Economic Survey 2026: GDP ग्रोथ 7% के आसपास, लेकिन चुनौतियां बरकरार
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Economic Survey 2026: GDP ग्रोथ 7% के आसपास, लेकिन चुनौतियां बरकरार

Indian economy: अब निगाहें 1 फरवरी को आने वाले केंद्रीय बजट पर हैं। देखना होगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इन चिंताओं को बजट में कैसे संबोधित करती हैं।


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Union Budget 2026: केंद्रीय बजट से ठीक पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में इकोनॉमिक सर्वे पेश किया। इस सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि अगले वित्त वर्ष में भारत की GDP ग्रोथ 6.8% से 7.2% के बीच रह सकती है। हालांकि, सर्वे में यह भी साफ कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होने के बावजूद कई वैश्विक और घरेलू चुनौतियां बनी हुई हैं, जिनकी वजह से देश अपनी पूरी आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है।

क्या कहता है इकोनॉमिक सर्वे?

इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, भारत की आर्थिक बुनियाद (Economic Fundamentals) मजबूत है। लेकिन बाहरी कारक (External Factors) जैसे कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, अमेरिका की टैरिफ नीति, वैश्विक राजनीतिक तनाव, युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत की ग्रोथ पर असर डाल रहे हैं। सर्वे में यह भी चेतावनी दी गई है कि आने वाले साल में भी चुनौतियां कम नहीं होंगी।

GDP ग्रोथ का अनुमान कितना वास्तविक?

इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए जाने-माने अर्थशास्त्री और आरबीआई के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर चरण सिंह ने कहा कि भारत की असली क्षमता 9–10% की विकास दर की है, लेकिन हम अभी उससे काफी नीचे प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि कोरिया और चीन ने भी मुश्किल हालात में तेज विकास किया और भारत के पास भी वही क्षमता है। समस्या क्षमता की नहीं, नीतियों की कमी की है। उनके अनुसार, अगर भारत को विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करना है तो आने वाले वर्षों में लगातार तेज विकास दर जरूरी होगी।


निवेश और रोजगार सबसे बड़ी चुनौती

अर्थशास्त्री प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा ने इस बात पर जोर दिया कि देश में निजी निवेश (Private Investment) ठहरा हुआ है। कॉरपोरेट मुनाफा होने के बावजूद निवेश नहीं बढ़ रहा। MSME सेक्टर, जो सबसे ज्यादा रोजगार देता है, उपेक्षित है। उन्होंने बताया कि देश में करीब 7.5 करोड़ MSMEs हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ 30% ही रजिस्टर्ड हैं। बिना MSMEs को मजबूत किए रोजगार नहीं बढ़ सकता।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सवाल

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र की ग्रोथ अच्छी रही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर कृषि बढ़ रही है तो ग्रामीण खपत क्यों नहीं बढ़ रही? मजदूरी और रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे? युवाओं की बड़ी संख्या हर साल रोजगार बाजार में आ रही है, लेकिन उन्हें पर्याप्त मौके नहीं मिल पा रहे।

सरकार की भूमिका और आलोचना

द फेडरल देश के सीनियर पत्रकार मनीष कुमार के अनुसार, इकोनॉमिक सर्वे एक तरह से सरकार को आईना दिखाता है। सर्वे में लैंड रिफॉर्म, नीतिगत बदलाव और राज्य सरकारों की फिजूलखर्ची पर चिंता जताई गई है। मुफ्त योजनाओं की राजनीति से राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है। सर्वे में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर वैश्विक हालात और बिगड़े या AI और फाइनेंशियल सिस्टम में संकट आया तो 2008 से भी बड़ा आर्थिक झटका लग सकता है।

नीति बनाम इरादा

प्रोफेसर चरण सिंह ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि इंजन तेज चलना चाहता है, लेकिन डिब्बों ने ब्रेक लगा रखी है। मतलब यह कि प्रधानमंत्री का विजन साफ है। सरकार का इरादा भी है। लेकिन राज्य सरकारें, निजी क्षेत्र और संस्थान साथ नहीं चल पा रहे। जब तक निजी निवेश नहीं बढ़ेगा। MSME को ताकत नहीं मिलेगी, रोजगार पैदा नहीं होंगे, तब तक 9–10% की ग्रोथ संभव नहीं है।

आगे की राह: सबकी जिम्मेदारी

इकोनॉमिक सर्वे साफ कहता है कि भारत में क्षमता है। युवा आबादी है। महिलाएं कार्यबल में आगे आ रही हैं। लेकिन अब ठोस औद्योगिक नीति, मैन्युफैक्चरिंग स्ट्रेटेजी, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल और निजी क्षेत्र को भरोसा देने की जरूरत है। अब निगाहें 1 फरवरी को आने वाले केंद्रीय बजट पर हैं। देखना होगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इन चिंताओं को बजट में कैसे संबोधित करती हैं।

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