
6 साल में एक भी सवाल पूछे बगैर राज्यसभा का कार्यकाल पूरा कर गए पूर्व CJI रंजन गोगोई
PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, गोगोई की कुल संसदीय उपस्थिति केवल 53 प्रतिशत रही, जो सांसदों के राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत से काफी कम है।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा का कार्यकाल सन्नाटा में गुज़र गया। राज्यसभा के किसी सांसद द्वारा जहां सवाल पूछने का राष्ट्रीय औसत 270.2 है, वहीं रंजन गोगोई ने छह साल के अपने कार्यकाल में एक भी सवाल नहीं पूछा। राज्यसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध प्रोफाइल के अनुसार, अपने छह साल के कार्यकाल में गोगोई ने कोई निजी विधेयक भी पेश नहीं किया, जबकि राष्ट्रीय औसत 1.3 है और केवल एक बहस में हिस्सा लिया जबकि राष्ट्रीय औसत 156.1 है।
अपने एकमात्र राज्यसभा भाषण में, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा था कि संविधान से जुड़ा बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत (मूल संरचना सिद्धांत) का कानूनी आधार काफी विवादास्पद है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने इसी सिद्धांत को बरकरार रखा था। अपने संस्मरण ‘Justice for the Judge’ में उन्होंने लिखा कि उन्होंने राज्यसभा का नामांकन इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वह संसद में न्यायपालिका और पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को उठाना चाहते थे।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा के नामित सदस्य के रूप में छह साल का कार्यकाल सोमवार को समाप्त हो गया। उनका कार्यकाल, जो सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के चार महीने बाद शुरू हुआ था, सीमित संसदीय सक्रियता के साथ खत्म हुआ।
विदाई देते हुए राज्यसभा के सभापति और भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने उन्हें एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता बताते हुए कहा कि उन्होंने सदन की चर्चाओं में अद्वितीय कानूनी समझ और गंभीरता जोड़ी। उन्होंने कहा कि सदन उनके “विवेकपूर्ण सुझावों” और “संतुलित हस्तक्षेपों” को याद करेगा।
हालांकि, PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, गोगोई की कुल संसदीय उपस्थिति केवल 53 प्रतिशत रही, जो सांसदों के राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत से काफी कम है।
उनका एकमात्र संसदीय भाषण अगस्त 2023 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के दौरान आया था। इस विधेयक ने दिल्ली की नौकरशाही पर केंद्र सरकार का नियंत्रण सुनिश्चित किया।
इस बिल के समर्थन में बोलते हुए गोगोई ने बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत पर सवाल उठाकर सुर्खियां बटोरीं, यह एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में स्थापित किया था और जो संसद को संविधान की मूल विशेषताओं में बदलाव करने से रोकता है। उन्होंने इस सिद्धांत को “काफी विवादास्पद कानूनी आधार वाला” बताया, जो उनके सुप्रीम कोर्ट में दिए गए पहले के फैसलों से अलग था।
संसद में एंट्री और विवाद
मार्च 2020 में, भारत के मुख्य न्यायाधीश पद से हटने के कुछ महीनों बाद गोगोई का राज्यसभा में प्रवेश चर्चा का विषय बना। वह राज्यसभा के सदस्य बनने वाले दूसरे पूर्व CJI हैं। इससे पहले न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा 1998 में, रिटायरमेंट के सात साल बाद, राज्यसभा के सदस्य बने थे।
जहां कई आलोचकों और पूर्व न्यायाधीशों ने इसे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला लाभ बताते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए, वहीं बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस नामांकन का समर्थन किया।
एक प्रेस विज्ञप्ति में इसे विधायिका और न्यायपालिका के बीच “सेतु बनाने” का अवसर बताया गया, जिससे सांसद न्यायपालिका के विचार सीधे सुन सकें।
गोगोई ने उस समय अपने नामांकन को “सेवा का आह्वान” बताते हुए कहा था कि यह उनके विशेषज्ञता क्षेत्र में काम करने और “राष्ट्र निर्माण” के लिए विधायिका और न्यायपालिका के बीच सहयोग बढ़ाने का अवसर है।
अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि उन्होंने यह भूमिका इसलिए स्वीकार की क्योंकि वह संसद में न्यायपालिका और अपने गृह राज्य असम सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को उठाना चाहते थे।
कोविड, व्यवधान और ‘वैकल्पिक योगदान’
समय-समय पर गोगोई ने संसद में अपनी कम उपस्थिति के अलग-अलग कारण बताए। 2021 में एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कोविड प्रतिबंधों, सामाजिक दूरी की कमी और संसद में बैठने की व्यवस्था से असहजता के कारण उनकी उपस्थिति कम रही।
उन्होंने यह भी कहा कि एक नामित सदस्य के रूप में वह किसी पार्टी के व्हिप से बंधे नहीं हैं और अपनी इच्छा से ही सदन में जाते हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने सदन में बार-बार होने वाले व्यवधानों को भी अपनी सीमित भागीदारी का कारण बताया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि वह “पेशेवर राजनेता” नहीं हैं और सिर्फ औपचारिकता के लिए सवाल पूछने में विश्वास नहीं रखते। इसके बजाय, उन्होंने अपने वैकल्पिक योगदानों का जिक्र किया—जैसे विदेशी प्रतिनिधिमंडलों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संवैधानिक विषयों पर संबोधित करना, और अपनी संसदीय वेतन का उपयोग कानून के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति देने में करना।
समितियों में भूमिका
राज्यसभा की वेबसाइट के अनुसार, अपने कार्यकाल के दौरान गोगोई सितंबर 2024 से कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय संबंधी संसदीय समिति के सदस्य रहे।
इसके अलावा, वह जुलाई 2020 से सितंबर 2021 तक और फिर मई 2022 से जून 2024 तक विदेश मामलों की समिति के सदस्य रहे।
सितंबर 2021 से मई 2022 तक वह संचार और सूचना प्रौद्योगिकी समिति में भी शामिल रहे।
रिटायरमेंट के समय वह कानून और न्याय मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति (अक्टूबर 2024 से) और भारत-यूक्रेन संसदीय मैत्री समूह (फरवरी 2026 से) के भी सदस्य थे।

