
गीता प्रेस और संघ की समानांतर यात्रा, धर्म से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तक
पत्रकार अक्षय मुकुल के अनुसार गीता प्रेस ने ‘कल्याण’ के जरिए हिंदुत्व विचारधारा को साधारण हिंदू घरों तक पहुंचाया, धर्म और राजनीति को सांस्कृतिक रूप में जोड़ा।
पत्रकार अक्षय मुकुल का मानना है कि गीता प्रेस ने एक सदी लंबे राजनीतिक प्रकल्प को साधारण हिंदू घरों तक चुपचाप, सस्ते और लगातार तरीके से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका तर्क है कि गोरखपुर स्थित गीता प्रेस (स्थापना 1923) और उसका मुखपत्र ‘कल्याण’ (1926) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की समानांतर यात्रा के साथ आगे बढ़ते हुए उन विचारों, अनुष्ठानों और सामाजिक दृष्टिकोणों को आकार देते रहे, जो बाद में हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र में आ गए।
‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया’ के लेखक मुकुल से बातचीत में उन्होंने बताया कि 20वीं सदी के पहले चौथाई में हिंदू दक्षिणपंथ के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हुई। 1923 में गीता प्रेस, 1925 में RSS और 1926 में ‘कल्याण’—इन तीन-चार वर्षों में वह वैचारिक उथल-पुथल हुई, जिसने आगे चलकर हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति की बुनियाद रखी। उस समय हिंदू महासभा सहित अन्य संगठन पहले से मौजूद थे।
मुकुल के अनुसार, 1930 के दशक की शुरुआत विशेषकर पूना पैक्ट के समय गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के संस्थापक संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार का महात्मा गांधी से जाति, मंदिर प्रवेश और सहभोजन जैसे मुद्दों पर तीखा मतभेद हुआ। गीता प्रेस स्वयं को भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और कल्याण का वाहक बताता रहा, लेकिन 1926 के बाद के लगभग हर बड़े सामाजिक-राजनीतिक मोड़ पर RSS, गीता प्रेस और समान विचारधारा वाले संगठनों के बीच एक प्रकार का समन्वय दिखता है।
1940 के दशक में, जो अत्यंत ध्रुवीकृत दौर था, गीता प्रेस ने अपने कथित आध्यात्मिक दायरे से बाहर निकलकर सक्रिय राजनीति में भागीदारी की। मुकुल का कहना है कि गीता प्रेस की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने हिंदुत्व-प्रभावित हिंदू धर्म की एक व्याख्या को सामान्य हिंदू घरों तक पहुंचाया—ऐसे रूप में, जो प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक नहीं दिखता था। ‘कल्याण’ में व्रत-उपवास, नैतिक कहानियां, बच्चों और महिलाओं के लिए चित्रित कथाएं होती थीं, जो सतह पर धार्मिक लगती थीं, लेकिन भीतर से वे एक राजनीतिक दृष्टिकोण को स्थापित करती थीं।
‘कल्याण’ के पहले संपादकीय (अगस्त 1926) में ‘संघ बल’ की बात की गई, मुसलमानों को एक ‘अन्य’ के रूप में प्रस्तुत किया गया और गाय, स्त्री तथा समकालीन राजनीति जैसे विषयों को बार-बार उठाया गया। यहां तक कि पत्रिका में “वोट किसको दें” जैसे लेख भी प्रकाशित हुए, जो उसके घोषित आध्यात्मिक उद्देश्य से अलग दिशा में जाते थे।
मुकुल के अनुसार, ‘कल्याण’ का उद्देश्य हिंदुओं में कथित हीनभावना को दूर कर उन्हें एकजुट करना था। शैव और वैष्णव परंपराओं का उल्लेख होते हुए भी उनके अंतरों को प्रमुखता नहीं दी गई, बल्कि हिंदुओं को एक समेकित पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह दृष्टिकोण आगे चलकर हिंदुत्व की राजनीति में परिलक्षित हुआ।
