
भाजपा उम्मीदवार के ‘हिंदू विधायक’ बयान से राजनीतिक और कानूनी बवाल
गोपालकृष्णन के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायतें दर्ज कराई गईं, जिनमें आरोप है कि चुनाव प्रचार में धर्म का हवाला देकर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है...
केरल की मंदिर नगरी गुरुवायूर में धार्मिक प्रतिनिधित्व को लेकर भाजपा उम्मीदवार गोपालकृष्णन के विवादित बयान ने तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया, अदालत की निगरानी और पहचान, सह-अस्तित्व तथा चुनावी राजनीति पर व्यापक बहस को जन्म दे दिया है। यह कहानी, जैसा कि अक्सर राजनीतिक विवादों में होता है, एक वीडियो और सोच-समझकर चुने गए समय के साथ शुरू हुई।
जैसे ही, बी गोपालकृष्णन को मंदिर नगरी गुरुवायूर से भाजपा का उम्मीदवार घोषित किया गया, इन्होंने एक वीडियो जारी किया, जिसने केरल की राजनीति में हलचल पैदा कर दी। मंदिर के सामने खड़े होकर, कैमरे के सामने उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के बारे में एक स्पष्ट दावा किया, जहां प्रतिष्ठित गुरुवायूर मंदिर स्थित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मंदिर नगरी ने हाल के दशकों में किसी हिंदू विधायक का चुनाव नहीं किया है।
हालांकि गोपालकृष्णन का यह वीडियो अब हटा लिया गया है, जिसमें इन्होंने कहा “यह निर्वाचन क्षेत्र, जो एक अंतरराष्ट्रीय तीर्थ केंद्र है, यहां हिंदू विधायक क्यों नहीं है? मुझे गुरुवायूरप्पन ने इस भूमि को मंदिर लुटेरों और मंदिर-विरोधियों के आधी सदी लंबे कब्जे से मुक्त कराने के लिए बुलाया है।”
यह बयान सीधा, राजनीतिक और प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के उद्देश्य से दिया गया था। कुछ ही घंटों में यह तेजी से फैल गया, जिससे विरोधी दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और यह चर्चा निर्वाचन क्षेत्र से बाहर भी फैल गई। जैसे-जैसे आलोचना बढ़ती गई, गोपालकृष्णन ने अपने रुख को दोहराया और पीछे हटने के बजाय अपने तर्क को और तीखा कर दिया।
“मैं अपने बयान पर कायम हूं। अगर कोई खुद को ‘मुस्लिम’ लीग का विधायक कह सकता है तो मैं हिंदू विधायक होने का दावा क्यों नहीं कर सकता? हिंदू एक धर्म से ज्यादा एक संस्कृति है।”
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सार्वजनिक रूप से गोपालकृष्णन के रुख का समर्थन किया। उन्होंने उनके बयान का बचाव करते हुए कुछ ऐसे दावे किए, जो चौंकाने वाले और तर्क से परे माने गए, और वैश्विक धार्मिक केंद्रों के साथ तुलना भी की।
“क्या आप मक्का में गैर-मुस्लिम प्रतिनिधि या वेटिकन में गैर-ईसाई प्रतिनिधि रख सकते हैं?” उन्होंने कहा, जिससे व्यापक आश्चर्य की प्रतिक्रिया सामने आई।
सुरेश गोपी की जीत के बाद भाजपा की रणनीति
राजनीतिक परिदृश्य ने भी भाजपा की रणनीति को आकार दिया। हाल के लोकसभा चुनाव में अभिनेता से राजनेता बने सुरेश गोपी, जिन्होंने त्रिशूर से जीत दर्ज की, ने गुरुवायूर सहित कई हिस्सों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। उन्होंने वहां 45,049 वोट हासिल किए, हालांकि वे तीसरे स्थान पर रहे (यह एकमात्र विधानसभा क्षेत्र था जहां वे पीछे रहे)।
फिर भी, मंदिर नगरी क्षेत्र में वोट शेयर में हुई उल्लेखनीय बढ़ोतरी को पार्टी के भीतर बढ़ती स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखा गया, जिसके चलते आगामी विधानसभा चुनाव में पहचान और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर अधिक आक्रामक रणनीति अपनाई गई।
