
‘किलिंग बॉक्स’ बना स्मार्टफोन? नींद पर मंडराता डिजिटल खतरा
मोबाइल, ओटीटी और बदलती वर्क लाइफ के कारण शहरी भारत में नींद की गुणवत्ता गिर रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक स्क्रीन टाइम, तनाव और अनियमित रूटीन इसकी बड़ी वजह हैं।
“मुझे समझ नहीं आता कि मैं सोने के लिए बिस्तर पर क्यों नहीं चला जाता। लेकिन फिर सोचता हूँ कि तब तो सुबह हो जाएगी। इसलिए चाहे मैं कितना भी थका हुआ या उलझा हुआ क्यों न होऊँ, मैं एक घंटे की और नींद छोड़कर जी सकता हूँ।”
— Sylvia Plath, The Unabridged Journals of Sylvia Plath
दिल्ली की 23 वर्षीय शिक्षिका निकिता सिंह के लिए रात का बिस्तर भी उनके कामकाजी दिन की छाप से मुक्त नहीं होता। सोने के लिए लेटते समय उनके पास ही चार्जिंग केबल रहती है—सॉकेट से निकाली हुई, लेकिन मोबाइल या लैपटॉप की बैटरी कम होते ही तुरंत लगाने के लिए तैयार। बेडसाइड टेबल पर इस्तेमाल किया हुआ कॉफी मग रखा रहता है और कई बार जिस प्लेट में उन्होंने रात का खाना खाया होता है, वह भी मोबाइल और लैपटॉप के साथ बिस्तर पर ही पड़ी रहती है, जिसे सुबह ही हटाया जाता है।
कमरे की लाइट बंद होने के बाद भी मोबाइल की रोशनी उनके चेहरे पर चमकती रहती है। निकिता कहती हैं, वो आमतौर पर रात को सोने से पहले आराम करने की कोशिश करती हूँ, काम के बारे में नहीं सोचती। रील्स स्क्रॉल करती हूँ या छोटे-मोटे गेम खेलती हूँ। फिर आँखें बंद कर लेती हूं और संगीत सुनते हुए धीरे-धीरे सो जाती हूं। लेकिन वह मानती हैं कि उनके रात के अधिकांश समय पर स्क्रीन का कब्ज़ा रहता है।
“अगर सोने से पहले दोस्तों या परिवार से बात करनी हो तो मोबाइल ही इस्तेमाल करना पड़ता है। संगीत भी मोबाइल पर ही सुनती हूँ। मुझे असली किताबें पढ़ना पसंद है, लेकिन अगर काम से जुड़ा कुछ पढ़ना हो और इंटरनेट चाहिए हो तो फिर लैपटॉप या मोबाइल ही इस्तेमाल करना पड़ता है।”
सोने से पहले मोबाइल की आदत
आज के अधिकतर शहरी भारतीयों के लिए सोने की शुरुआत लैपटॉप बंद करने से होती है। लेकिन इसके बाद मोबाइल हाथ में आ जाता है। जैसे Sylvia Plath ने लिखा था, वैसे ही हम भी नींद को थोड़ा और टालने की कोशिश करते हैं—एक और रील, ओटीटी पर सीरीज़ का एक और एपिसोड, किसी दोस्त को फोन या मैसेज, या बस बिना उद्देश्य सोशल मीडिया स्क्रॉल करना।
कभी सोने से पहले कुछ तयशुदा आदतें होती थीं—नाइट ड्रेस पहनना, बिस्तर ठीक करना, किताब पढ़ना या धीमा संगीत सुनना, और कुछ लोगों के लिए सोने से पहले गर्म दूध पीना। लेकिन अब ये सब धीरे-धीरे उस जीवनशैली में पीछे छूट गए हैं जो हमेशा ऑनलाइन और लगातार जुड़ी हुई रहती है।
कई पेशेवरों के लिए अब दिन में काम और रात में आराम का स्पष्ट फर्क भी खत्म हो गया है। कई क्षेत्रों में देर रात तक काम करना या चौबीसों घंटे की शिफ्ट आम हो गई है। कोविड महामारी के दौरान वर्क-फ्रॉम-होम के अनुभव ने तो बिस्तर को ही वर्कस्टेशन बना दिया था। बहुत से लोग पजामे में ही बिस्तर पर बैठकर काम करते रहे, लेकिन सोने के लिए नहीं।
महामारी के बाद भी रिमोट वर्क का चलन जारी रहा। शहरों के छोटे फ्लैटों में अलग से स्टडी रूम की जगह न होने के कारण बेडरूम ही कार्यस्थल, आराम की जगह और कभी-कभी भोजन की जगह भी बन गया।
बदलते घर और बदलती सजावट
चेन्नई के वीडियो एडिटर जगदेशन के. का कहना है कि अलग-अलग शिफ्ट और काम के समय के कारण उनके लिए रात का कोई तय रूटीन बनाना मुश्किल है। रिमोट और हाइब्रिड काम के कारण बेडरूम अब बहुउद्देश्यीय हो गया है।घर की सजावट में भी बदलाव आया है। पहले हल्के रंगों की दीवारें और बेडशीट आम थीं, लेकिन अब गहरे और बोल्ड रंगों का चलन बढ़ रहा है। चेन्नई की इंटीरियर डिजाइनर उषा कहती हैं,
“मैंने कई घरों में देखा है कि सोफा, पर्दे, बेडस्प्रेड और तौलिये तक काले या गहरे कॉफी रंग के होते हैं। ऐसे गहरे रंग घर के माहौल, खासकर बेडरूम के मूड को प्रभावित करते हैं।”
नींद पर पड़ रहा असर
विशेषज्ञों के अनुसार इस जीवनशैली का सबसे बड़ा नुकसान नींद को हो रहा है—उसकी अवधि और गुणवत्ता दोनों को। 2008 से हर साल 13 मार्च को World Sleep Day मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य नींद के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। 2026 का विषय था “Sleep Well, Live Better”।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म LocalCircles के एक सर्वे के अनुसार, पिछले 12 महीनों में 46 प्रतिशत भारतीयों को छह घंटे से कम लगातार नींद मिली। 2025 में यह आंकड़ा 59 प्रतिशत था। हालांकि कमी आई है, लेकिन 46 प्रतिशत भी चिंताजनक माना जा रहा है।
