
ओडिशा में सख्ती, बिहार-हरियाणा में संकोच, क्रॉस-वोटिंग से कांग्रेस रणनीति पर सवाल
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस-वोटिंग से कांग्रेस को तीन राज्यों में झटका लगा। ओडिशा में सख्ती दिखी, जबकि बिहार-हरियाणा में कार्रवाई को लेकर नेतृत्व असमंजस में है।
कांग्रेस पार्टी पहले ही भारतीय जनता पार्टी समर्थित उम्मीदवारों की जीत में अपने विधायकों की भूमिका के कारण शर्मिंदगी झेल रही थी। 16 मार्च को हुए राज्यसभा चुनावों में बिहार, हरियाणा और ओडिशा में हुई घटनाओं के बाद अब पार्टी के सामने यह मुश्किल सवाल खड़ा है कि असंतुष्ट विधायकों के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
ओडिशा में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास ने तुरंत कार्रवाई करते हुए विधायकों सोफिया फिरदौस, दसरथी गमांगो और रमेश जेना को क्रॉस-वोटिंग के आरोप में निलंबित कर दिया। उन्होंने कहा कि इन तीनों को न सिर्फ पार्टी से निकाला जाएगा, बल्कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता भी समाप्त कराने की कोशिश की जाएगी।
क्रॉस-वोटिंग से दिलीप रे की जीत
सोफिया फिरदौस, गमांगो, जेना और नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी के आठ विधायकों की क्रॉस-वोटिंग से भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और होटल व्यवसायी दिलीप रे को जीत मिली। उन्होंने बीजेडी-कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार दत्तेश्वर होता को हराया।जहां ओडिशा में त्वरित कार्रवाई हुई, वहीं बिहार और हरियाणा में कांग्रेस की प्रतिक्रिया धीमी रही, जिससे पार्टी की हिचकिचाहट साफ नजर आई।
हरियाणा में मुश्किल से जीत
हरियाणा में कांग्रेस उम्मीदवार करमवीर बौद्ध, जिन्हें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुना था, बहुत मामूली अंतर से जीत पाए। कांग्रेस के पास 37 विधायक थे, जबकि जीत के लिए 31 वोटों की जरूरत थी, लेकिन बौद्ध को सिर्फ 28 वोट मिले—जो भाजपा समर्थित उम्मीदवार सतीश नांदल से मात्र एक अधिक था।इस दौरान कांग्रेस के पांच विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की, जबकि चार विधायकों के वोट अमान्य घोषित हो गए। इससे पार्टी को एक और झटका लगा।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और पार्टी प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने दावा किया कि उन्हें “गद्दारी करने वाले” विधायकों की पहचान पता है, लेकिन कार्रवाई में देरी हुई। अंततः कुछ विधायकों को केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
बिहार में भी झटका
बिहार में कांग्रेस और उसके सहयोगियों को एक और झटका लगा। कांग्रेस के छह में से तीन विधायक मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र कुशवाहा और मनोज बिश्वास वोट डालने नहीं पहुंचे। इससे विपक्ष के उम्मीदवार एडी सिंह की हार तय हो गई और भाजपा के शिवेश राम की जीत हुई।इस चुनाव में एनडीए ने पूरी तरह जीत दर्ज की, जिसमें नीतीश कुमार, उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा नेता नितिन नवीन भी निर्विरोध चुने गए।
अंदरूनी संकट उजागर
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ओडिशा में जहां कड़ी कार्रवाई की जा रही है, वहीं बिहार और हरियाणा में नेतृत्व जल्दबाजी से बच रहा है। इसके पीछे कारण यह है कि अगर ज्यादा विधायकों पर कार्रवाई हुई तो वे पार्टी छोड़ सकते हैं, जिससे स्थिति और खराब हो सकती है।ओडिशा में सोफिया फिरदौस ने कहा कि पार्टी को उनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन नेतृत्व को यह भी समझना चाहिए कि उन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ जाने का फैसला क्यों लिया।
गुटबाजी से जूझती हरियाणा कांग्रेस
हरियाणा में कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है जिनका नेतृत्व भूपिंदर सिंह हुड्डा, शैलजा, रणदीप सुरजेवाला और बिरेंद्र सिंह कर रहे हैं। क्रॉस-वोटिंग ने इन गुटों के बीच टकराव को और बढ़ा दिया है।कुछ नेताओं का आरोप है कि गुटबाजी के कारण ही विधायक पार्टी लाइन से हटे। यह भी कहा जा रहा है कि यह कोई नई बात नहीं है। 2016 और 2022 में भी इसी तरह की घटनाएं हुई थीं।
राज्यसभा चुनावों ने कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरियों और नेतृत्व संकट को उजागर कर दिया है। पार्टी अब एक कठिन स्थिति में है, जहां उसे अनुशासन बनाए रखने और विधायकों को एकजुट रखने के बीच संतुलन बनाना होगा।