इस निर्वाचन क्षेत्र में गुरुवायूर और चावक्काड नगरपालिकाएं तथा आसपास की पंचायतें- एंगडियूर, ओरुमनायूर, कडप्पुरम, पुन्नायूर, वडक्केकड और पुन्नायूरकुलम शामिल हैं। यह क्षेत्र सामाजिक रूप से मिश्रित है, जहां हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय आपस में नजदीकी के साथ रहते हैं और बाजार, संस्थान तथा सार्वजनिक स्थान साझा करते हैं।
निर्वाचन क्षेत्र की विविध राजनीतिक विरासत
वर्षों के दौरान विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। शुरुआती प्रमुख व्यक्तियों में पीके कोरू शामिल थे, जो जन्म से हिंदू थे और कम्युनिस्ट आंदोलन के समर्थन से 1957 में पहले विधायक बने। इसके बाद केजी करुणाकरा मेनन, वार्की वडक्कन और वीवीएस थंगल जैसे नेता आए, जिन्होंने अलग-अलग राजनीतिक धाराओं और समुदायों का प्रतिनिधित्व किया।
यह सिलसिला आगे भी जारी रहा, जिसमें पीएम अबूबकर, पीकेके बावा, पीटी कुन्हुमुहम्मद और केवी अब्दुल खदर जैसे नेता शामिल रहे। इसके बाद यह सीट वर्तमान विधायक एनके अकबर के पास गई, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से हैं।
सह-अस्तित्व और धर्मनिरपेक्षता की बात
विवाद के बीच बोलते हुए एनके अकबर ने केवल गोपालकृष्णन के दावे का खंडन ही नहीं किया, बल्कि सह-अस्तित्व की सार्वजनिक स्मृति पर आधारित एक अलग दृष्टिकोण भी रखा।
उन्होंने कहा, “जब नवंबर 1970 में गुरुवायूर मंदिर में आग लगी थी, तब पास की मस्जिद ने अपने अज़ान के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर लोगों को इकट्ठा किया और चर्च ने घंटियां बजाईं। यही सह-अस्तित्व और धर्मनिरपेक्षता की परंपरा है, जिसका हम पालन करते हैं।”
अकबर ने आगे इस निर्वाचन क्षेत्र की राजनीतिक परंपरा का उल्लेख करते हुए जोर दिया कि विभिन्न समुदायों और दलों के नेताओं ने गुरुवायूर का प्रतिनिधित्व किया है, बिना मंदिर के संचालन या श्रद्धालुओं के अनुभव पर किसी प्रभाव के।
उन्होंने कहा, “हमारे आसपास मम्मियूर मंदिर, मनथला मस्जिद और पालयूर चर्च हैं। यही हमारी परंपरा है। गोपालकृष्णन के साम्प्रदायिक बयानों के जवाब में मुझे कुछ नहीं कहना है। उन्हें अपनी प्रासंगिकता साबित करनी है, इसलिए वे इस तरह की हरकतें कर रहे हैं।”
विवाद के बीच बोलते हुए, सीपीआई(एम) के एनके अकबर ने केवल गोपालकृष्णन के दावे को खारिज नहीं किया, बल्कि सह-अस्तित्व की सार्वजनिक स्मृति पर आधारित एक अलग दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया।
जब धार्मिक सीमाएं खत्म हो गईं
1970 की आग का संदर्भ यूं ही नहीं दिया गया था। यह एक ऐसी घटना है, जो आज भी स्थानीय स्मृति में जीवित है और अक्सर उस क्षण के रूप में याद की जाती है, जब संकट के समय धार्मिक सीमाएं खत्म हो गई थीं। कई निवासियों के लिए यह एक याद दिलाने वाला उदाहरण है कि गुरुवायूर की पहचान को केवल एक धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता।
“गुरुवायूर का वर्तमान विकास बी. गोपालकृष्णन की पार्टी से किसी भी तरह जुड़ा नहीं है। भाजपा और संघ परिवार ने गुरुवायूर मंदिर प्रवेश आंदोलन का विरोध किया था और सामाजिक रूप से इसके खिलाफ रुख अपनाया था। यही वह विरासत है, जिसका गोपालकृष्णन प्रतिनिधित्व करते हैं। गुरुवायूर के विकास में धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुख्य भूमिका निभाई है। जो वह अब करने की कोशिश कर रहे हैं, वह लोगों के बीच विभाजन पैदा करने वाली राजनीति है,” गुरुवायूर से तीन बार विधायक रह चुके और वर्तमान में सीपीआई(एम) के त्रिशूर जिला सचिव के.वी. अब्दुल खदर ने कहा।
