रोहित वेमुला के मौत के एक दशक बाद भी अधूरा इंसाफ! Rohith Act की मांग बरकरार
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रोहित वेमुला के मौत के एक दशक बाद भी अधूरा इंसाफ! 'Rohith Act' की मांग बरकरार

छात्र संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में भेदभाव खुलकर नहीं दिखता। यह अक्सर सूक्ष्म तरीकों से सामने आता है।


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'मेरा जन्म ही मेरी जानलेवा दुर्घटना है।' दस साल पहले रोहित वेमुला के अंतिम पत्र की ये पंक्तियां देश को एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कर गई थीं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति खत्म नहीं होती, बल्कि नए रूप में मौजूद रहती है। यह व्यवस्था के भीतर समा जाती है और अक्सर जवाबदेही से बच निकलती है। एक दशक बीत जाने के बाद भी देशभर के छात्र रोहित एक्ट की मांग कर रहे हैं। यह मांग केवल रोहित वेमुला की स्मृति को जीवित रखने की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को कानूनी रूप से स्वीकार किया जाए, उसे रोका जाए और दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो। यह मांग इसलिए थमी नहीं है, क्योंकि जिन हालातों ने रोहित को आत्महत्या के लिए मजबूर किया, वे आज भी काफी हद तक मौजूद हैं।

सिस्टम बेनकाब

रोहित वेमुला आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले से ताल्लुक रखने वाले 26 वर्षीय पीएचडी स्कॉलर थे और हैदराबाद विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य थे। जनवरी 2016 में लंबे समय तक चले संस्थागत उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निलंबन के बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली। रोहित की मौत ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरे पैठे जातिगत भेदभाव को उजागर कर दिया और पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। इस घटना ने उन सवालों को सामने ला खड़ा किया, जिनसे संस्थान लंबे समय से बचते आए थे—सत्ता, बहिष्कार और जवाबदेही से जुड़े सवाल।

इसके बाद पायल तडवी और दर्शन सोलंकी जैसे कई अन्य मामले सामने आए, जिन्होंने छात्रों के इस दावे को और मजबूत किया कि रोहित की मौत कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक दोहराया जाने वाला पैटर्न है। छात्रों का कहना है कि ये घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि हाशिए पर खड़े लोगों की जान अक्सर संस्थानों को झकझोरने के लिए भी काफी नहीं होती।

कैसे कैंपस में आकार लेता है भेदभाव

छात्र संगठनों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में भेदभाव खुलकर नहीं दिखता। यह अक्सर सूक्ष्म तरीकों से सामने आता है—क्लासरूम में व्यवहार, मूल्यांकन प्रणाली, रिसर्च गाइड तक पहुंच, फेलोशिप, हॉस्टल सुविधाएं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसे मामलों में। हालांकि, विश्वविद्यालयों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल (EOC) और आंतरिक समितियां मौजूद हैं, लेकिन छात्रों का आरोप है कि ये संस्थाएं कमजोर, प्रभावहीन और जवाबदेही से मुक्त हैं। जब शिकायत निवारण की व्यवस्था ही विफल हो जाती है तो हाशिए के छात्रों पर अकेले ही सब कुछ सहने का बोझ आ जाता है। छात्रों के मुताबिक यही वजह है कि कानूनी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।

कर्नाटक का अधूरा प्रयोग

साल 2025 में कर्नाटक सरकार ने इस कमी को दूर करने के लिए रोहित वेमुला एक्ट का प्रस्ताव रखा। इस ड्राफ्ट बिल में राज्य के सरकारी, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों को शामिल किया गया था। प्रस्तावित कानून में सख्त प्रावधान थे—जेल, जुर्माना, पीड़ितों को मुआवजा और नियम न मानने वाले संस्थानों की सरकारी फंडिंग रोकने जैसे कदम। इसे पहली बार माना गया जब किसी राज्य ने विश्वविद्यालयों में संस्थागत भेदभाव को दंडनीय अपराध के रूप में स्वीकार किया। हालांकि, यह बिल अब तक कानून नहीं बन सका। इसे न तो विधानसभा में पेश किया गया और न ही पारित किया गया। राजनीतिक दलों ने इसे जरूरत से ज्यादा सख्त बताया, जबकि अधिकार समूहों ने ड्राफ्ट में कई खामियां गिनाईं। विरोध और असहमति के बीच यह बिल ठंडे बस्ते में चला गया।

वैश्विक नजर और कानूनी खामियां

जून 2025 में संयुक्त राष्ट्र के दो विशेष प्रतिनिधियों ने भारत सरकार को पत्र लिखकर रोहित एक्ट को समय की जरूरत बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ड्राफ्ट अधूरा है। यूएन विशेषज्ञों ने चेताया कि कानून में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। साथ ही, दलित और आदिवासी छात्रों को फेलोशिप, आवास, मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं और हिंसा से सुरक्षा में जिस असमानता का सामना करना पड़ता है, उसे भी पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया।

उन्होंने केवल आपराधिक सजा पर आधारित दृष्टिकोण को अपर्याप्त बताया और रोकथाम, प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली, व्हिसलब्लोअर सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही पर जोर दिया। इसके अलावा ड्राफ्ट तैयार करते समय दलित-आदिवासी छात्रों और शिक्षाविदों से पर्याप्त परामर्श न होने की बात भी कही गई।

छात्र क्यों चाहते हैं राष्ट्रीय कानून

छात्र संगठनों का कहना है कि कर्नाटक का रुका हुआ बिल यह साबित करता है कि यह लड़ाई केवल राज्यों तक सीमित नहीं रह सकती। रोहित वेमुला की मौत के दस साल बाद भी देश में उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव से निपटने के लिए कोई व्यापक केंद्रीय कानून नहीं है। छात्रों का तर्क है कि समावेशन केवल सजा से संभव नहीं है। इसके लिए सुलभ शिक्षा, अकादमिक सहयोग और संस्थागत जिम्मेदारी जरूरी है—ना कि शत्रुतापूर्ण माहौल में छात्रों से असाधारण सहनशीलता की उम्मीद।

यही कारण है कि जेएनयू छात्र संघ जैसे संगठन पूरे देश में लागू होने वाले रोहित एक्ट की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि संस्थागत भेदभाव को कानूनी अपराध माना जाए और जाति, धर्म व सामाजिक आधार पर होने वाले बहिष्कार पर सख्त कार्रवाई हो। छात्रों की मांग है कि शिकायत निवारण समितियों में छात्रों का प्रतिनिधित्व हो, जांच की समयसीमा तय हो और शिक्षकों व प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की वास्तविक शक्ति हो। साथ ही जागरूकता कार्यक्रम, मजबूत और जवाबदेह ईओसी तथा ऐसी संरचनात्मक सुधारों की भी मांग की जा रही है, जो भेदभाव को घातक बनने से पहले ही रोक सकें। असल में रोहित एक्ट की मांग जिम्मेदारी का बोझ बदलने की मांग है—छात्रों से हटाकर उन संस्थानों पर डालने की, जो भेदभाव को पनपने देते हैं।

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