
10 मिनट का 'धोखा' और घटती कमाई: गिग वर्कर्स की ज़िंदगी का कड़वा सच !
कंपनियों ने 'दरियादिली' का ढोल तो पीटा, पर हकीकत में डिलीवरी पार्टनर्स की कमर ही टूट गई। द फ़ेडरल देश की पड़ताल: क्या वादे सिर्फ कागज़ी हैं और ज़मीन पर सन्नाटा?
Ground Report On Gig Workers : डिजिटल इंडिया की चमक के पीछे का अंधेरा जब आप अपने स्मार्टफोन पर 'Order Placed' का नोटिफिकेशन देखते हैं, तो एक घड़ी उल्टी चलने लगती है। बड़े-बड़े विज्ञापनों में दावा किया गया कि अब डिलीवरी पार्टनर्स पर 10 मिनट का दबाव नहीं है। संस्थानों ने वाह-वाही बटोरी कि उन्होंने सिस्टम बदल दिया है। लेकिन 'द फ़ेडरल देश' ने जब दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन इलाके में फ्लिपकार्ट और ब्लिंकिट के हब पर पड़ताल की, तो पता चला कि यह 'राहत' सिर्फ एक पीआर स्टंट (PR Stunt) थी।
समय का मायाजाल: दबाव हटा नहीं, बस चेहरा बदला है
हब पर मौजूद दर्जनों गिग वर्कर्स से जब हमने बात की, तो उनकी आंखों में बेबसी और गुस्से का मिला-जुला भाव था। सबका एक ही सुर में कहना था कि "साहब, कोई समय नहीं बढ़ा। ऐप आज भी हमें 9 से 11 मिनट की ही मोहलत देता है।" कंपनियों ने चालाकी यह की कि उन्होंने पिछले तीन दिनों से देरी होने पर वर्कर्स को कॉल करना बंद कर दिया है, लेकिन ऐप का एल्गोरिदम आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है।
वर्कर्स ने बताया कि जब ऐप पर टाइमर टिक-टिक करता है, तो वो मानसिक दबाव खुद-ब-खुद बन जाता है। अगर डिलीवरी में दो मिनट की भी देरी हो जाए, तो ग्राहक का व्यवहार बदल जाता है। फोन पर फटकार, दरवाज़े पर तंज और कई बार तो ऑर्डर ही कैंसिल कर दिया जाता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनियां खुद को 'दरियादिल' बता रही हैं, तो वे ऐप से उस 10 मिनट की डेडलाइन को क्यों नहीं हटातीं?
कमाई पर 'सर्जिकल स्ट्राइक': आधे रह गए दाम
इस कथित 'राहत' की आड़ में कंपनियों ने जो सबसे बड़ा वार किया है, वो है वर्कर्स की जेब पर। डिलीवरी पार्टनर्स ने खुलासा किया कि पिछले तीन दिनों के भीतर उनके डिलीवरी चार्जेज में भारी कटौती कर दी गई है। जो लड़का तीन दिन पहले तक एक डिलीवरी के 35 से 50 रुपये कमा रहा था, उसे अब मात्र 28-29 रुपये थमाए जा रहे हैं।
इसका सीधा गणित यह है कि जो वर्कर पहले दिन के 1000-1200 रुपये घर ले जाता था, दावा है कि उसकी कमाई अब 600-700 रुपये पर सिमट गई है। इसमें पेट्रोल का खर्च, बाइक की किश्त और मोबाइल का रिचार्ज सब वर्कर का अपना है। एक वर्कर ने भावुक होकर कहा, "पेट्रोल पहले भी महंगा था, अब भी है, लेकिन अब कम चार्जेज।"
सोसाइटी का अपमान और सड़क का जोखिम
हमारी टीम ने हकीकत जानने के लिए एक डिलीवरी पार्टनर के साथ आईपी एक्सटेंशन से मधु विहार के नरवाना अपार्टमेंट तक का सफर तय किया। सफ़र के दौरान पता चला कि इन वर्कर्स की जंग सिर्फ सड़क और समय से नहीं, बल्कि सिस्टम से भी है। बड़ी अपार्टमेंट सोसायटियों में इन्हें अंदर वाहन ले जाने की इज़ाज़त नहीं मिलती। गेट पर गाड़ी खड़ी करके, भारी सामान उठाकर पैदल मंजिलें चढ़ना इनकी रोज़ की नियति है। ऊपर से अगर एक साथ दो ऑर्डर हों, तो दूसरे ऑर्डर की सुरक्षा और देरी का डर इन्हें मानसिक बीमार बना रहा है।
चालान की मार: कमाई कम ज़ुर्माना ज़्यादा
हमारी टीम ने जब एक पार्टनर के साथ मधु विहार तक का सफर तय किया, तो उसकी बेबसी साफ दिखी। 7-8 महीने में 24 हज़ार रुपये का चालान! लोक अदालत और वकीलों के चक्कर काटकर जो मानसिक प्रताड़ना मिली, उसका कोई हिसाब नहीं है।
पार्टनर या आधुनिक मज़दूर?
कंपनियां इन्हें 'पार्टनर' कहती हैं, लेकिन हकीकत में ये बिना अधिकारों वाले वो मज़दूर हैं जो एक ऐसी दौड़ में शामिल हैं जिसका फिनिशिंग पॉइंट कभी नहीं आता। अगर ये सवाल उठाते हैं, तो इन्हें 'ब्लैकलिस्ट' करने या आईडी ब्लॉक करने की धमकी दी जाती है। 'द फ़ेडरल देश' की इस पड़ताल ने साफ कर दिया है कि 10 मिनट की डिलीवरी से राहत के दावे महज़ एक छलावा हैं। असलियत में, गिग वर्कर्स आज भी उसी दबाव में हैं, बस अब उनकी जेब और ज़्यादा खाली हो गई है।
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