यूडीएफ उम्मीदवार सीएच राशीद ने कहा, “सिर्फ बी. गोपालकृष्णन के कहने से गुरुवायूर में साम्प्रदायिक विभाजन नहीं होगा। भले ही फासीवादी ताकतें कोशिश करें, वे यहां साम्प्रदायिकता को बढ़ावा नहीं दे पाएंगी।” सीएच राशीद ने दोहराया कि केवल गोपालकृष्णन के बयान से गुरुवायूर में साम्प्रदायिक विभाजन उत्पन्न नहीं होगा।
ईसीआई और केरल हाईकोर्ट में शिकायतें
जैसे-जैसे राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई, यह विवाद केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा। इस मामले में चुनाव आयोग के समक्ष शिकायतें दर्ज कराई गईं, जिनमें आरोप लगाया गया कि चुनाव प्रचार के दौरान धर्म का उल्लेख कर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है। आयोग ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा, जिससे यह मामला औपचारिक नियामक प्रक्रिया में आ गया।
साथ ही यह मामला केरल उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा। सीपीआई(एम) और कांग्रेस से जुड़े याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है और संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्र में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखता है। अदालत ने मामले पर विचार करते हुए इसे गंभीर प्रकृति का बताया और चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह निर्धारित समय-सीमा के भीतर उचित कार्रवाई करे।
इन हस्तक्षेपों से विवाद तुरंत समाप्त नहीं हुआ, लेकिन इसकी दिशा और स्वर जरूर बदल गया। जो बात एक चुनावी दावा के रूप में शुरू हुई थी, अब उसे कानूनी और संवैधानिक मानकों पर परखा जाने लगा।
गुरुवायूर – एक साझा स्थान
जमीनी स्तर पर, हालांकि, राजनीतिक संघर्ष जारी रहा।
निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार के तहत होने वाली जनसभाएं अब इस विभाजन को दर्शाने लगीं। जहां एक ओर बुनियादी ढांचा, पर्यटन और नागरिक सुविधाओं जैसे विकास के मुद्दे केंद्र में बने रहे, वहीं यह विवाद भी भाषणों और चर्चाओं में जगह बनाने लगा। लेकिन भाषणों और बयानों से परे, लोगों के बीच एक शांत प्रतिक्रिया भी आकार ले रही थी।
मंदिर के पास की चाय की दुकानों में, चावक्काड की व्यस्त सड़कों पर और तटीय पंचायतों में बातचीत अक्सर एक ही निष्कर्ष पर लौट आती थी। कई लोगों का कहना था कि गुरुवायूर हमेशा से एक साझा स्थान रहा है। बाहर की दुनिया के लिए भले ही मंदिर उसकी पहचान तय करता हो, लेकिन निर्वाचन क्षेत्र के भीतर का दैनिक जीवन धार्मिक सह-अस्तित्व से ही आकार लेता है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, यह सवाल अब भी खुला हुआ है। क्या गुरुवायूर के मतदाता अपनी राजनीतिक पहचान की नई व्याख्या को स्वीकार करेंगे, या फिर वे उन परंपराओं को दोहराएंगे, जिन्होंने दशकों से इस निर्वाचन क्षेत्र को परिभाषित किया है?
इन सबके बीच, एक वीडियो से शुरू हुई यह बहस अब भी गूंज रही है, जो सिर्फ राजनीतिक दावों की ही नहीं, बल्कि इस बात की भी परीक्षा ले रही है कि आखिर गुरुवायूर किसका प्रतिनिधित्व करता है।

