बीमार BSNL में महाराजा ठाठ, प्रजा भुगते कर का भार
x

बीमार BSNL में 'महाराजा' ठाठ, प्रजा भुगते कर का भार

बीएसएनएल के एक वरिष्ठ अधिकारी की कथित वीआईपी मांगों पर विवाद छिड़ा हुआ है। सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग, जवाबदेही और वीआईपी संस्कृति पर बहस भी तेज हो गई है।


“यह शासन का मज़ाक है।” अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर बेजोन कुमार मिश्रा की यह तीखी प्रतिक्रिया उस समय सामने आई, जब एक वायरल आंतरिक नोट से खुलासा हुआ कि भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी दौरे के दौरान तौलिए, गाड़ियां और यहां तक कि अंडरगारमेंट्स जैसी विस्तृत व्यवस्थाओं की मांग की थी।

‘एआई विद संकेत’ के इस एपिसोड में द फेडरल ने प्रोफेसर मिश्रा और जनसंपर्क विशेषज्ञ दिलीप चेरियन, जो ‘परफेक्ट रिलेशंस’ के संस्थापक हैं, से प्रयागराज की प्रस्तावित यात्रा को लेकर बीएसएनएल के एक शीर्ष अधिकारी से जुड़ी इस विवादित घटना पर चर्चा की। चर्चा का केंद्र था—घाटे में चल रहे एक सार्वजनिक उपक्रम के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग का मामला। बताया गया कि यह दौरा तभी रद्द किया गया जब आंतरिक नोट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे व्यापक सार्वजनिक आक्रोश और शर्मिंदगी की स्थिति बनी।

50 कर्मचारी, 21 बिंदुओं की सूची

कार्यक्रम में साझा की गई जानकारी के अनुसार, आंतरिक परिपत्र में 21 बिंदुओं की विस्तृत रूपरेखा थी। इसमें लगभग 50 बीएसएनएल कर्मचारियों को निदेशक के दौरे के समन्वय के लिए तैनात करने, कई सफेद इनोवा क्रिस्टा गाड़ियों की व्यवस्था करने, नए तौलिये उपलब्ध कराने और “किट” तैयार करने के निर्देश शामिल थे। इन किटों में पानी की बोतलें, चॉकलेट, फलों का रस, चप्पल, साबुन, शैम्पू, तेल, कंघी, दर्पण और अंडरगारमेंट्स तक रखने की बात कही गई थी।

यह विवाद इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि भारत की सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल कई वर्षों से वित्तीय संकट से जूझ रही है। केंद्र सरकार द्वारा कई बार वित्तीय सहायता दिए जाने के बावजूद—जिसमें 2022 में स्पेक्ट्रम आवंटन और पुनर्गठन के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपये और 2023 में 89,047 करोड़ रुपये का पैकेज शामिल है—कंपनी अब भी निजी प्रतिस्पर्धियों से राजस्व और नेटवर्क विस्तार के मामले में पीछे है।

बीएसएनएल अभी तक 4जी विस्तार में काफी पिछड़ा हुआ है और 5जी क्षेत्र में भी पूरी तरह प्रवेश नहीं कर पाया है, जबकि निजी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

‘डिफॉल्ट वीआईपी’ संस्कृति

दिलीप चेरियन ने इस प्रकरण को एक व्यापक सामाजिक समस्या का लक्षण बताया। उन्होंने कहा, “सरकारी कर्मचारी या पदाधिकारी को परिभाषा के अनुसार वीआईपी मान लेने की संस्कृति… हमें इन व्यक्तियों को सामान्य नागरिक की तरह काम करने देना चाहिए, करदाताओं पर बोझ बनकर नहीं।”

उन्होंने कहा कि ऐसे मामले अपवाद नहीं हैं। “कुछ मामलों का पता चल जाता है, लेकिन कई तो सामने ही नहीं आते,” उन्होंने टिप्पणी की। उनके अनुसार, जब तक ऐसे मामलों को सार्वजनिक न किया जाए, तब तक सार्वजनिक पदों में ‘अधिकार भावना’ पर अंकुश नहीं लगता। चेरियन ने कहा कि शासन की विफलता अक्सर शीर्ष स्तर से शुरू होती है। “ऊपर सादगी होगी तो नीचे अनुशासन स्वतः आएगा,” उन्होंने कहा। यदि वरिष्ठ नेतृत्व संयम का उदाहरण नहीं पेश करेगा, तो अतिशयोक्ति की संस्कृति बनी रहेगी।

जवाबदेही पर सवाल

प्रोफेसर मिश्रा भी उतने ही स्पष्ट थे। उन्होंने पूछा, “सरकार के भीतर इतना वरिष्ठ अधिकारी इस प्रकार की सुविधाएं मांगने की हिम्मत कैसे कर सकता है? उनके अनुसार समस्या केवल व्यक्ति की नहीं, बल्कि संस्थागत है। उन्होंने बताया कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसी लेखा संस्थाओं ने बार-बार विभिन्न विभागों में गैर-जिम्मेदाराना खर्चों को उजागर किया है, लेकिन किसी की जवाबदेही तय नहीं होती।

