Galgotia University के रोबोडॉग पर मचा बवाल, जवाबदेही पर उठे सवाल
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Galgotia University के रोबोडॉग पर मचा बवाल, जवाबदेही पर उठे सवाल

गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा AI समिट में कथित तौर पर चीनी रोबोट डॉग को अपने इनोवेशन के रूप में पेश करने पर विवाद खड़ा हो गया। यह सिर्फ एक गलती नहीं, बल्कि जवाबदेही, नैतिकता और जांच प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।


2026 के इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में एक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि Galgotias University ने चीन में बना रोबोट डॉग अपने खुद के इनोवेशन के रूप में पेश किया। इससे यह सवाल उठे हैं कि क्या ठीक से जांच-पड़ताल की गई थी, नवाचार की नैतिकता का पालन हुआ या नहीं, और क्या एक प्रदर्शक की गलती से भारत की बड़ी AI महत्वाकांक्षाओं पर असर पड़ सकता है।

The Federal के शो AI With Sanket में इस मुद्दे पर चर्चा की गई। इसमें राजनीतिक विश्लेषक संजय झा, डॉ. कनिष्क गौर (संस्थापक, इंडिया फ्यूचर फाउंडेशन) और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील खूशबु जैन शामिल हुईं। चर्चा में जवाबदेही, सिस्टम की कमियां और भारत में AI के भविष्य पर बात हुई।

चर्चा की शुरुआत में संजय झा ने सोशल मीडिया पर चल रहे मीम्स को नजरअंदाज करते हुए इसे 'गंभीर मामला' बताया। उनके मुताबिक, बाजार में उपलब्ध किसी प्रोडक्ट को अंतरराष्ट्रीय AI मंच पर देशी इनोवेशन बताकर पेश करना मासूम गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की गहरी समस्या को दिखाता है। उन्होंने कहा, 'यह सिर्फ मूर्खता या छोटी सोच नहीं है, बल्कि समझ से परे घमंड है।' उन्होंने सवाल उठाया, 'जब AI का दौर इतना आगे बढ़ चुका है और हर चीज की जांच होती है, तो किसी को कैसे लगा कि यह बात छिपी रह जाएगी?'

झा के अनुसार, इस घटना से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की 'बहुत बड़ी फजीहत' हुई है। उनका कहना था कि इसकी जिम्मेदारी सिर्फ यूनिवर्सिटी पर नहीं डाली जा सकती। उन्होंने कहा, 'अगर सही तरीके से जांच-पड़ताल नहीं होगी, तो हर चीज सवालों के घेरे में आएगी। मैं इसके लिए सरकार को जिम्मेदार मानता हूं।' उन्होंने यह भी पूछा कि सरकारी समर्थन वाले वैश्विक कार्यक्रम में ऐसे प्रोडक्ट को प्रदर्शित करने की अनुमति कैसे मिल गई।

इकोसिस्टम का बचाव

समिट में मौजूद डॉ. गौर ने इस पर संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने माना कि गलत जानकारी देने से असली इनोवेटर्स को नुकसान होता है, लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, 'मैंने बिहार और झारखंड के स्टार्टअप्स से मुलाकात की है जो सच में रोबोट बना रहे हैं। देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।' उनके मुताबिक, ऐसा समिट इनोवेशन को बढ़ावा देने और भारतीय स्टार्टअप्स को वैश्विक प्रतिनिधियों से जोड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। हालांकि, उन्होंने माना कि नैतिकता के स्तर पर कमी है। उन्होंने कहा, 'जब तक AI के क्षेत्र में सख्त जुर्माना और कड़ी सजा नहीं होगी, तब तक कॉपी-पेस्ट मॉडल बड़ी समस्या बना रहेगा।' उन्होंने चेतावनी दी कि नकल की संस्कृति और ऊपर-ऊपर की 'वाइब कोडिंग' गहरी तकनीकी समझ की जगह ले रही है, जो खतरनाक है।


कानूनी नजरिया

जैन ने संयम बरतने की अपील की और कहा कि सही कानूनी प्रक्रिया के बिना इसे धोखाधड़ी कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा, 'अभी यह शुरुआती चरण है, इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि कौन सही है और कौन गलत।' जैन के मुताबिक, गलत प्रस्तुति, कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन, कॉपीराइट का हनन या धोखाधड़ी जैसे आरोपों की जांच कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा, 'तथ्य सामने आने जरूरी हैं और पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।' उन्होंने यह भी कहा कि एक प्रदर्शक की कथित गलती से समिट के बड़े एजेंडे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस समिट में AI गवर्नेंस, सुरक्षा, वॉटरमार्किंग, डीपफेक से निपटना और 100 से ज्यादा देशों के साथ वैश्विक सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई थी।

जांच प्रक्रिया पर सवाल

बहस अब जांच प्रक्रिया पर तेज हो गई। अगर यह सरकारी कार्यक्रम था, तो प्रोडक्ट दिखाने की अनुमति देने से पहले कैसी जांच की गई? गौर ने बताया कि उनकी अपनी भागीदारी के लिए तीन महीने की जांच प्रक्रिया और कई दौर की बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि पूरी प्रक्रिया ही खराब है।' उन्होंने यह भी बताया कि वहां कई बड़ी वैश्विक कंपनियां और भरोसेमंद स्टार्टअप्स मौजूद थे। लेकिन उन्होंने एक कमजोरी मानी। उनके अनुसार, हार्डवेयर इनोवेशन की गहराई से जांच शायद नहीं हुई। उन्होंने कहा, 'जब तक कोई ऐसा सिस्टम नहीं होगा जिसमें डिवाइस को लैब में ले जाकर उसकी बौद्धिक संपदा या पेटेंट की जांच हो सके, तब तक ऐसे मामलों की गुंजाइश बनी रहेगी।'

