम्मान और व्यावसायिक सफलता मिल रही है। त्रिपाठी ने तर्क दिया, "सिनेमा बाजार की मांग पर चलता है, किसी राजनीतिक एजेंडे पर नहीं। फिल्मों में राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।" उन्होंने यह भी इशारा किया कि रहमान की काम करने की विस्तृत और धीमी शैली शायद आज की भागदौड़ भरी फिल्म निर्माण प्रक्रिया के साथ मेल नहीं खा पा रही है।
पावर सेंटर का स्थानांतरण और कॉर्पोरेट कंट्रोल
वरिष्ठ पत्रकार टी. रामकृष्णन ने इस बयान को विश्लेषणात्मक नजरिए से देखने की अपील की। उन्होंने सवाल उठाया कि रहमान ने अपने करियर के इस मुकाम पर यह बात क्यों कही? उन्होंने कहा कि हर कलाकार के करियर में एक 'पीक' आता है और शायद यह रचनात्मक ठहराव की हताशा हो सकती है।
दूसरी ओर, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सायरा शाह हलीम ने रहमान के पक्ष को व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में रखा। उन्होंने तर्क दिया कि रहमान 'सूक्ष्म बहिष्कार' (Subtle Exclusion) की बात कर रहे हैं। हलीम ने कहा कि अब पावर सेंटर कलाकारों से छिनकर कॉर्पोरेट लेबल्स और वैचारिक गेटकीपर्स के पास चले गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आज का सिनेमा अक्सर सत्ता के नैरेटिव का आईना बनता जा रहा है, जहाँ प्रयोग के बजाय 'कन्फॉर्मिटी' (सहमति) को पुरस्कृत किया जाता है।
बदलते दर्शक और रचनात्मक नुकसान
पैनल में इस बात पर भी बहस हुई कि क्या सोशल मीडिया और रील कल्चर ने दर्शकों की पसंद बदल दी है? विशेषज्ञों का मानना था कि रहमान की जटिल शास्त्रीय धुनें अब शायद मुख्यधारा के दर्शकों को उतनी नहीं लुभा रही हैं। दिग्गज मनोरंजन पत्रकार डेन्ज़िल ओ'कोनेल ने कहा कि बॉलीवुड में अब कॉर्पोरेट कंट्रोल इतना बढ़ गया है कि निर्देशक और संगीतकार की वह पुरानी जुगलबंदी (जैसे रहमान और मणि रत्नम) अब दुर्लभ हो गई है।
निष्कर्ष 'AI with Sanket' के पैनल का निष्कर्ष यह था कि जब एआर रहमान जैसा गंभीर व्यक्तित्व कुछ कहता है, तो उस पर सिर्फ बहस नहीं, बल्कि गहरा विचार होना चाहिए। चाहे यह व्यक्तिगत अनुभव हो या पूरी इंडस्ट्री में आया बदलाव, यह साफ है कि बॉलीवुड एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहाँ कला और व्यापार के बीच का संघर्ष अब राजनीतिक रंगों में भी रंगा नजर आने लगा है।
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