मिश्रा ने पारदर्शिता तंत्र के क्षरण की ओर भी संकेत किया। उन्होंने 1996 में शुरू किए गए ‘सिटिज़न्स चार्टर’ की याद दिलाई, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं को जवाबदेह और मापनीय बनाना था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अवधारणा को मजबूती मिली, लेकिन मिश्रा के अनुसार व्यवहार में ऐसी जवाबदेही व्यवस्था कमजोर पड़ती गई है। “न पारदर्शिता है, न जवाबदेही। अधिकांश मामलों में तब तक कार्रवाई नहीं होती जब तक मामला सर्वोच्च स्तर तक न पहुंच जाए,” उन्होंने कहा।

‘महाराजा मानसिकता’

चर्चा में एक प्रमुख विषय ‘महाराजा मानसिकता’ रहा। मिश्रा ने दार्शनिक अंदाज में कहा, महाराजा प्रजा से ही बनता है। यानी जब तक जनता सहन करती रहेगी, वीआईपी संस्कृति कायम रहेगी। उन्होंने ‘जागो ग्राहक जागो’ का नारा दोहराते हुए नागरिकों से जवाबदेही मांगने की अपील की। “जब मैं कतार में खड़ा होता हूं और कोई महाराजा आता है, तो मैं उसे आगे नहीं जाने देता,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार परिवर्तन के लिए क्रांति नहीं, बल्कि निरंतर नागरिक सजगता की जरूरत है।

चेरियन ने भी कहा कि यह संस्कृति ऊपर से नीचे तक फैलती है। वे अपने ऊपर बैठे महाराजाओं को रिपोर्ट करते हैं, और वही संस्कृति नीचे तक पहुंचती है। उन्होंने यह भी कि आंतरिक ऑडिट अक्सर निष्पक्ष नहीं हो पाते क्योंकि वे महाराजा के बहुत करीब होते हैं।

सुधार बनाम संस्कृति

चर्चा में बीएसएनएल में किए गए सुधारों जैसे ऋण पुनर्गठन और आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत व्यय का भी उल्लेख हुआ। लेकिन इस कथित विलासिता ने दिखाया कि वित्तीय सुधारों के साथ सांस्कृतिक बदलाव नहीं हुआ है। कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि बीएसएनएल का प्रति उपयोगकर्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) निजी कंपनियों की तुलना में काफी कम है, जो प्रदर्शन और प्रशासनिक व्यवहार के बीच अंतर को उजागर करता है।

चेरियन ने समाधान के रूप में मजबूत पेशेवर निगरानी और बाहरी ऑडिट की आवश्यकता पर बल दिया। बीएसएनएल जैसी संरचनाओं में आंतरिक ऑडिट के साथ बाहरी ऑडिट भी उतना ही जरूरी है। मिश्रा ने कहा कि सुधार केवल क्षणिक आक्रोश से नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था से आएगा। उन्होंने मीडिया की भूमिका की सराहना की, क्योंकि सार्वजनिक जांच के बाद ही दौरा रद्द हुआ। यह कोई क्रांति नहीं थी, लेकिन खुलासे के कारण छोटा ही सही, बदलाव तो हुआ।

सफेद तौलिये का प्रतीक

बहस का एक प्रतीकात्मक पहलू नए सफेद तौलियों की मांग थी, जो भारत में लंबे समय से नौकरशाही विशेषाधिकार का दृश्य चिह्न माने जाते हैं चेरियन ने सफेद तौलिये को “राज्य की सुविधा” बताया और इसकी तुलना शाही पदचिह्न से की। मिश्रा ने बताया कि औपनिवेशिक काल में गैर-एसी दफ्तरों में आराम के लिए कपड़े के कवर का उपयोग होता था, लेकिन समय के साथ यह एक ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया।

तौलिये, गाड़ियों और किटों पर बहस पहली नजर में मामूली लग सकती है, लेकिन करदाताओं के धन पर निर्भर एक संघर्षरत सार्वजनिक उपक्रम के संदर्भ में इसका प्रतीकात्मक महत्व गहरा है।

बड़ा सवाल

अंततः चर्चा इस मूल प्रश्न पर लौट आई—क्या करदाताओं को सरकारी सहायता पर निर्भर सार्वजनिक संस्थानों में इस प्रकार के विशेषाधिकार को सहन करना चाहिए?

मिश्रा ने कहा कि सुधार की शुरुआत नागरिकों द्वारा अपने अधिकारों—पारदर्शिता, जवाबदेही, सूचना और निवारण—की मांग से होगी, जो उपभोक्ता संरक्षण कानूनों में निहित हैं।

चेरियन ने नेतृत्व की जिम्मेदारी और संरचनात्मक सुधारों पर जोर दिया। “आपको सरकारी खजाने पर बोझ कम करना होगा,” उन्होंने कहा, और पद-प्रतिष्ठा के नाम पर दिए जाने वाले औचित्य को निरर्थक बताया।

दोनों विशेषज्ञों की राय में यह विवाद केवल एक यात्रा या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक संस्थानों की संस्कृति और उन मानकों का प्रश्न है, जिन्हें नागरिक स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिए तैयार हैं।

Read More
Next Story