‘घूसखोर पंडत’ विवाद, कला की आज़ादी या आहत संवेदनाएं?
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‘घूसखोर पंडत’ विवाद, कला की आज़ादी या आहत संवेदनाएं?

‘घूसखोर पंडत’ फिल्म शीर्षक पर कानूनी चुनौती ने जाति, रचनात्मक स्वतंत्रता और ओटीटी नियमों को लेकर बहस छेड़ दी है।


प्रस्तावित फिल्म शीर्षक ‘घूसखोर पंडत’ ने कानूनी चुनौती के साथ-साथ जाति-संवेदनशीलता, रचनात्मक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को चुनौती देने के लिए अदालतों के बढ़ते इस्तेमाल पर एक व्यापक बहस छेड़ दी है। विवाद का केंद्र यह सवाल है कि क्या पंडित शब्द को घूसखोर (भ्रष्ट) के साथ जोड़ना ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ जातिसूचक अपमान है, या फिर इसके शब्दकोशीय अर्थ से आगे बढ़कर गलत व्याख्या की जा रही है।

द फेडरल ने इस मुद्दे पर पैनल चर्चा के तहत मामले के याचिकाकर्ता और अधिवक्ता विनीत जिंदल तथा फिल्म ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखड़े से बातचीत की। चर्चा का फोकस इस बात पर रहा कि यह विवाद वास्तविक पीड़ा को दर्शाता है या फिर भारतीय सिनेमा को आकार देने वाले उस बड़े रुझान का हिस्सा है, जिसे आलोचक “हेकलर का वीटो” कहते हैं—जहां शोर मचाने वालों के दबाव में रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोका या बदला जाता है।

यह विवाद एक नेटफ्लिक्स-आदेशित फिल्म से जुड़ा है, जिसका संबंध फिल्मकार नीरज पांडे से बताया जा रहा है, और यह सब तब हो रहा है जब दर्शकों ने फिल्म की सामग्री देखी तक नहीं है। मामला दिल्ली हाईकोर्ट में सूचीबद्ध होने के साथ ही ओटीटी नियमन, कलात्मक मंशा और कानूनी हस्तक्षेप की सीमा जैसे सवालों को फिर से सामने ले आया है।

कानूनी आपत्ति

दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले विनीत जिंदल ने कहा कि उनकी मुख्य आपत्ति घूसखोर शब्द के साथ पंडित के प्रयोग को लेकर है, जिसे उन्होंने मानहानिकारक बताया। उनके अनुसार, “पंडित” एक सम्मानसूचक संबोधन है और उसके साथ भ्रष्ट जैसा विशेषण जोड़ना पूरे समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने का जोखिम पैदा करता है।

जिंदल का तर्क है कि चिंता केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर पूर्व-सामग्री प्रमाणन की कमी से भी जुड़ी है। सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों के विपरीत, ऑनलाइन रिलीज होने वाली फिल्मों को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती, जिससे बिना नियामकीय जांच के सामग्री दर्शकों तक पहुंच जाती है। उनका कहना है कि शीर्षक ही सामग्री की प्रकृति पर सवाल खड़े करता है, इसलिए रिलीज से पहले सत्यापन जरूरी है, ताकि किसी समुदाय को निशाना न बनाया जाए।

'पंडित' शब्द का अर्थ

चर्चा इस सवाल पर भी केंद्रित रही कि क्या पंडित स्वभाविक रूप से जातिसूचक शब्द है। अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों शब्दकोशों में पंडित का अर्थ विद्वान, ज्ञानी व्यक्ति या शास्त्र, संगीत और दर्शन में निपुण व्यक्ति बताया गया है। इन परिभाषाओं में इसे सीधे तौर पर ब्राह्मण जाति से नहीं जोड़ा गया है।

गिरीश वानखड़े ने इसी व्याख्या का समर्थन करते हुए कहा कि पंडित शब्द का उपयोग उपनाम, सम्मानसूचक संबोधन और यहां तक कि बोलचाल की भाषा में भी व्यापक रूप से होता है, बिना किसी अनिवार्य जातिगत अर्थ के। उन्होंने 1975 की फिल्म ‘पोंगा पंडित’ का उदाहरण दिया, जिस पर उस समय कोई ऐसा विवाद नहीं हुआ था।

वानखड़े ने कहा कि फिल्म देखे बिना ही दुर्भावनापूर्ण मंशा मान लेना समाज में बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाता है। उनके अनुसार, फिल्म में संबंधित पात्र एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी है और उसका नाम उपनाम या उपाधि भी हो सकता है, न कि किसी पूरे समुदाय पर टिप्पणी।

