क्या ट्रेड यूनियन विकास में बाधा हैं? CJI की टिप्पणी पर संवैधानिक मंथन
x

क्या ट्रेड यूनियन विकास में बाधा हैं? CJI की टिप्पणी पर संवैधानिक मंथन

CJI सूर्यकांत की ट्रेड यूनियनों पर टिप्पणी ने श्रम अधिकारों, न्यायिक मर्यादा और आर्थिक नीतियों में अदालतों की भूमिका को लेकर नई संवैधानिक बहस छेड़ दी है।


Trade Unions News: सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियां अक्सर अदालत की चारदीवारी से बाहर तक असर डालती हैं, लेकिन कुछ टिप्पणियां दूसरों की तुलना में कहीं अधिक दूर तक जाती हैं। हाल ही में एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने जब यह टिप्पणी की कि औद्योगिक विकास को रोकने के लिए “काफी हद तक ट्रेड यूनियन नेता जिम्मेदार हैं और कई पारंपरिक उद्योग झंडा यूनियनों की वजह से बंद हो गए, तो यह बयान एक सामान्य न्यायिक कार्यवाही से निकलकर संवैधानिक बहस के क्षेत्र में पहुंच गया।

यह टिप्पणी घरेलू कामगारों के कल्याण से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई थी, जिसे अंततः सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के योग्य नहीं माना। लेकिन इस टिप्पणी का महत्व उस संकेत में है, जो यह श्रम से जुड़े सवालों पर न्यायपालिका की भूमिका के बारे में देती है। जब न्यायपालिका का सर्वोच्च पद संभालने वाला व्यक्ति व्यापक आर्थिक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है, तो स्वाभाविक रूप से संस्थागत प्रश्न खड़े होते हैं। अदालतें व्यापक आर्थिक नीतियों पर कितनी दूर तक टिप्पणी कर सकती हैं, और तब क्या होता है जब ऐसी टिप्पणियां संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्रताओं को छूती हैं?

ट्रेड यूनियनों की संवैधानिक स्थिति: एक बहुस्तरीय दृष्टि

इस टिप्पणी से उत्पन्न असहजता को समझने के लिए ट्रेड यूनियनों की संवैधानिक स्थिति पर दोबारा नज़र डालना जरूरी है। एक ऐसी स्थिति, जिसे सार्वजनिक विमर्श अक्सर सरल बना देता है। अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत संघ बनाने का अधिकार स्पष्ट रूप से संरक्षित है। संविधान लागू होने के शुरुआती दशकों से ही सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि श्रमिकों को संगठित होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

हालांकि, अदालत ने हर सामूहिक सौदेबाजी के औजार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने से भी परहेज किया। यह संतुलित दृष्टिकोण पहली बार स्पष्ट रूप से ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन बनाम नेशनल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल (1962) के फैसले में सामने आया, जहां कोर्ट ने कहा कि यूनियन बनाने का अधिकार मौलिक है, लेकिन यूनियन के हर उद्देश्य जैसे हड़ताल का लागू करने योग्य अधिकार को स्वतः मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता।

इस फैसले ने एक वैचारिक सीमा रेखा खींची, जिसने भारतीय श्रम कानून की न्यायिक व्याख्या को दिशा दी: संगठन बनाने की स्वतंत्रता मौलिक है, लेकिन औद्योगिक कार्रवाई के तरीके नियमन के अधीन रहेंगे।

दो संवैधानिक अवधारणाओं के बीच संतुलन

इसके बाद के फैसलों ने इस सिद्धांत को छोड़ा नहीं, बल्कि उसे और परिष्कृत किया। कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य (1962) में कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को संरक्षण दिया, लेकिन हड़ताल पर प्रतिबंध को सही ठहराया। इससे यह मान्यता मिली कि विरोध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति है, जबकि काम ठप करना अधिक सावधानी का विषय है।

फिर बी.आर. सिंह बनाम भारत संघ (1989) में अदालत ने कहा कि उचित संदर्भ में हड़ताल श्रमिकों के हथियारों में से एक हो सकती है, भले ही वह मौलिक अधिकार न हो। लेकिन टी.के. रंगराजन बनाम तमिलनाडु सरकार (2003) में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। यह फैसला प्रशासनिक ठहराव और आवश्यक सेवाओं में बाधा को लेकर न्यायपालिका की चिंता को दर्शाता है।

इन सभी फैसलों को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा दो संवैधानिक प्रवृत्तियों के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है। एक ओर श्रमिकों की सामूहिक आवाज़ की लोकतांत्रिक वैधता, और दूसरी ओर आर्थिक एवं प्रशासनिक निरंतरता की आवश्यकता। यही नाजुक संतुलन ट्रेड यूनियनों पर की गई व्यापक न्यायिक टिप्पणियों को संस्थागत रूप से महत्वपूर्ण बना देता है।

