कच्चाथीवु द्वीप विवाद: पीएम मोदी की श्रीलंका यात्रा, भारत को मछली पकड़ने के अधिकार मिलेंगे?
x

कच्चाथीवु द्वीप विवाद: पीएम मोदी की श्रीलंका यात्रा, भारत को मछली पकड़ने के अधिकार मिलेंगे?

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने प्रधानमंत्री मोदी से श्रीलंका यात्रा के दौरान भारत-श्रीलंका समझौते की समीक्षा करने, कच्चातीवु को वापस पाने और हिरासत में लिए गए मछुआरों की रिहाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया।


पॉल्क जलडमरूमध्य में स्थित एक 285 एकड़ का निर्जन द्वीप कच्चाथीवु आज भी भारत-श्रीलंका के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण विवाद का केंद्र बना हुआ है। यह द्वीप तमिलनाडु के मछुआरों के लिए जीवनरेखा था। लेकिन 51 साल पहले हुए समझौतों के बाद यह विवाद का कारण बन गया। यह मुद्दा न केवल मछुआरों के लिए, बल्कि तमिलनाडु के राजनीतिक हलकों में भी एक गर्मागरम चर्चा का विषय बना हुआ है और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 5 अप्रैल को श्रीलंका यात्रा इस विवाद पर एक नई दिशा तय कर सकती है। क्या भारत कच्चाथीवु द्वीप को वापस ले पाएगा या कम से कम मछली पकड़ने के अधिकार तो हासिल कर पाएगा?

कच्चाथीवु विवाद

1974 में भारत और श्रीलंका के बीच एक समुद्री सीमा समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत कच्चाथीवु द्वीप को श्रीलंका के हिस्से में सौंपा गया। इसके बाद 1976 में एक और समझौता हुआ, जिसके तहत भारतीय मछुआरों को इस द्वीप के जल क्षेत्र में मछली पकड़ने से रोक दिया गया। भारतीय सरकार ने इसे एक व्यावहारिक समाधान बताया। लेकिन तमिलनाडु में इसे लेकर विरोध था। खासतौर पर यह विरोध इसलिए था। क्योंकि यह कदम बिना संसद की स्वीकृति के उठाया गया, जो कि संविधान के तहत आवश्यक था।

स्टालिन का प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस मुद्दे को फिर से प्रमुखता दी है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2 अप्रैल 2025 को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कच्चाथीवु द्वीप को भारत को वापस दिलाने की अपील की। स्टालिन ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का उल्लेख किया, जिसमें कच्चाथीवु द्वीप की पुनः प्राप्ति की मांग की गई थी, ताकि भारतीय मछुआरों के पारंपरिक मछली पकड़ने के अधिकारों की रक्षा की जा सके। उन्होंने 1974 से लेकर अब तक इस मुद्दे पर तमिलनाडु के विरोध को भी प्रमुखता से उठाया और मोदी से आग्रह किया कि वे श्रीलंका यात्रा के दौरान इस मुद्दे को उठाएं और मछुआरों को जेल से रिहा करवाने की कोशिश करें।

कच्चाथीवु का भविष्य

प्रधानमंत्री मोदी की 5 अप्रैल को श्रीलंका यात्रा इस विवाद पर एक महत्वपूर्ण मोड़ ला सकती है। मोदी का यह दौरा श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिस्सनायके के दिसंबर 2024 में भारत दौरे के बाद होने वाला है, जिसमें दोनों देशों के बीच विभिन्न समझौतों पर चर्चा होगी। मोदी की यात्रा के दौरान कच्चाथीवु द्वीप का मुद्दा भी चर्चा का विषय बन सकता है, खासकर यदि दोनों देशों के बीच मछली पकड़ने के अधिकारों को लेकर कोई समझौता होता है।

कानूनी और कूटनीतिक चुनौतियां

कच्चाथीवु द्वीप की पुनः प्राप्ति कानूनी दृष्टिकोण से मुश्किल है। 1974 और 1976 के समझौते अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बाध्यकारी हैं। इन समझौतों को पलटने के लिए श्रीलंका की सहमति या किसी न्यायिक फैसले की आवश्यकता होगी। श्रीलंका इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है और 2010 में उसने तमिलनाडु की मांग को ठुकरा दिया था। हालांकि, भारत को अपने मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का उपयोग करते हुए इस मुद्दे पर श्रीलंका से बातचीत करने की आवश्यकता होगी।

व्यावहारिक समाधान

अगर कच्चाथीवु द्वीप की पुनः प्राप्ति कानूनी रूप से संभव नहीं है तो मछली पकड़ने के अधिकारों का मुद्दा एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। 1974 में हुए समझौते के अनुसार, भारतीय मछुआरों को कच्चाथीवु द्वीप पर मछली पकड़ने का अधिकार था। लेकिन 1976 के समझौते के बाद यह अधिकार खत्म हो गया, जिसके बाद मछुआरों की कई बार गिरफ्तारियां हुईं।

भारत और श्रीलंका एक संयुक्त मछली पकड़ने क्षेत्र पर समझौता कर सकते हैं, जिससे भारतीय मछुआरों को श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में मछली पकड़ने का अधिकार मिल सकता है। यह समझौता एक मानवतावादी दृष्टिकोण से लिया जा सकता है। क्योंकि तमिलनाडु के मछुआरे इन जल क्षेत्रों पर निर्भर हैं। हालांकि, श्रीलंका को इस बात का डर है कि भारतीय मछुआरे इन जल क्षेत्रों में अत्यधिक मछली पकड़ने से समुद्री संसाधनों का दोहन कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट और जयशंकर की भूमिका

कच्चाथीवु के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता और करुणानिधि ने इस मुद्दे पर 2008 और 2025 में याचिकाएं दायर की थीं, जिसमें उन्होंने 1974 और 1976 के समझौतों को चुनौती दी थी। वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस मुद्दे को कई बार उठाया और 2 अप्रैल 2024 को कहा कि भारत को मछली पकड़ने के अधिकार प्राप्त करने चाहिए और इसके लिए श्रीलंकाई अधिकारियों से बातचीत करनी चाहिए।

श्रीलंकाई सांसद का दृष्टिकोण

श्रीलंकाई सांसद मनो गणेशन ने कच्चाथीवु विवाद को एक व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा है। उन्होंने कहा कि भारत को अपने मछुआरों को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, ताकि वे श्रीलंका के तट से दूर मछली पकड़ने में सक्षम हो सकें। उनका मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच तनाव को कम किया जा सकता है।

कच्चाथीवु विवाद का समाधान

कच्चाथीवु द्वीप की पुनः प्राप्ति कानूनी और कूटनीतिक दृष्टिकोण से एक कठिन लक्ष्य है। लेकिन मछली पकड़ने के अधिकारों को बहाल करना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की श्रीलंका यात्रा और श्रीलंकाई राष्ट्रपति दिस्सनायके से होने वाली बातचीत इस मुद्दे का समाधान निकाल सकती है। श्रीलंका की आर्थिक स्थिति और भारत की क्षेत्रीय ताकत इस समझौते को प्रभावी बना सकती है। हालांकि, स्थानीय प्रतिरोध और प्रवर्तन चुनौतियां अभी भी एक बड़ी बाधा हो सकती हैं। कच्चाथीवु द्वीप का भविष्य और इस पर होने वाली बातचीत की दिशा भारतीय मछुआरों के लिए महत्वपूर्ण होगी। अगर मोदी की यात्रा से कोई सकारात्मक परिणाम निकलता है तो तमिलनाडु के मछुआरों के लिए यह एक नई उम्मीद हो सकती है।

Read More
Next Story