तेलंगाना के खम्मम में CPI का शताब्दी समारोह, भारतीय कम्युनिस्ट क्यों खो रहे हैं अपना प्रभाव?
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तेलंगाना के खम्मम में CPI का शताब्दी समारोह, भारतीय कम्युनिस्ट क्यों खो रहे हैं अपना प्रभाव?

CPI की 100वीं वर्षगांठ न केवल पार्टी के लिए गौरवशाली पल है, बल्कि यह लेफ्ट विचारधारा के कार्यकर्ताओं के उत्साह और एकजुटता को भी मजबूत करने का अवसर है। यह जश्न यह दिखाता है कि कठिनाइयों के बावजूद CPI अब भी भारतीय राजनीति में अपनी पहचान बनाए हुए है।


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तेलंगाना के खम्मम में 18 जनवरी को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) की 100वीं वर्षगांठ पर भव्य आयोजन होने जा रहा है। पार्टी के प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाने वाली CPI इस अवसर पर ऐतिहासिक जश्न मनाएगी। जश्न के हिस्से के रूप में खम्मम का किला लाल रंग में सजाया जाएगा और हजारों कार्यकर्ता और समर्थक इसमें शामिल होंगे। समारोह में बड़ी रैली, पदयात्राएं, ध्वजारोहण और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी ने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से इस ऐतिहासिक मौके पर बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की है।

खम्मम जिले के कोठागुड़ेम विधानसभा क्षेत्र से विधायक और CPI के तेलंगाना सचिव K. संबासिवा राव इस आयोजन के प्रबंधन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, लगभग 40 देशों से प्रतिनिधि भी इस जश्न में शामिल होंगे। रैली के बाद CPI की नेशनल कमेटी की बैठक और अन्य कार्यक्रम तीन दिनों तक आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान CPI के महासचिव D. राजा और CPI(M) के MA बेबी भी हिस्सा लेंगे।

संघर्ष और उपलब्धियां

जब देश पर विदेशी शासन था, उस समय दो विरोधी विचारधाराएं उभरीं – एक CPI और दूसरी RSS। आज RSS राजनीतिक रूप से मजबूत हो गई है, जबकि CPI ने कई चुनौतियों का सामना किया। CPI की स्थापना 1925 में कानपुर में हुई थी। इसके संस्थापकों में Sripad Amrit Dange, Satya Bhakta और Maulana Hasrat Mohani शामिल थे। पार्टी का उद्देश्य किसानों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा और स्वतंत्रता हासिल करना था। आजादी के बाद CPI देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी। 1957 में केरल में उन्होंने सरकार बनाई, जिसे EMS Namboodiripad ने नेतृत्व किया। हालांकि, यह सरकार 1959 में समाप्त कर दी गई थी।

1964 में CPI में विभाजन हुआ और CPI(M) का जन्म हुआ, मुख्य रूप से सोवियत-चीन मतभेदों के कारण। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद CPI को अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी नहीं मिला। आज, लेफ्ट दल केवल केरल में सत्ता में हैं। वहां Left Democratic Front (LDF) के तहत CPI(M) मुख्य दल है और CPI सहयोगी है। अन्य राज्यों में Left कमजोर हो चुका है, जैसे पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा।

विचारधारा और राजनीतिक चुनौतियां

CPI हमेशा विचारधारा पर आधारित रही है, लेकिन चुनावी सफलता सीमित रही है। देश में लेफ्ट और सेंटरल दलों की कमजोरी के कारण राइट विंग के दलों को बढ़त मिली। CPI और अन्य बाएं दल अब लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ एकजुट होकर सामाजिक आंदोलनों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका लक्ष्य आरएसएस और बीजेपी की हिन्दुत्व राजनीति का मुकाबला, जाति, धर्म और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ लड़ाई और भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष है। CPI ने दशकों में विभिन्न गठबंधनों में भाग लिया है, जैसे LDF (केरल), LF (पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा), महागठबंधन (बिहार), Secular Progressive Alliance (तमिलनाडु) और INDIA (राष्ट्रीय गठबंधन)।

भविष्य की दिशा

CPI के वरिष्ठ नेता DVVS वर्मा का कहना है कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को लोगों के बीच जाना होगा और उनकी समस्याओं को समझना होगा। केवल विचारधारा और नारों से आज की राजनीति नहीं चल सकती। वरिष्ठ पत्रकार N. कोंडिया का कहना है कि भले ही प्रगति धीमी हो, लेकिन मेहनत जारी रखना जरूरी है। हार भी जीत की नींव होती है। Marxist थ्योरिटिशियन अनिल राजिमवाले ने कहा कि CPI समय के साथ खुद को ढालेगा, लोगों के साथ खड़ा रहेगा और उनके लिए लड़ाई जारी रखेगा।

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