वे गीता प्रेस को ‘संघ परिवार का फुट सोल्जर’ कहते हैं—हालांकि सड़क पर उतरकर आंदोलन करने वाले अर्थ में नहीं, बल्कि विचार और मानसिकता के स्तर पर काम करने वाले संगठन के रूप में। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को कम कीमत पर सुंदर चित्रों के साथ घर-घर पहुंचाने का कार्य गीता प्रेस ने उल्लेखनीय ढंग से किया। लेकिन इसके साथ-साथ ‘स्त्री धर्म प्रश्नोत्तरी’ (1926) जैसी पुस्तिकाओं के माध्यम से महिलाओं की भूमिका, परिवार और राष्ट्र निर्माण को लेकर विशेष विचारधारा भी प्रचारित की गई।
आज जब ‘सनातन धर्म खतरे में है’ जैसे नारे सुनाई देते हैं, मुकुल इसे पोद्दार युग की निरंतरता मानते हैं। उनका कहना है कि ‘कल्याण’ के शताब्दी अंक में भी ‘पुत्र प्राप्ति’ जैसे विषय शामिल हैं—जो 1926 में भी थे और आज भी हैं। यह दृष्टिकोण उस वैचारिक पृष्ठभूमि से आता है, जिसमें मुस्लिम शासन और फिर ब्रिटिश शासन को सांस्कृतिक पतन का कारण बताया गया और समाधान ‘सनातन धर्म की ओर लौटने’ में खोजा गया।
मुकुल के अनुसार, हाल के वर्षों में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव, एक धर्म’ जैसी अवधारणाओं के साथ ‘सनातन’ को हिंदू धर्म के एकमात्र वैध रूप के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विविधता चाहे वह धार्मिक हो या हिंदू धर्म के भीतर की उसे कम महत्व दिया जा रहा है।
1950 के ‘हिंदू सांस्कृतिक अंक’ को वे RSS की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा के अनुरूप मानते हैं। महिलाओं, इस्लाम और सामाजिक व्यवस्था पर विचारों में गीता प्रेस और संघ के बीच कोई बुनियादी अंतर नहीं दिखता। 1940 के दशक में हिंदू महासभा की बैठकों में जो मांगें उठीं जैसे हिंदुस्तान का स्वरूप और मुसलमानों की स्थिति उनकी झलक ‘कल्याण’ में भी मिलती है।
हनुमान प्रसाद पोद्दार की भूमिका पर मुकुल कहते हैं कि वे एक प्रभावशाली संपादक थे, जिन्होंने प्रेमचंद और निराला जैसे लेखकों को भी जोड़ा। अयोध्या में 1949 में मूर्ति स्थापना के समय उनकी उपस्थिति का उल्लेख कुछ स्रोतों में मिलता है। राम मंदिर निर्माण के लिए प्रारंभिक चंदा अभियान भी उन्होंने शुरू किया था।
हिंदू कोड बिल के विरोध में गीता प्रेस ने पाठकों से पोस्टकार्ड भेजने का अभियान चलाया। उस समय भी ‘हिंदू लड़कियों की सुरक्षा’, ‘गोमांस’ और ‘संपत्ति हड़पने’ जैसे मुद्दे उठाए गए। डॉ. भीमराव आंबेडकर पर भी तीखे शब्दों में आलोचना की गई। मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि और काशी के ज्ञानवापी मुद्दों पर भी ‘कल्याण’ के माध्यम से विचार प्रसारित किए गए।
आज के भारत में गीता प्रेस की भूमिका पर मुकुल का मानना है कि वह अभी भी प्रासंगिक है। ‘नारी अंक’ और ‘हिंदू सांस्कृतिक अंक’ जैसे विशेषांक लगातार पुनर्मुद्रित होते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि उनका एक पाठक वर्ग मौजूद है। उनका कहना है कि हम भले ही अपने-अपने विचारों के दायरे में रहते हों, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा इन अनुष्ठानों और इस विश्वदृष्टि को मानता है और यही गीता प्रेस की निरंतर प्रासंगिकता का कारण है।