न्यायपालिका को अधिक सतर्क क्यों रहना चाहिए

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी एक परिचित आर्थिक तर्क पर आधारित लगती है कि अत्यधिक यूनियनकरण निवेश को हतोत्साहित करता है, उद्योगों को बंद करवा सकता है और प्रतिस्पर्धा घटाता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से यह तर्क वैश्विक स्तर पर श्रम सुधार और बाजार लचीलेपन की बहसों में सुना जाता रहा है।

लेकिन संवैधानिक न्यायनिर्णय की प्रकृति नीति-बहस से अलग होती है। सामान्य आर्थिक दावे आमतौर पर साक्ष्य पर आधारित होने चाहिए। समस्या यह नहीं है कि न्यायाधीश आर्थिक प्रभावों पर बात न करें। अदालतें अक्सर यह अनुमान लगाती हैं कि किसी फैसले के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं। कठिनाई तब आती है, जब ऐसे तर्क ऐतिहासिक दावों का रूप ले लेते हैं जैसे यह कहना कि देश भर में पारंपरिक उद्योग यूनियनों की वजह से बंद हो गए बिना किसी ऐसे तथ्यात्मक रिकॉर्ड के, जिसे प्रतिपक्षीय बहस से परखा गया हो।

न्यायिक सत्ता के शब्दों में ज्ञान का विशेष भार होता है। जो बात सामान्य संदर्भ में एक राय हो सकती है, वही पीठ से कही जाए तो संस्थागत सत्य का रूप ले लेती है।

अकादमिक दृष्टिकोण

श्रम कानून पर अकादमिक शोध इस मुद्दे को समझने का एक उपयोगी नजरिया देता है। प्रोफेसर कमला शंकरन ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में श्रम विनियमन पर लिखते हुए बार-बार यह तर्क दिया है कि श्रम अधिकारों को केवल बाजार के चर के रूप में नहीं, बल्कि गरिमा और नागरिकता से जुड़े अधिकारों के रूप में देखा जाना चाहिए। जहां कार्यबल का बड़ा हिस्सा असंगठित है, वहां सामूहिक संगठन ही अक्सर समानता के संवैधानिक वादे तक पहुंचने का माध्यम बनता है।

इसी तरह, प्रोफेसर बाबू मैथ्यू का शोध चेतावनी देता है कि नियामक सुधार कई बार सौदेबाजी की शक्ति को चुपचाप बदल देता है और यदि प्रभावी श्रमिक प्रतिनिधित्व न हो, तो पूंजी को अधिक लाभ पहुंचाता है। इस दृष्टि से औद्योगिक संबंधों का स्वास्थ्य यूनियनों की अनुपस्थिति से नहीं, बल्कि विश्वसनीय संवाद तंत्र की मौजूदगी से तय होता है।

ये दृष्टिकोण यह नहीं कहते कि औद्योगिक संघर्ष उत्पादकता को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। बल्कि वे एक ही कारण को जिम्मेदार ठहराने से सावधान करते हैं। औद्योगिक पतन आमतौर पर तकनीकी बदलाव, वित्तीय स्थितियों, प्रबंधन रणनीतियों, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और नीतिगत निर्णयों का संयुक्त परिणाम होता है।

सीजेआई की टिप्पणी को कैसे समझा जाए?

इस टिप्पणी को केवल संगठित श्रम के प्रति विरोध के रूप में देखना भी सरलीकरण होगा। इसे आर्थिक अव्यवस्था को लेकर न्यायपालिका की उस पुरानी चिंता के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जो आवश्यक सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र की हड़तालों और प्रशासनिक निरंतरता से जुड़े मामलों में दिखती रही है। अदालतें अक्सर स्वयं को केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि संस्थागत स्थिरता की संरक्षक भी मानती हैं।

लेकिन मूल प्रश्न यही है कि जब संवैधानिक स्वतंत्रताएं दांव पर हों, तो न्यायिक वक्तव्य कितने संतुलित और सटीक होने चाहिए। संघ बनाने का अधिकार लोकतांत्रिक ढांचे की नींव है। यदि यूनियनों को केवल बाधा के रूप में देखा जाए, तो प्रतीकात्मक संतुलन बदल जाता है।

घरेलू कामगारों की जिस याचिका के दौरान यह टिप्पणी आई, वह भले ही खारिज हो चुकी हो, लेकिन उससे उपजी संवैधानिक चर्चा जल्द खत्म होने वाली नहीं है। ट्रेड यूनियन भारतीय श्रम व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें बनाने का अधिकार अब भी न्यायिक रूप से संरक्षित है।

अब सवाल यह नहीं है कि अदालतें श्रम विवादों के आर्थिक पहलुओं पर बात करें या नहीं यह तो वे करेंगी ही। सवाल यह है कि क्या यह संवाद साक्ष्य, संवैधानिक स्मृति और न्यायिक मर्यादा के अनुरूप रह पाएगा। क्योंकि जब अदालतें उन संस्थानों पर बोलती हैं, जो श्रमिकों की आवाज़ को संगठित करते हैं, तो वे केवल आर्थिक इतिहास पर टिप्पणी नहीं करतीं वे उस मानक क्षितिज को आकार देती हैं, जिसके भीतर संघ बनाने की स्वतंत्रता को समझा जाता है।

Read More
Next Story