
महिला आरक्षण में परिसीमन का ‘छुपा प्लान’, सरकार की रणनीति से विपक्ष बेचैन
केंद्र सरकार महिलाओं के आरक्षण को जल्द लागू करने की योजना को परिसीमन से जोड़ रही है, जिससे प्रतिनिधित्व असंतुलित होने की आशंका बढ़ गई है।
16 अप्रैल को बजट सत्र के विस्तारित तीन दिवसीय सत्र के लिए संसद की बैठक फिर से शुरू होने में अब केवल पांच दिन बचे हैं। ऐसे में विपक्ष के सामने एक जटिल चुनौती है। उसे यह तय करना है कि वह केंद्र की उस चतुर योजना पर अपनी आपत्तियां कैसे व्यक्त करे, जिसमें महिलाओं के आरक्षण को जल्दी लागू करने को लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के साथ जोड़ा जा रहा है—और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि वह चुनावी राजनीति में महिलाओं के लंबे समय से लंबित प्रतिनिधित्व के वादे में बाधा डालता हुआ न दिखे।
इस मुद्दे को विपक्ष के लिए यह तथ्य और जटिल बना देता है कि केंद्र ने अभी तक प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन विधेयकों का मसौदा विपक्षी दलों के साथ साझा नहीं किया है। इन विधेयकों के जरिए 2029 के लोकसभा चुनावों तक महिलाओं के आरक्षण को लागू करने और उससे पहले लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन को पूरा करने की योजना है। इन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल के बीच होने वाले विस्तारित सत्र में संसद के समक्ष पेश किया जाएगा।
विपक्ष की साझा रणनीति
15 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक कर सकते हैं, ताकि लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी के केंद्र के प्रस्ताव का मुकाबला करने के लिए एक “साझा ठोस रणनीति” तैयार की जा सके।
शुक्रवार (10 अप्रैल) को कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था, कांग्रेस कार्य समिति (CWC), ने दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय इंदिरा भवन में बैठक कर इस बात पर मंथन किया कि पार्टी और उसके सहयोगी किस तरह केंद्र की उस योजना का जवाब दें, जिसके तहत महिलाओं के आरक्षण को जल्दी लागू करने के साथ ही लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 सांसद करने का प्रस्ताव है।
पिछले महीने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अनौपचारिक रूप से कुछ विपक्षी नेताओं के साथ ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ में संशोधन के केंद्र के प्रस्ताव को साझा किया था।
यह अधिनियम, जो सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र में पारित हुआ था, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के पूर्ण होने और उसके बाद परिसीमन प्रक्रिया के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का मार्ग प्रशस्त करता है।
विपक्ष, जिसने इस अधिनियम को संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित कराने के लिए केंद्र का सहयोग किया था, ने महिलाओं के आरक्षण को लागू करने की अनिश्चित समय-सीमा पर आपत्ति जताई थी। मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 33 प्रतिशत आरक्षण को जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से अलग करने की मांग की थी, लेकिन उन्हें बताया गया कि ऐसा करना संविधान के खिलाफ होगा।
केंद्र द्वारा लगभग 30 महीने पहले लिए गए अपने रुख से अचानक पलटने (यू-टर्न) ने विपक्ष को राजनीतिक स्वार्थ के आरोप लगाने का मौका दे दिया है। कांग्रेस और INDIA गठबंधन के नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित बदलाव पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौरान लागू आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं, जहां इस महीने के अंत में मतदान होना है। वहीं केरल, पुडुचेरी और असम में 9 अप्रैल (गुरुवार) को मतदान समाप्त हो चुका है।
कांग्रेस ने परिसीमन पर जताई चिंता
शुक्रवार को हुई CWC बैठक में खरगे ने अपने सहयोगियों से कहा कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदान से ठीक पहले इन विधेयकों को संसद में जल्दबाजी में पारित कराकर “राजनीतिक लाभ उठाना” चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के साथ जोड़ा गया परिसीमन “हमारी चुनावी व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डालेगा।”
CWC की चर्चा से जुड़े सूत्रों ने बताया कि बैठक में मौजूद कई वरिष्ठ नेताओं की “एकमत राय” थी कि परिसीमन का “कड़े से कड़ा विरोध किया जाना चाहिए”, लेकिन साथ ही यह भी सावधानी बरतने की जरूरत है कि पार्टी का रुख गलत तरीके से पेश न किया जाए। नेताओं ने कहा कि “हम महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, लेकिन केंद्र द्वारा मनमाने तरीके से थोपे जा रहे परिसीमन के फॉर्मूले का विरोध करते हैं।”
राज्यों के नेताओं की आपत्ति
कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने बताया कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने CWC में कहा कि केंद्र का प्रस्तावित परिसीमन फॉर्मूला “न तो दक्षिणी राज्यों को लाभ देगा, न ही उत्तर और पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों को... बल्कि कुछ बड़े राज्यों को छोड़कर बाकी सभी हाशिये पर चले जाएंगे।”
सूत्रों के अनुसार, रेवंत रेड्डी ने यह भी दोहराया कि यदि लोकसभा की सीटें 816 कर दी जाती हैं, तो तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक मिलकर केवल “195 सीटों” तक सीमित रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि सभी राज्यों के लिए 50 प्रतिशत सीट वृद्धि का प्रस्ताव “भ्रामक” है और इससे सत्ता का संतुलन दक्षिणी और छोटे राज्यों के खिलाफ झुक जाएगा। इससे केंद्र के बजट आवंटन पर भी असर पड़ सकता है।
