
सरकार की अपीलों से न्यायपालिका जाम, 5.6 करोड़ लंबित मामलों का दबाव
भारत में 5.6 करोड़ लंबित मामलों में आधा बोझ सरकार की तरफ है। अनावश्यक अपीलों और कमजोर नीतियों के कारण न्याय व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
भारतीय न्यायपालिका इस समय 5.6 करोड़ लंबित मामलों के भारी बोझ से लगभग जाम हो चुकी है। यह आंकड़ा बताता है कि न्याय व्यवस्था अपनी क्षमता की सीमा तक पहुँच चुकी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे कानूनी बोझ का लगभग आधा हिस्सा स्वयं सरकार के कारण है। देश में सबसे बड़ा वादी बनकर सरकार उसी न्याय प्रणाली को धीमा कर रही है, जिसे सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी उसी पर है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या जनवरी 2026 तक 92,828 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। मौजूदा गति से अगर नए मामले दर्ज न भी हों, तो भी अदालत को सभी मामलों को निपटाने में लगभग 1.4 वर्ष लगेंगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि नए मामले लगातार आते रहते हैं। फरवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच जहाँ 80,471 नए मामले दर्ज हुए, वहीं केवल 65,752 मामलों का ही निपटारा हो सका।
इस गंभीर स्थिति के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार कौन है? इसका उत्तर स्पष्ट है—सरकार, जो कुल लंबित मामलों में लगभग 46 से 50 प्रतिशत तक की हिस्सेदार है। कानून आयोग ने भी इस समस्या को बहुत पहले पहचान लिया था। 1988 की अपनी 126वीं रिपोर्ट और 2009 की 230वीं रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट किया था कि केंद्र और राज्य सरकारें सबसे बड़ी वादी हैं।
भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल लगभग 15 जज हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 150 है। 1.8 लाख से अधिक मामले ऐसे हैं जो 30 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित हैं। एक अनुमान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किए गए मामलों में सरकार की हिस्सेदारी 73 प्रतिशत तक है। 2017 में न्याय विभाग की एक कार्ययोजना में भी स्वीकार किया गया था कि 46 प्रतिशत लंबित मामलों में सरकार पक्षकार है।
यह स्थिति केवल सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि जिला अदालतों, उच्च न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों तक समान रूप से दिखाई देती है। सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर साफ नजर आता है। दिसंबर 2021 में लोकसभा में दिए गए एक उत्तर में बताया गया कि राष्ट्रीय वाद नीति (NLP) अभी भी “विचाराधीन” है, जबकि इसे बने 11 साल हो चुके थे।
सरकारी विभागों को निर्देश दिए गए थे कि वे अनावश्यक अपील न करें, खासकर तब जब मामला पहले ही दो स्तरों पर हार चुका हो। फिर भी, व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। उदाहरण के तौर पर, सुखविंदर सिंह मामले में सरकार दो बार हारने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट पहुँची।इसका परिणाम गंभीर है। देश की जेलों में लगभग 77 प्रतिशत कैदी अंडरट्रायल हैं, जो वर्षों तक सुनवाई का इंतजार करते रहते हैं। हर अनावश्यक सरकारी अपील किसी कैदी, पेंशनभोगी या जमीन मालिक के समय को छीन लेती है।
सरकार ने इस समस्या को पहले भी पहचाना था। 2010 में राष्ट्रीय वाद नीति बनाई गई, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि सरकार को “अनावश्यक मुकदमेबाजी” से बचना चाहिए। 2015 में इसे अपडेट किया गया और मामलों की निगरानी के लिए LIMBS नामक डिजिटल सिस्टम शुरू किया गया। 2017 में मुकदमों को कम करने के लिए एक कार्ययोजना भी लाई गई। लेकिन 16 साल बाद भी यह नीति कागजों तक ही सीमित है।
सरकार लगातार मुकदमे क्यों करती है? इसका कारण संरचनात्मक है। यदि कोई सरकारी अधिकारी विवाद सुलझाता है, तो उसे ऑडिट या सतर्कता जांच का डर रहता है। लेकिन यदि वह अपील करता है, चाहे मामला कितना ही कमजोर क्यों न हो, तो उसे कोई जोखिम नहीं होता। इसलिए अपील करना ही एक सुरक्षित विकल्प बन जाता है।
हाल ही में एक सम्मेलन में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने इस स्थिति को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सरकार एक तरफ न्यायिक व्यवस्था की संरक्षक है और दूसरी तरफ सबसे बड़ी मुकदमेबाज भी। वह लंबित मामलों की शिकायत भी करती है और उन्हीं मामलों को बढ़ाने का कारण भी बनती है।सुखविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज करते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया और सवाल उठाया—“लंबित मामलों के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन है?” अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला राष्ट्रीय वाद नीति का उल्लंघन था।
हालाँकि, केवल जुर्माना लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए व्यापक संरचनात्मक सुधार जरूरी हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायिक सुधार आयोग बनाने का सुझाव दिया, जिसमें न्यायपालिका, वकील और सरकार के प्रतिनिधि शामिल हों।कुछ सरल उपाय तुरंत लागू किए जा सकते हैं। हर मंत्रालय में सशक्त समिति बनाई जाए जो अपील करने से पहले मामलों की समीक्षा करे। अधिकारियों को विवाद सुलझाने पर सुरक्षा दी जाए। अपील की सलाह देने वाले विधि अधिकारियों को लिखित कारण देना अनिवार्य किया जाए। और जिन मामलों में अदालत जुर्माना लगाए, वहाँ संबंधित विभागों की जवाबदेही तय की जाए।
सरकार ने 2010 में नीति बनाई, 2017 में कार्ययोजना तैयार की और डिजिटल सिस्टम भी बनाया, लेकिन समस्या बनी रही क्योंकि मूल प्रोत्साहन प्रणाली नहीं बदली। वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब किसी सरकारी अधिकारी के लिए अदालत के आदेश को स्वीकार करना अपील करने से अधिक सुरक्षित हो जाएगा।जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक सरकार एक साथ लंबित मामलों की शिकायत करने वाली और उनकी सबसे बड़ी वजह बनी रहेगी।

