
'सिर्फ 39 रुपये बढ़ा वेतन' नोएडा में सैलेरी संग्राम की Inside Story
नोएडा फेज-2 में मजदूरों का वेतन वृद्धि को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन सोमवार को हिंसक हो गया, जिसमें आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। लेकिन यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ। यह सालों से जमा हो रहे शोषण का नतीजा है।
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा (Phase 2) में पिछले चार दिनों से सुलग रही नाराजगी सोमवार सुबह एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी। गारमेंट और एक्सपोर्ट सेक्टर से जुड़े हजारों मज़दूर सड़कों पर उतर आए। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया कहीं पत्थरबाजी हुई, तो कहीं गाड़ियों में तोड़फोड़, तो कहीं आगजनी। लेकिन इस धुएं और हंगामे के पीछे एक ऐसी हकीकत दफन है, जिसे प्रशासन और कंपनियां सालों से नजरअंदाज कर रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ पत्थर फेंकने की नहीं, बल्कि अपने हक की रोटी मांगने की है।
महंगाई की मार और 'खाली जेब'
प्रदर्शन में शामिल 18 साल के सुरेंद्र कश्यप से लेकर 28 साल के नूर आलम तक, सबकी एक ही कहानी है। सवाल यही है कि इतनी कम सैलेरी में घर कैसे चलाएं?
1. सुरेंद्र कश्यप (18 वर्ष): "मानेसर में 20 हजार, तो नोएडा में 13 हजार क्यों?"
संबल (UP) के रहने वाले सुरेंद्र नोएडा के सेक्टर 49 स्थित 'अनुभव अपेरल्स' में मेजरमेंट चेकर का काम करते हैं। उनकी कुल आय 13,000 रुपये है। सुरेंद्र का कहना है, 'गुड़गांव के पास मानेसर में मजदूरों को 8 घंटे के काम के 20,000 रुपये मिलते हैं, फिर हमें क्यों नहीं? 13 हजार में से 4 हजार किराया निकल जाता है, राशन और गैस के बाद हाथ में कुछ नहीं बचता।'
सुरेंद्र ने कंपनियों के शोषण की पोल खोलते हुए बताया कि उनसे हर घंटे 70 पीस का असंभव टारगेट मांगा जाता है। टारगेट पूरा न होने पर अपमानित किया जाता है। बीमार होने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है और रविवार को भी जबरन काम कराया जाता है। सालों की मेहनत के बाद उन्हें वेतन में महज 320 रुपये की बढ़ोतरी मिली है।
2. राहुल (25 वर्ष): "बच्चों को पढ़ाऊं या खुद भूखा सो जाऊं?"
कन्नौज के रहने वाले राहुल 2018 से एक्सपोर्ट लाइन में काम कर रहे हैं। दो छोटे बच्चों के पिता राहुल की सैलेरी 13,500 रुपये है। राहुल के शब्दों में दर्द साफ झलकता है, '5 हजार कमरे का किराया और 4 हजार का राशन। पीएफ कटने के बाद घर चलाने के लिए सिर्फ 3 हजार बचते हैं। मैं अपने परिवार को क्या खिलाऊं और बच्चों को कैसे पढ़ाऊं? पिछले साल मेरी सैलेरी में सिर्फ 39 रुपये बढ़ाए गए! क्या यह मजाक नहीं है?'
3. मोहम्मद नूर आलम (28 वर्ष): "सिलेंडर ब्लैक में मिल रहा, सरकार ने क्या दिया?"
बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले नूर आलम कारीगरी का काम करते हैं। वे 20,000 रुपये कमाते हैं, लेकिन बढ़ती महंगाई ने उन्हें भी लाचार कर दिया है। आलम कहते हैं, 'सब कुछ इतना महंगा है कि मैं अपनी मां को एक पैसा नहीं भेज पाता। जो चावल 15 रुपये किलो मिलता था, आज वह कई गुना महंगा है। हमने इस सरकार को इसलिए चुना था कि कीमतें कम होंगी, लेकिन आज सिलेंडर ब्लैक में 5,000 रुपये तक मिल रहा है। युद्ध का बहाना बनाया जा रहा है, पर बाकी चीजें क्यों महंगी हो रही हैं?'
शोषण का जाल और श्रमिकों का गुस्सा
नोएडा के इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ। यह सालों से जमा हो रहे शोषण का नतीजा है। कंपनियों के एचआर (HR) विभाग मजदूरों की सुनवाई नहीं करते। ओवरटाइम का पैसा न मिलना, छुट्टी मांगने पर बेइज्जत करना और महंगाई के अनुपात में वेतन न बढ़ाना अब एक बड़ा सामाजिक मुद्दा बन चुका है।