असंतुलित प्रतिनिधित्व की आशंका
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने भी इस 50 प्रतिशत वृद्धि वाले फॉर्मूले का विरोध किया।
मनीष तििवारी ने चेतावनी दी कि परिसीमन के खिलाफ तर्क को “उत्तर बनाम दक्षिण” की बहस के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि विपक्ष को साफ तौर पर समझाना होगा कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों को लोकसभा में उचित प्रतिनिधित्व से वंचित किया जा सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों को अनुपात से अधिक प्रभाव मिल जाएगा और वे यह तय करने की स्थिति में आ जाएंगे कि केंद्र में बहुमत किसे मिलेगा।
कई पार्टी नेताओं, जिनमें वरिष्ठ सांसद पी चिदंबरम भी शामिल थे (जो CWC बैठक में वर्चुअली जुड़े थे), ने “816 सदस्यों वाली लोकसभा की प्रभावशीलता” पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि “मौजूदा 543 सांसदों की संख्या में भी सदस्यों को सदन में बोलने के लिए 30 सेकंड का समय पाने के लिए स्पीकर से गुहार लगानी पड़ती है।”
सूत्रों के अनुसार, कुछ नेताओं ने यह भी बताया कि पिछले 12 वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान संसद के कामकाज के दिनों की संख्या घटकर औसतन 55 दिन प्रति वर्ष रह गई है। ऐसे में केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से कोई खास फायदा नहीं होगा, जब “संसद का कामकाज ही गंभीर रूप से सीमित कर दिया गया है।”
सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 15 अप्रैल को विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं से मुलाकात में इन सभी मुद्दों को उठाएंगे और प्रस्तावित विधेयकों पर सहयोगी दलों की राय लेंगे, जिसके बाद INDIA गठबंधन एक “साझा रुख” तय करेगा।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल सरकार से यह भी अपील कर सकते हैं कि इन विधेयकों को तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में मतदान समाप्त होने (जो बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के साथ खत्म होगा) के बाद ही पेश और पारित किया जाए। साथ ही, उससे पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष के सुझाव लिए जाएं। हालांकि, कांग्रेस नेताओं ने माना कि केंद्र द्वारा इस मांग को मानने की संभावना बहुत कम है।
निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन को लेकर चिंता
हालांकि CWC में इस पर सीमित चर्चा हुई, लेकिन विपक्ष को सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि परिसीमन के दौरान निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किस तरह किया जाएगा।
विपक्ष के भीतर यह आशंका गहराई से मौजूद है कि परिसीमन प्रक्रिया—जिसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्तों वाली एक आयोग द्वारा अंतिम रूप दिया जाएगा—कई राज्यों में भाजपा के पक्ष में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं इस तरह तय कर सकती है, जिसे गेरिमैंडरिंग (Gerrymandering) कहा जाता है।
CWC के एक सदस्य ने कहा, “पिछले पांच वर्षों में हमने लोकसभा और विधानसभा स्तर पर परिसीमन के दो उदाहरण देखे हैं—पहला असम में और दूसरा जम्मू-कश्मीर में। दोनों ही मामलों में इस प्रक्रिया पर भाजपा के प्रभाव की स्पष्ट छाप दिखी।”
उन्होंने आगे कहा, “असम में हालिया चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में देखा गया कि कांग्रेस के मजबूत क्षेत्रों को इस तरह विभाजित किया गया कि हमारे पारंपरिक वोटरों का बड़ा हिस्सा अलग हो गया। कई सीटें, जो पहले अल्पसंख्यक बहुल थीं, उन्हें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया गया, या फिर अल्पसंख्यक आबादी वाले इलाकों को अलग-अलग सीटों में बांटकर जनसंख्या संतुलन इस तरह बदला गया कि भाजपा को फायदा मिले। जम्मू-कश्मीर में भी हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में सीटों की संख्या बढ़ाई गई।”
उन्होंने सवाल उठाया, “अब अगर यही प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर लागू की जाती है, ऐसे समय में जब चुनाव आयोग—खासतौर पर मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं, तो हम निष्पक्ष परिसीमन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?”
इसी तरह की चिंता जताते हुए समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद (जो संसद सत्र के दौरान खरगे की विपक्षी नेताओं के साथ बैठकों में नियमित रूप से शामिल होते हैं) ने कहा, “जब हमें आज के चुनाव आयोग से ही शिकायतों के निपटारे या मतदाता सूची बनाने में निष्पक्षता की उम्मीद नहीं है, तो पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के दौरान निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? 2029 में महिलाओं का आरक्षण लागू करना तो सिर्फ एक बहाना है; असल में सरकार परिसीमन से इसे जोड़कर लंबे समय तक चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में ढालना चाहती है। यही विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही परिसीमन आयोग में सभी दलों के सांसद और विधायक शामिल होते हैं, लेकिन अंतिम फैसला उनके हाथ में नहीं होता—यह निर्णय आयोग के अध्यक्ष (सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज), मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त लेते हैं।

