ईरान युद्ध गहराया तो भारत की ईंधन व्यवस्था कितनी सुरक्षित?
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ईरान युद्ध गहराया तो भारत की ईंधन व्यवस्था कितनी सुरक्षित?

पश्चिम एशिया तनाव और होर्मुज संकट से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा बढ़ iगया है। LPG, CNG और सिटी गैस सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जबकि तेल कीमतों में भी उछाल संभव है।


पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए बड़ी चिंता बन सकता है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है। भारत अपनी तेल जरूरतों का करीब 88 प्रतिशत और गैस का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर भारत के पूरे ऊर्जा तंत्र पर तेजी से पड़ सकता है।

इसी विषय पर AI With Sanket कार्यक्रम में द फेडरल ने डेलॉइट साउथ एशिया के चीफ ग्रोथ ऑफिसर देबाशीष मिश्रा से बातचीत की। उन्होंने बताया कि मौजूदा संकट भारत की ईंधन सुरक्षा, एलपीजी की उपलब्धता, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन और पेट्रोल-डीजल की कीमतों को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

भारत की ऊर्जा जरूरतों पर संकट का असर

देबाशीष मिश्रा के अनुसार मौजूदा स्थिति ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक ब्लैक स्वान इवेंट जैसी है—यानी ऐसा बड़ा और अप्रत्याशित संकट जो पूरे ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा भारत अपनी गैस का करीब आधा हिस्सा और बड़ी मात्रा में एलपीजी भी विदेशों से मंगाता है। इनका बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आता है और होर्मुज चोकपॉइंट से होकर गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की बाधा का भारत पर सीधा असर पड़ना तय है।

हालांकि अलग-अलग ईंधन पर इसका प्रभाव अलग हो सकता है। कच्चे तेल के मामले में भारत के पास रणनीतिक भंडार मौजूद हैं। देश की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू जरूरतों से ज्यादा है और पाइपलाइन व भंडारण व्यवस्था भी मजबूत है, इसलिए कुछ हफ्तों तक तेल की आपूर्ति जारी रह सकती है। लेकिन एलपीजी और एलएनजी के मामले में यह सुरक्षा काफी सीमित है।

किन ईंधन क्षेत्रों पर पहले पड़ेगा असर

मिश्रा के मुताबिक संकट लंबा खिंचने पर सबसे पहले एलपीजी और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन प्रभावित होंगे। वाणिज्यिक एलपीजी की कमी के संकेत अभी से दिखने लगे हैं। होटल और रेस्तरां गैस की कमी की शिकायत कर रहे हैं। इसके बाद पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर असर पड़ सकता है। फिलहाल पेट्रोल और डीजल की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर है।

एलएनजी और गैस आपूर्ति पर खतरा

भारत की लगभग 50 प्रतिशत गैस जरूरत एलएनजी के रूप में पूरी होती है और इसका बड़ा हिस्सा कतर से आता है। यदि होर्मुज क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो कतर से आने वाले गैस कार्गो प्रभावित हो सकते हैं।ऐसी स्थिति में भारत अपनी घरेलू गैस उत्पादन को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे उर्वरक संयंत्रों और जरूरी शहरी आपूर्ति की ओर मोड़ सकता है। लेकिन इससे वाणिज्यिक एलपीजी और शहरों में गैस आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या घरेलू उत्पादन से कमी पूरी हो सकती है?

भारत की रिफाइनरियां हर साल लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ मीट्रिक टन एलपीजी का उत्पादन करती हैं। सरकार ने रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं ताकि आयात में कमी की भरपाई की जा सके। हालांकि गैस के मामले में स्थिति ज्यादा जटिल है। गैस उत्पादन तुरंत बढ़ाना आसान नहीं होता, इसलिए सीएनजी और पीएनजी की आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका ज्यादा है।

सीएनजी और पीएनजी पर असर का मतलब

यदि सीएनजी और पाइप्ड गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ेगा। भारत में कई शहरों में सार्वजनिक और वाणिज्यिक परिवहन का बड़ा हिस्सा सीएनजी पर चलता है।इसके अलावा देश के कई बड़े शहरों में लाखों घर खाना पकाने के लिए पीएनजी पर निर्भर हैं। ऐसे में गैस आपूर्ति में रुकावट एक बड़ी शहरी समस्या बन सकती है।

क्या कतर पर भारत की निर्भरता ज्यादा है?

एलएनजी सिर्फ कतर से ही नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों से भी आयात किया जा सकता है। लेकिन तुरंत नए कार्गो की व्यवस्था करना आसान नहीं होता। उन्हें लाने, री-गैसिफिकेशन टर्मिनल तक पहुंचाने और पाइपलाइन नेटवर्क में शामिल करने में समय लगता है। इसलिए कुछ समय के लिए आपूर्ति संकट की स्थिति बन सकती है।

कच्चे तेल की आपूर्ति भी चुनौती

भारत रोजाना 50 लाख बैरल से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और इसका लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से होर्मुज मार्ग के जरिए आता है। यदि यह मार्ग प्रभावित होता है तो भारत को अन्य स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है और रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।रिफाइनरियां यदि एलपीजी उत्पादन बढ़ाती हैं तो पेट्रोल और डीजल के उत्पादन में कुछ कमी आ सकती है, क्योंकि एक ही रिफाइनरी से कई तरह के उत्पाद निकलते हैं। इसलिए यह एक जटिल संतुलन का मामला बन जाता है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर

कच्चे तेल की कीमत पहले ही करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है। सामान्य तौर पर हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से उपभोक्ता स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमत करीब 5 रुपये प्रति लीटर बढ़ सकती है।हाल के दिनों में कीमतों में लगभग 50 डॉलर की बढ़ोतरी हुई है, जिसका मतलब सैद्धांतिक रूप से करीब 25 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी हो सकता है। हालांकि यह तुरंत लागू नहीं होता। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो सरकार को कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।

क्या सरकार टैक्स घटा सकती है?

सरकार पहले भी कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर पेट्रोल और डीजल पर टैक्स कम कर चुकी है। ये ईंधन GST के दायरे में नहीं आते और इन पर केंद्र व राज्य दोनों टैक्स लगाते हैं। इसलिए टैक्स में कटौती कर कीमतों का असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है।फिलहाल भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर मानी जा रही है। चालू खाता घाटा करीब 1 प्रतिशत के आसपास है और महंगाई भी बहुत ज्यादा नहीं है। ऐसे में सरकार के पास कुछ हद तक कीमतों को नियंत्रित करने की गुंजाइश मौजूद है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि संकट जल्द खत्म नहीं हुआ तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका असर पड़ेगा। हालांकि कई छोटे देश भारत की तुलना में कहीं ज्यादा संवेदनशील स्थिति में हैं। इसलिए दुनिया भर में यही उम्मीद की जा रही है कि यह संकट जल्द समाप्त हो।

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