सिनेमा और संवेदनशीलता

वानखड़े के मुताबिक, मौजूदा माहौल में दर्शक फिल्मों को सामग्री के बजाय शीर्षक और प्रचार सामग्री के आधार पर आंकने लगे हैं। बीते एक दशक में कई बार फिल्मकारों ने रिलीज से पहले ही विरोध के चलते शीर्षक या दृश्य बदल दिए हैं। उन्होंने कहा कि आज हर रचनात्मक निर्णय को पहचान और जाति के चश्मे से देखा जाता है, जिससे उद्योग जोखिम से बचने वाला हो गया है और निर्माता कलात्मक अभिव्यक्ति से अधिक व्यावसायिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने लगे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि नीरज पांडे, मनोज बाजपेयी और रितेश शाह जैसे स्थापित फिल्मकार जानबूझकर विवाद खड़ा करने की संभावना नहीं रखते। नेटफ्लिक्स के लिए बनाई गई फिल्म होने के नाते, यह परियोजना आंतरिक जांच से जरूर गुजरी होगी, खासकर वैश्विक बाजारों को देखते हुए।

ओटीटी नियमन पर बहस

जिंदल बार-बार ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की निगरानी के मुद्दे पर लौटे। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ऐसी सामग्री को बिना उन जांचों के जारी कर देते हैं, जो थिएटर रिलीज पर लागू होती हैं। उन्होंने ओटीटी नियमन के लिए स्पष्ट ढांचे की मांग करने वाली पिछली याचिकाओं और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, ओटीटी रिलीज से सामग्री तुरंत अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंच जाती है, जिससे सावधानी और भी जरूरी हो जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी कानूनी कार्रवाई का उद्देश्य रचनात्मकता को दबाना नहीं, बल्कि नियामकीय खामियों को उजागर करना है।

इसके जवाब में वानखड़े ने कहा कि रिलीज का माध्यम चुनना एक व्यावसायिक फैसला होता है, न कि वैचारिक। ओटीटी के लिए परियोजनाएं शुरुआत से ही तय होती हैं और इसका फिल्मकार की मंशा से कोई संबंध नहीं होता।

'हेकलर के वीटो' की चिंता

पैनल ने इस बात पर भी चर्चा की कि क्या ऐसे विवाद हेकलर के वीटो की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं जहां जोरदार विरोध के चलते रचनाकारों को सामग्री बदलनी या वापस लेनी पड़ती है। वानखड़े ने पद्मावत से लेकर हालिया ओटीटी शीर्षकों तक के उदाहरण देते हुए कहा कि यह चलन अब सामान्य हो गया है। उनके अनुसार, वित्तीय जोखिम से बचने के लिए प्रोडक्शन हाउस दबाव के आगे झुक जाते हैं, जिससे रचनात्मक स्वतंत्रता कमजोर होती है।

जिंदल ने इस आकलन से असहमति जताते हुए कहा कि जनता का आपत्ति उठाने का अधिकार नकारात्मक नहीं है। जब रचनात्मक विकल्प मानहानि या भेदभाव की सीमा पार करते हैं, तो कानूनी रास्ता अपनाना उचित है।

भेदभाव पर बहस

चर्चा में हाशिए पर मौजूद समुदायों एससी, एसटी और ओबीसी के खिलाफ संरचनात्मक भेदभाव का मुद्दा भी उठा। होस्ट ने कहा कि ऊंची जातियों के कुछ व्यक्तियों को भले ही किसी मामले में आपत्ति हो, लेकिन प्रणालीगत भेदभाव अब भी वंचित वर्गों को प्रभावित करता है। जिंदल ने जवाब दिया कि भेदभाव किसी के साथ भी हो सकता है और इसे किसी एक समूह तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने अपनी याचिका को राजनीतिक लामबंदी का हिस्सा मानने से इनकार करते हुए इसे एक विशिष्ट शीर्षक के खिलाफ कानूनी चुनौती बताया।

अदालत के फैसले का इंतजार

मामला अब अदालत के समक्ष है और दोनों वक्ताओं ने माना कि न्यायिक जांच ही तय करेगी कि याचिका विचार योग्य है या समय से पहले लाई गई है। यह फैसला न केवल इस फिल्म के लिए, बल्कि ओटीटी युग में फिल्मों के शीर्षक और सामग्री को चुनौती देने की प्रक्रिया के लिए भी मिसाल बन सकता है। पूरी बहस ने समकालीन भारत में कलात्मक स्वतंत्रता और सामुदायिक संवेदनशीलता के बीच तनाव की तरफ इशारा करता है। जहां दर्शकों के काम देखने से पहले ही अदालतों से सांस्कृतिक विवाद सुलझाने की अपेक्षा की जा रही है।

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