EC विवाद के बीच बड़ा सवाल, क्या विपक्ष के लिए स्पेस हो रहा है कम?
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ज्ञानेश कुमार, मुख्य चुनाव आयुक्त, फोटो सौजन्य- PTI

EC विवाद के बीच बड़ा सवाल, क्या विपक्ष के लिए स्पेस हो रहा है कम?

महाभियोग नोटिस खारिज होने के TMC और चुनाव आयोग के बीच विवाद बाद और गहरा गया है। विपक्ष, आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।


8 अप्रैल को तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से मिला। इस बैठक में उन्होंने पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों के दौरान चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के कामकाज को लेकर अपनी शिकायतें रखीं, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान 89 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मुद्दा भी शामिल था।

आमतौर पर चुनावी मौसम में इस तरह की बैठकें सामान्य मानी जाती हैं, लेकिन यह मुलाकात जल्द ही तीखे विवाद में बदल गई। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया कि बैठक “सिर्फ सात मिनट में” खत्म हो गई, जब ज्ञानेश कुमार ने नेताओं से “बाहर निकल जाने” को कहा।

इसके तुरंत बाद चुनाव आयोग ने निष्पक्षता की अपनी छवि को झटका देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए सीधे तृणमूल कांग्रेस को निशाना बनाया। पोस्ट में कहा गया कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव “डर, हिंसा, धमकी, प्रलोभन, छापामारी, बूथ जैमिंग और सोर्स जैमिंग से मुक्त” होंगे।

एक नई सीमा का उल्लंघन

किसी राजनीतिक दल को इस तरह सीधे निशाना बनाना और उस पर आरोप लगाना अभूतपूर्व माना गया। तृणमूल सांसद सागरिका घोष, जो इस बैठक में डेरेक ओ’ब्रायन, नव-निर्वाचित सांसद मेनका गुरुस्वामी और पूर्व सांसद साकेत गोखले के साथ मौजूद थीं, ने चुनाव आयोग के बयान को “साफ झूठ” बताया। उनका दावा था कि आयोग ने जो बातें पोस्ट में कही हैं, वे बैठक में नहीं कही गईं, बल्कि ज्ञानेश कुमार ने केवल “चले जाओ” कहा।

हालांकि चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या वास्तव में ऐसा कहा गया था, लेकिन यह साफ है कि इस पोस्ट के जरिए आयोग ने एक ऐसी सीमा पार कर दी, जिसे पहले किसी चुनाव आयुक्त ने नहीं लांघा था।

संसद में बहस का मौका खत्म

यह विवाद ऐसे समय सामने आया, जब विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए लाया गया प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन द्वारा खारिज कर दिया गया था।

6 अप्रैल को संसद सचिवालय ने जानकारी दी कि 12 मार्च को 193 विपक्षी सांसदों द्वारा दिए गए इस नोटिस को “विचार के बाद” स्वीकार नहीं किया गया। तृणमूल कांग्रेस, जिसने इस पहल में अहम भूमिका निभाई थी, ने इस फैसले की तीखी आलोचना की।डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे शर्मनाक बताते हुए आरोप लगाया कि यह फैसला भाजपा के दबाव में लिया गया है और संसद की गरिमा का मजाक उड़ाया गया है।

विपक्ष का आरोप और निराशा

विपक्ष को पहले से ही अंदाजा था कि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना कम है, लेकिन उनका मकसद संसद में इस मुद्दे पर बहस करवाना था। तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी के मुताबिक, वे चुनाव आयोग की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका को उजागर करना चाहते थे।हालांकि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति के फैसले ने विपक्ष से यह मौका भी छीन लिया।

आरोपों पर सवाल

विपक्ष ने अपने नोटिस में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सात आरोप लगाए थे, लेकिन राज्यसभा सभापति ने कहा कि ये आरोप “सामान्य और धारणा आधारित” हैं और इन्हें “दुर्व्यवहार” का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ये मुद्दे राजनीतिक बहस के लिए तो प्रासंगिक हैं, लेकिन संवैधानिक रूप से हटाने के मानकों पर खरे नहीं उतरते।

‘लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है’

विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार सभी संस्थाओं पर नियंत्रण कर रही है और विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि संसद में विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया जा रहा।वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि जवाबदेही से बचना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल

आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि संसद में संवाद की गुंजाइश खत्म होती जा रही है और विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा है। उनका आरोप है कि सरकार अपनी मर्जी से एजेंडा तय कर रही है, जबकि विपक्ष के मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है।कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद ने भी आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचने के लिए सरकार जानबूझकर अन्य विषयों को आगे कर देती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव संसद के इतिहास में पहली बार लाया गया था, लेकिन इसे जिस तरह खारिज किया गया, उसने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।विपक्ष का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक प्रस्ताव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि संसद धीरे-धीरे अपनी मूल भूमिका—निष्पक्षता, संवाद, जांच और विविध विचारों की रक्षा—से दूर होती जा रही है।

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