
असली शक्ति मोदी और अमित शाह के हाथ में, नितिन नबीन का पद महज औपचारिकता?
नितिन नबीन का अध्यक्ष बनना पार्टी के लिए युवा संदेश, संगठनात्मक मजबूती और एक नई रणनीति लेकर आया है। हालांकि, बड़े निर्णय मोदी-शाह की टीम और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिए जाते रहेंगे।
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन ने 20 जनवरी से अपना कार्यभार संभाल लिया है। 45 वर्षीय नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति के तहत उनका चयन किया गया है। ऐसे में 'द फेडरल' के एडिटर इन चीफ एस. श्रीनिवासन ने 'श्रीनि से संवाद' कार्यक्रम में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। उनका मानना है कि यह कदम युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने और पार्टी में नेतृत्व को केंद्रीकृत रखने का फैसला है।
नितिन नबीन बिहार से हैं, लेकिन देशभर में उनकी पहचान सीमित है। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना गया। वे पार्टी के प्रति वफादार और कम उम्र के नेता हैं। उनके अध्यक्ष बनने के बाद असली शक्ति प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हाथ में रहेगी। श्रीनिवासन के अनुसार नितिन नबीन का पद अधिकतर औपचारिक रबर स्टैम्प है। इसका मतलब है कि अध्यक्ष महज पद भरा गया है, लेकिन असली निर्णय लेने की कमान शीर्ष नेतृत्व के पास ही है।
बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल
बीजेपी अक्सर अन्य दलों पर आंतरिक लोकतंत्र न होने का आरोप लगाती है। लेकिन, पार्टी के संविधान के अनुसार अध्यक्ष का चुनाव अनिवार्य है। इतिहास में देखा जाए तो वाजपेयी, आडवाणी, बंगारू लक्ष्मण, वेंकैया नायडू, गडकरी और जेपी नड्डा सभी अध्यक्ष चुने गए, लेकिन सीधे मुकाबले वाले चुनाव नहीं हुए। अध्यक्ष का चयन पूर्वसम्मति और वरिष्ठ नेताओं के विचार-विमर्श के जरिए होता रहा है। कभी-कभी आरएसएस के नेताओं ने भी थोड़े समय के लिए पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। श्रीनिवासन का कहना है कि सीधे चुनाव नहीं हुए, लेकिन विचार-विमर्श और सहमति से पार्टी के नेता चुने जाते रहे हैं और यह बीजेपी की परंपरा रही है।
पार्टी में बदलाव का संकेत
नितिन नबीन का चयन युवा नेतृत्व को आगे लाने और पार्टी को नई दिशा देने का संकेत है। यह अन्य बड़े नेताओं के लिए भी संदेश है कि अध्यक्ष का पद अब मुख्य राजनीतिक शक्ति का केंद्र नहीं रहा। 2014 के बाद बीजेपी में सत्ता और निर्णय लेने की ताकत पूरी तरह मोदी और शाह के हाथ में केंद्रित हो गई है। श्रीनिवासन ने बताया कि नितिन नबीन का कार्यकाल 2024 और 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नितिन नबीन को संबोधित करते हुए कहा कि “आप हमारे बॉस हैं, मैं केवल कार्यकर्ता हूं।” इस बयान को लेकर श्रीनिवासन कहते हैं कि यह 'सिंबोलिक मैसेजिंग' है और असली शक्ति मोदी और अमित शाह के हाथ में ही केंद्रित रहेगी। नितिन नबीन का अध्यक्ष पद संविधान के अनुसार सर्वोच्च माना जाता है। हालांकि, असली निर्णायक शक्ति मोदी और शाह के पास है। इतिहास में भी बीजेपी अध्यक्ष पद कभी प्रत्यक्ष चुनाव के जरिए नहीं भरा गया; सर्वसम्मति और वरिष्ठ नेताओं की सहमति से चयन होता रहा है। नितिन नबीन एक लॉयल और युवा चेहरा हैं, और उनका चयन पार्टी के भीतर सिग्नलिंग और मैसेजिंग का हिस्सा है, ताकि अन्य वरिष्ठ नेताओं को संकेत मिले कि अध्यक्ष पद अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निर्णयों के अनुरूप संचालित होगा।
कांग्रेस का चुनावी इतिहास: तुलना
