
संसद बनाम संतुलन, CEC विवाद ने उठाए जवाबदेही के बड़े सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव खारिज होने के बाद सवाल उठ रहे हैं। क्या पीठासीन अधिकारी शुरुआती चरण में ही आरोपों की गहराई से जांच कर सकते हैं।
6 अप्रैल 2026 को दो आदेशों के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के प्रस्ताव को समाप्त कर दिया गया। राज्यसभा अध्यक्ष और लोकसभा अध्यक्ष—दोनों ने पंद्रह पन्नों से अधिक के तर्कपूर्ण आदेश जारी किए। इनमें से कोई भी आदेश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों को उनकी प्रतियां दी गईं। पत्रकारों ने तब से अध्यक्ष के आदेश को देखा और उससे उद्धरण दिए हैं, जबकि लोकसभा अध्यक्ष के आदेश का केवल सार सामने आया है। यह विवरण इन्हीं रिपोर्टों पर आधारित है।
इस अस्वीकृति ने एक संवैधानिक प्रश्न खड़ा किया है—क्या किसी हटाने (रिमूवल) के प्रस्ताव को स्वीकार करने के शुरुआती चरण में पीठासीन अधिकारी उसकी योग्यता (मेरिट) का कितना मूल्यांकन कर सकता है? न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 उसे प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार देता है, लेकिन यह नहीं बताता कि यह निर्णय किस दृष्टिकोण से लिया जाना चाहिए। यह द्वार ही वह एकमात्र बाधा है जो किसी संवैधानिक पदाधिकारी और जांच समिति के बीच मौजूद है।
एक तुलना उपयोगी है। अप्रैल 2018 में, तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, जो उस समय राज्यसभा के अध्यक्ष थे, ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ हटाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उनका दस पन्नों का आदेश 1968 के अधिनियम के तहत ऐसा एकमात्र पूर्व उदाहरण है, जिसमें प्रारंभिक स्तर पर प्रस्ताव को अस्वीकार किया गया। इस निर्णय की कड़ी आलोचना हुई थी। विपक्ष ने कुछ समय के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और फिर याचिका वापस ले ली। 6 अप्रैल के आदेश अब उसी राह पर चलते दिखाई देते हैं।
प्रारंभिक चरण, मुकदमा नहीं
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 चार चरणों की प्रक्रिया निर्धारित करता है:
पहला चरण: लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस।
दूसरा चरण: पीठासीन अधिकारी द्वारा उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय।
तीसरा चरण: दो न्यायाधीशों और एक विधिवेत्ता की तीन-सदस्यीय समिति, जो साक्ष्य सुनती है और निष्कर्ष देती है।
चौथा चरण: दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव।
हर चरण का अपना अलग कार्य है। प्रारंभिक चरण केवल एक छानने की प्रक्रिया है, न कि मुकदमे जैसा परीक्षण।
2018 में नायडू के आदेश ने एक समस्या उजागर की थी, जिसे 6 अप्रैल का आदेश भी दोहराता है। उन्होंने स्वीकार्यता को एक तरह की प्रारंभिक जांच बना दिया। उन्होंने यह मान लिया कि नोटिस में कही गई हर बात सत्य है, और फिर यह देखा कि क्या यह भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(4) के तहत “सिद्ध दुराचार” (proved misbehaviour) बनती है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ऐसा नहीं है और आरोपों को संदेह, अनुमान और कल्पना बताया।
समस्या स्पष्ट है—“संदेह से परे प्रमाण” (beyond reasonable doubt) आपराधिक मुकदमे का मानदंड है, जो समिति के चरण पर लागू होना चाहिए, न कि प्रारंभिक स्तर पर। प्रारंभिक चरण का काम सीमित है—संख्या की पुष्टि करना और यह देखना कि आरोप प्रथम दृष्टया दुराचार की श्रेणी में आते हैं या नहीं।
वही ढांचा, आठ साल बाद
6 अप्रैल का आदेश लगभग उसी भाषा और परीक्षण को अपनाता है। अध्यक्ष का कहना है कि आरोप दुराचार सिद्ध करने के लिए आवश्यक प्रमाणों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे उच्च संवैधानिक मानक को पूरा नहीं करते। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा आरोप अनुमानात्मक बताया गया।
6 अप्रैल के आदेश की नई बातें
यह आदेश दो मामलों में आगे जाता है।पहला, “न्यायालय में लंबित” (sub judice) का तर्क। कई आरोप बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और डेटा प्रबंधन से जुड़े थे, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे मामलों को दुराचार का आधार बनाना उचित नहीं।
यह तर्क एक जाल जैसा बनाता है यदि अदालत ने फैसला नहीं दिया, तो आरोप समयपूर्व हैं। यदि फैसला CEC के खिलाफ है, तो उपाय अवमानना है। यदि पक्ष में है, तो वे निर्दोष हैं। हर स्थिति में संसद की हटाने की शक्ति समाप्त हो जाती है।
दूसरा मुद्दा नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 के तहत चयन समिति में बदलाव किया गया, जिसे अनीप बरनवाल बनाम भारत संघ के निर्णय से अलग बताया गया है। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अध्यक्ष का कहना है कि केवल लंबित चुनौती दुराचार नहीं बनती।
दो विरोधाभास
पहला, ओम बिड़ला से जुड़ा है। जुलाई 2025 में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ दोनों सदनों में एक साथ प्रस्ताव लाए गए। इस स्थिति में संयुक्त कार्रवाई अपेक्षित थी, लेकिन तत्कालीन अध्यक्ष जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद भी लोकसभा अध्यक्ष ने अकेले ही जांच समिति बना दी।बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में खामियां तो मानीं, पर उन्हें इतना गंभीर नहीं माना कि समिति को रद्द किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि सचिवालय द्वारा “सार्थक जांच” (substantive scrutiny) करना अधिनियम में नहीं है—यह टिप्पणी भविष्य के लिए मार्गदर्शक थी।
यही बात 6 अप्रैल के आदेश पर लागू होती है—जो काम सचिवालय को नहीं करना चाहिए था, वह अब स्वयं अध्यक्ष द्वारा किया गया।दूसरा विरोधाभास यह है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव के खिलाफ प्रस्ताव एक साल से लंबित है, जबकि ज्ञानेश कुमार के मामले में मात्र 25 दिनों में निर्णय हो गया।
बचाव के तर्क और उनकी सीमाएं
इस आदेश के समर्थन में तीन तर्क दिए जाते हैं: धारा 3(1) में “may” शब्द अध्यक्ष को विवेक देता है। पर यह असीमित जांच का अधिकार नहीं है।
विपक्ष के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं था। लेकिन यह गणित अध्यक्ष का विषय नहीं है।आरोप राजनीतिक थे। इन्हें जांच समिति ही परख सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324(5) ने मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान सुरक्षा दी, ताकि यह पद संसदीय बहुमत के दबाव से मुक्त रहे। यह उच्च मानक सुरक्षा के लिए था—प्रतिरक्षा (immunity) देने के लिए नहीं।

