
महाभियोग के साये में चुनावी घोषणा, क्या संवैधानिक पदों के लिए नैतिकता के मानक अलग हैं?
विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कई आरोपों को सूचीबद्ध किया है। इनमें सिद्ध दुराचार, पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, एसआईआर प्रक्रिया और बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करना, उनकी विवादित नियुक्ति, चुनावी धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में बाधा, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और स्वतंत्रता बनाए रखने में विफलता जैसे आरोप शामिल हैं।
क्या संवैधानिक पदों के लिए अलग-अलग नैतिक मानक हैं? नैतिकता का जो मानक लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के मामले में लागू हुआ, उसे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मामले में क्यों अमल में नहीं लाया गया? ये सवाल इसलिए क्योंकि महाभियोग की तलवार लटके होने के बावजूद देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए और पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का एलान कर गए। जबकि उनके खिलाफ संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के 193 सांसदों ने महाभियोग का नोटिस दिया हुआ है।
यह बताना जरूरी है कि ये उसी तरह के महाभियोग की प्रक्रिया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के या किसी हाईकोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए अपनाया जाता है। इसका मतलब है कि महाभियोग केवल सिद्ध दुराचार या अक्षमता के आधार पर ही लगाया जा सकता है। और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ऐसे गंभीर आरोपों में घिरे हुए हैं। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कई मौकों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की मदद करने का आरोप लगाया है, खासकर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision-SIR के दौरान। विपक्ष का आरोप है कि य़े प्रक्रिया केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी को फायदा पहुंचाने के मकसद से की गई थी।
नोटिस के बारे में जो जानकारी अलग-अलग सूत्रों के हवाले से पता चली है, उसके मुताबिक विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कई आरोपों को सूचीबद्ध किया है। इनमें सिद्ध दुराचार, पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, एसआईआर प्रक्रिया और बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करना, उनकी विवादित नियुक्ति, चुनावी धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में बाधा, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और स्वतंत्रता बनाए रखने में विफलता जैसे आरोप शामिल हैं।
जाहिर है आरोप गंभीर हैं। और तब तो और भी गंभीर हो जाता है जबकि संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के 193 सांसदों की तरफ से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का नोटिस भेज दिया गया हो। ओम बिरला के खिलाफ जब लोकसभा में विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो उन्होंने सदन की कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया था। क्योंकि संसदीय परंपरा और नैतिक निष्पक्षता का सवाल उठ सकता था। स्पीकर ओम बिरला के इस कदम को संस्थागत गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं को बनाए रखने के लिए उठाए गए कदम के तौर पर पेश किया गया। लेकिन फिर वही सवाल उठता है जोकि हमने इस वीडियो की शुरुआत में पूछा था। क्या संवैधानिक पदों के लिए अलग-अलग नैतिक मानक हैं?
जो कदम ओम बिरला ने उठाया था, वो कदम ज्ञानेश कुमार भी तो उठा सकते थे। उन्हें क्यों चुनावी घोषणा करने की इतनी जल्दी रही? ओम बिरला की गैर-मौजूदगी में भी संसद की कार्यवाही चली। ज्ञानेश कुमार की अनुपस्थिति में भी चुनावी शेड्यूल सार्वजनिक किया जा सकता था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्हें इसका अंदाज़ा था कि सोमवार संसद में उनके खिलाफ महाभियोग वाले मसले पर कुछ हलचल हो सकती थी तो उन्होंने उससे एक दिन पहले ही छुट्टी के दिन यानी रविवार को 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखों के एलान का दिन मुकर्रर कर दिया।
वैसे इस महाभियोग वाले मसले ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी पीछा नहीं छोड़ा। 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा के लिए रखी गई प्रेस कॉन्फ्रेस में उनसे इससे जुड़े सवाल पूछे गए। लेकिन उनको पद से हटाने के लिए विपक्ष द्वारा संसद में प्रस्ताव लाने के नोटिस से जुड़े सवालों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कोई जवाब नहीं दिया। वो सवाल को ही टाल गए। उन्हें पता है कि उनके सिर पर महाभियोग की तलवार लटक रही है और देश के संसदीय इतिहास में ये पहली बार है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग नोटिस आया है।
वैसे भी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाना केवल संसद के जरिये ही संभव है, जबकि चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति कार्रवाई कर सकते हैं।संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। साथ ही नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तों में उनके लिए प्रतिकूल बदलाव नहीं किया जा सकता। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है, यानी सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से इसे मंजूरी मिलनी चाहिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस महाभियोग प्रस्ताव का हश्र कहीं लोकसभा स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव जैसा ही होगा या नहीं, ये अलग मसला है, क्योंकि लोकसभा हो या राज्यसभा, दोनों जगह सत्तारूढ़ एनडीए को संख्या के मामले में बढ़त है। इसलिए विपक्ष का यह कदम काफी हद तक प्रतीकात्मक माना जा रहा है लेकिन फिर भी इसका राजनीतिक महत्व है। ये बात हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगी कि देश के संसदीय इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव आया तो वो ज्ञानेश कुमार थे।