साल 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे ने शशि थरूर को हराया था। स्वतंत्रता के पहले और बाद में कांग्रेस में कई बार प्रत्यक्ष चुनाव हुए हैं। 1942 के बाद सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी और नेहरू जैसे नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए प्रतिस्पर्धा की। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के समय में भी पार्टी अध्यक्ष पद पर सपष्ट लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं और विरोधाभास देखे गए। श्रीनिवासन ने बताया कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों में अध्यक्ष पद पर सत्ता संरचना पर शीर्ष नेतृत्व का दबदबा रहा, लेकिन बीजेपी में यह केंद्रीकरण 2014 के बाद और अधिक स्पष्ट हो गया।
नितिन नबीन की भूमिका और चुनौती
नितिन नबीन को प्रधानमंत्री और अमित शाह की पसंद से नियुक्त किया गया। उनके सामने चुनौती यह नहीं कि वे सत्ता संभालें, बल्कि पार्टी संगठन और एनडीए घटक दलों के साथ तालमेल बनाएं। वरिष्ठ नेताओं जैसे शिवराज सिंह चौहान, भूपेंद्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, मनोहर लाल खट्टर, देवेंद्र फडनवीस और योगी आदित्यनाथ उनके साथ सहयोग करेंगे, लेकिन वास्तविक निर्णय मोदी-शाह के मार्गदर्शन में होंगे। श्रीनिवासन का मानना है कि नितिन नबीन के अध्यक्ष बनने से पार्टी में युवा नेतृत्व को संदेश गया है और नए अध्यक्ष के आने से राजनीतिक मैसेजिंग और संगठनात्मक उत्साह बढ़ सकता है।
नई कार्यकारिणी और संसदीय बोर्ड
हर नए अध्यक्ष के साथ नई कार्यकारिणी और संसदीय बोर्ड का गठन होता है। श्रीनिवासन ने बताया कि नितिन नबीन के नेतृत्व में मोदी-शाह के लॉयलिस्टों की ही टीम बनेगी। जमीनी राजनीति और राज्य नेतृत्व के मामलों में नितिन नबीन की भूमिका प्रशासकीय और औपचारिक रहेगी। नितिन नबीन ने तमिलनाडु, असम, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनावी तैयारियों पर ध्यान देने का संकेत दिया। तमिलनाडु में कार्तिकेय दीपम विवाद और रामसेतु के मुद्दों का जिक्र कर बीजेपी की स्थायी राजनीतिक लाइन को दोहराया। हालांकि जमीनी ताकत और गठबंधन मुद्दों पर वास्तविक निर्णय बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा ही लिए जाएंगे। अध्यक्ष का बयान पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह और सक्रियता बढ़ाने के लिए अधिक है, चुनावी नतीजे तय नहीं करता।
उत्तर प्रदेश पर ध्यान
यूपी में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए नितिन नबीन की सक्रिय भूमिका अपेक्षित है। हालांकि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में अपनी ताकत कायम कर रखी है। नितिन नबीन का काम राज्य में पार्टी संगठन और गठबंधन दलों के बीच सामंजस्य और मैनेजमेंट सुनिश्चित करना होगा। श्रीनिवासन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ताकत के सामने नितिन नबीन का प्रभाव सीमित रहेगा, लेकिन बिहार में उनका असर और भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। नितिन नबीन बिहार से पांच बार चुनाव जीत चुके हैं। उनके पिता भी बिहार में बीजेपी से जुड़े रहे और उन्होंने भी विधान सभा में प्रतिनिधित्व किया। हालांकि उनका जातीय आधार कायस्थ संख्या में बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन विवादास्पद भी नहीं है। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से उनके राजनीतिक कद में बढ़ोतरी होगी और भविष्य में मुख्यमंत्री बनने के अवसर उनके लिए आसान हो सकते हैं। बिहार में बीजेपी के लिए नीतीश कुमार के मुकाबले एक मजबूत विकल्प के रूप में नितिन नवीन को देखा जा सकता है।
युवा नेतृत्व का संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नितिन नबीन के चयन पर कहा कि 25 साल में विकसित भारत के लक्ष्य को नितिन नबीन आगे बढ़ाएंगे। श्रीनिवासन ने बताया कि यह नियुक्ति युवाओं और नए वोटर्स के लिए संदेश देने का हिस्सा है कि बीजेपी युवा नेतृत्व को अवसर देती है और उन्हें जिम्मेदारी देती है। पार्टी के लिए यह कदम यह संदेश भी देता है कि रास्ते खुले हैं और युवा नेताओं के लिए अवसर उपलब्ध हैं। 45 वर्ष की उम्र में अध्यक्ष बनना, पार्टी में युवाओं को प्रेरित करने और सक्रियता बढ़ाने का संकेत है।