फंडिंग की कमी

इस विवाद से आगे बढ़ते हुए पैनल ने भारत के इनोवेशन सिस्टम की बड़ी समस्या पर बात की। झा ने बताया कि भारत रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर GDP का केवल लगभग 0.65% खर्च करता है, जबकि चीन और अमेरिका जैसे देश 3 से 4% तक खर्च करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा पर सरकारी खर्च घट रहा है। उनके अनुसार, जब तक स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मजबूत निवेश नहीं होगा, तब तक AI में नेतृत्व करना सिर्फ सपना ही रहेगा। झा ने कहा,'“दुनिया की टॉप 500 यूनिवर्सिटीज़ में हमारी एक भी यूनिवर्सिटी नहीं है।' उन्होंने इसे 'शर्मनाक सच' बताया और कहा कि अगर भारत को AI में आगे बढ़ना है तो इसे तुरंत सुधारना होगा।

सरकार की भूमिका

चर्चा में यह भी बात हुई कि इनोवेशन को बढ़ावा देने में सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए। संजय झा का कहना था कि सरकार को मजबूत डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए और शुरुआती रिसर्च के लिए फंड देना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि इंटरनेट और अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के उभरने में सरकार की अहम भूमिका रही थी। गौर ने भी माना कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और वेंचर कैपिटल का समर्थन बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, 'हमें सिर्फ तैयार फंडिंग चाहिए, जो अगले बड़े AI इनोवेशन में निवेश कर सके।' उन्होंने यह भी कहा कि भारत को “जुगाड़” की सोच से आगे बढ़ना होगा और गहरी हार्डवेयर तकनीक व बुनियादी AI क्षमता विकसित करनी होगी। उन्होंने साफ कहा, 'AI जुगाड़ से नहीं बन सकती। जो किसी और ने बनाया है, उसे अपना नहीं बताया जा सकता।'

अपवाद, नियम नहीं

जैन ने दोहराया कि इस घटना को सामान्य बात नहीं, बल्कि एक अपवाद की तरह देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'पूरी कानूनी प्रक्रिया होने दें। अगर कोई गलती हुई है, तो सजा मिलनी चाहिए।' उन्होंने कहा कि यह घटना संस्थानों के लिए एक सबक बननी चाहिए। साथ ही उन्होंने ज़ोर दिया कि सुरक्षित AI के विकास के लिए भरोसा और असलीपन (ऑथेंटिसिटी) सबसे ज़रूरी हैं। उन्होंने कहा, 'इसीलिए हमें भरोसेमंद AI की ज़रूरत है। यही इस समिट का मुख्य उद्देश्य था।'

पैनल के सभी सदस्यों ने माना कि भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों के लिए:

ज्यादा सख्त निगरानी

बेहतर जांच और मूल्यांकन व्यवस्था

भरोसेमंद विशेषज्ञों द्वारा गहन जांच

और संभव हो तो “रेड टीम” जैसी स्वतंत्र मूल्यांकन प्रणाली बहुत ज़रूरी हैं।

बड़ी तस्वीर

अपने अंतिम बयान में झा ने कहा कि भारत को सिर्फ सुर्खियां बटोरने के बजाय अपनी असली ताकत पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने बताया कि Y2K के समय वैश्विक IT सेवाओं में भारत की बड़ी भूमिका थी, लेकिन अभी तक भारत ने कोई ऐसा AI ब्रांड नहीं बनाया है जो दुनिया भर में छाया हो। उन्होंने सलाह दी, 'हम हाइप में बह रहे हैं। अपनी ताकत पर खेलिए।' उन्होंने विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय बनाने और सबको बराबर अवसर देने की जरूरत पर ज़ोर दिया, ताकि भारत की युवा आबादी की ताकत का पूरा फायदा उठाया जा सके।

अलग-अलग विचारों के बावजूद, तीनों पैनलिस्ट एक बात पर सहमत थे:

यह विवाद भारत के लंबे समय के AI सपनों को रोकना नहीं चाहिए, लेकिन इससे नैतिकता, फंडिंग, नियम-कानून और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर आत्ममंथन ज़रूर होना चाहिए।

( ऊपर दिया गया कंटेंट एक वीडियो से लिया गया है, जिसे एक खास तरीके से प्रशिक्षित AI मॉडल की मदद से ट्रांसक्राइब किया गया है। सटीकता, गुणवत्ता और संपादकीय विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हम “ह्यूमन-इन-द-लूप” (HITL) प्रक्रिया अपनाते हैं। इसका मतलब है कि AI पहले ड्राफ्ट तैयार करता है, लेकिन प्रकाशन से पहले हमारी अनुभवी संपादकीय टीम उसे ध्यान से पढ़ती है, सुधारती है और अंतिम रूप देती है। The Federal में हम AI की तेजी और मानव संपादकों के अनुभव को साथ मिलाकर भरोसेमंद और गहराई वाली पत्रकारिता पेश करते हैं। )

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