केंद्रीय योजना में बापू की वापसी : क्या ये मनरेगा से नाम हटाने का डैमेज कंट्रोल है?
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महात्मा गांधी ग्राम समाज योजना को लेकर कहा जा रहा है कि यह ग्रामीण रोजगार को नए ढांचे में लाती है।

केंद्रीय योजना में 'बापू' की वापसी : क्या ये 'मनरेगा' से नाम हटाने का डैमेज कंट्रोल है?

महात्मा गांधी के नाम पर यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'मनरेगा' का नाम बदलकर 'जीरामजी' कर देने के बाद केंद्र सरकार की भारी किरकिरी हो रही थी। अ्ब केंद्रीय बजट में सरकार ने महात्मा गांधी के नाम पर नई योजना की घोषणा कर दी है।


महात्मा गांधी ग्राम स्वरोजगार योजना यानी MGGSY। यह उस योजना का नाम है जिसकी घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण ने संसद में अपने बजट भाषण में की। सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि इस योजना को ऐसे समय में लाया गया है, जबकि 'मनरेगा' का नाम बदलने को लेकर बवाल अभी थमा नहीं है। संसद में भी इस पर बवाल हो चुका है। कांग्रेस 'मनरेगा' का नाम बदलकर 'जीरामजी' करने को लेकर लगातार प्रोटेस्ट कर रही है।

नई योजना मनरेगा से कितनी अलग?

उस विरोध की तपिश झेल रही केंद्र सरकार ने अब महात्मा गांधी के नाम पर ग्राम स्वरोजगार योजना लॉन्च करने की घोषणा की है। महात्मा गांधी ग्राम समाज योजना को लेकर कहा जा रहा है कि यह ग्रामीण रोजगार को नए ढांचे में लाती है। इसे मनरेगा से अलग तरह की योजना बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना का जोर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक उद्योगों को नए ढांचे में आगे बढ़ाने पर है।

इस योजना को टेक्सटाइल स्किल्स इको सिस्टम को मार्डन बनाने वाले समर्थ 2.0 मिशन से जोड़ा गया है। इस योजना में खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प को केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं. बल्कि मजबूत आजीविका मॉडल के रूप में खड़ा करने की कोशिश है। योजना पूरी तरह से प्राकृतिक, मानव निर्मित और न्यू एज फाइबर के साथ टेक्नोलॉजी, स्किल और बाजार कनेक्ट पर जोर देती है. जोकि गांव आधारित कारीगरी को संगठित सपोर्ट देकर रोजगार, प्रोडक्शन और इनकम को बढ़ाएगी।

गांव की कारीगरी को कैसे मिलेगा बढ़ावा?

महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल का मकसद गांवों में बिखरी कारीगरी को एक साझा प्लेटफॉर्म देना है. खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प को लोकल पहचान से निकालकर संगठित आजीविका मॉडल में बदला जाएगा. इसके लिए क्लस्टर बेस्ड काम, डिजाइन सपोर्ट, ट्रेनिंग और मार्केट कनेक्ट पर जोर दिया जाएगा.

योजना प्राकृतिक, मानव निर्मित और न्यू एज फाइबर के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली है, जिससे प्रोडक्ट मार्डन डिमांड के मुताबिक हों। इसमें लोकल कारीगरों को अच्छी क्वालिटी के टूल्स, डिजाइन के बारे में सही गाइडेंस और प्रोडक्ट बेचने के नए जरिए मिलेंगे। योजना का मकसद यह है कि गांव में बनने वाला प्रोडक्ट सीधे मार्केट तक पहुंचे और कारीगर को उसके काम की सही कीमत मिले।

कौन होंगे लाभार्थी?

अब सवाल ये है कि महात्मा गांधी ग्राम स्वरोजगार योजना का फायदा किस तबके को होगा? तो आपको बता दें कि इस योजना का लाभ बढ़ई, हैंडलूम कारीगर, कालीन बुनकर, खादी और हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों को मिलेगा। सरकार मार्डन मशीनें और टूल्स खरीदने में मदद देगी, जिससे काम की स्पीड और क्वालिटी दोनों बेहतर हों। समर्थ 2.0 मिशन के जरिए टेक्सटाइल स्किल्स इको सिस्टम को अपडेट किया जाएगा, जिससे ट्रेनिंग, टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग एक साथ जुड़ें।

इसमें कारीगरों की सालाना आय बढ़ाने पर खास फोकस रहेगा। बेहतर प्रोडक्शन, बेहतर पैकेजिंग और सीधे बाजार से जुड़ाव से उनके उत्पाद की मांग बढ़ेगी। इससे पारंपरिक हुनर केवल जीवित नहीं रहेगा. बल्कि अच्छी कमाई का जरिया बनेगा।

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