चेन्नई के SIMS Hospital में ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. कार्तिक माधेश रत्नवेलु कहते हैं “सात घंटे से कम या नौ घंटे से अधिक नींद स्वस्थ नहीं मानी जाती।”
नींद के चरण और मोबाइल का असर
चेन्नई के SRM Prime Hospital के डॉ. अरुलालन मथियालगन बताते हैं कि नींद कई चरणों में होती है।
N1 चरण – यह शुरुआती चरण है, जिसमें मांसपेशियाँ ढीली होने लगती हैं और व्यक्ति आंशिक रूप से जाग्रत रहता है।
N2 चरण – इसमें शरीर गहरी नींद की ओर बढ़ता है, जबकि सांस और दिल की धड़कन सामान्य रहती है।
गहरी नींद – इस चरण में शरीर की मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्रक्रियाएँ होती हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, अगर सोने से पहले मोबाइल का अधिक इस्तेमाल हो, तो दिमाग इन चरणों में आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता। इससे नींद आने में देर लगती है, नींद की अवधि कम हो जाती है और दिन में काम करने की क्षमता भी घट जाती है।
नींद की कमी के खतरे
नींद वह समय है जब शरीर खुद को “रीस्टार्ट” करता है। इसी दौरान घाव भरते हैं, शरीर की मरम्मत होती है और हार्मोन संतुलित होते हैं। यदि नींद कम हो जाए तो प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, थकान, चिड़चिड़ापन और काम करने की क्षमता में कमी आ सकती है। लंबे समय में इससे मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।
डॉ. रत्नवेलु कहते हैं, “स्मार्टफोन बीमारी नहीं, बल्कि नींद चुराने वाला सबसे बड़ा कारण बन गया है। चेन्नई की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. वंधना तो इसे और भी कड़े शब्दों में कहती हैं “अगर कभी टीवी को ‘इडियट बॉक्स’ कहा जाता था, तो स्मार्टफोन को मैं ‘किलिंग बॉक्स’ कहूँगी।”
चिंता और ओवरथिंकिंग भी कारण
नींद की समस्या केवल मोबाइल या काम की वजह से ही नहीं होती। मानसिक तनाव भी बड़ा कारण है।
मनोवैज्ञानिक अक्षया ज्ञानाश्री के अनुसार “रात में लोग अक्सर अपने जीवन की समस्याओं के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं। यह सोच उत्पादक नहीं होती, बल्कि चिंता और तनाव बढ़ाती है। उनके अनुसार, नींद का संबंध भावनात्मक सुरक्षा की भावना से भी होता है। इसलिए कई लोग किसी के साथ सोना पसंद करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें आराम और सुरक्षा महसूस होती है।
‘स्लीप डिवोर्स’ का चलन
हाल के वर्षों में एक नया शब्द चर्चा में आया है—स्लीप डिवोर्स। इसका मतलब है कि बेहतर नींद के लिए दंपति अलग-अलग बिस्तर या कमरों में सोना चुनते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इससे बेहतर नींद मिलती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। हालांकि अधिकतर मामलों में यह व्यवस्था अस्थायी होती है और बाद में दंपति फिर से साथ सोने लगते हैं।
नींद की स्वच्छता का महत्व
डॉक्टरों का कहना है कि अच्छी नींद के लिए स्लीप हाइजीन यानी सोने से जुड़ी स्वस्थ आदतें जरूरी हैं। चेन्नई के Lung Clinix Pulmonology Centre के डॉ. कौशिक मुथु राजा मथिवानन सलाह देते हैं कि बिस्तर का इस्तेमाल केवल सोने के लिए होना चाहिए। यहाँ तक कि बिस्तर पर किताब पढ़ने से भी बचना चाहिए, क्योंकि दिमाग को बिस्तर को सिर्फ नींद से जोड़ना चाहिए।”
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि बेडरूम में हल्के रंग, गर्म रोशनी, सुखद सुगंध, धीमा संगीत और 24 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान अच्छा माहौल बनाते हैं।
पुराने रूटीन की वापसी
डॉक्टर मथियालगन कहते हैं कि बचपन में सोने से पहले कहानी सुनना या परिवार से हल्की-फुल्की बातें करना आम था। इससे दिमाग शांत होता था और नींद जल्दी आती थी। वे सलाह देते हैं कि रात के खाने के बाद थोड़ी देर टहलें, परिवार से दिन भर की बातें करें और सोने से पहले काम से जुड़े विचारों को दूर रखें।
बदलाव की कोशिश
कुछ लोग अब फिर से स्वस्थ नींद की आदतें अपनाने लगे हैं। 23 वर्षीय पेशेवर स्वीथा एस. कहती हैं कि उन्होंने तय किया है कि बिस्तर पर काम, पढ़ाई या शो नहीं देखेंगी। सोने से पहले संगीत सुनती हैं और इससे उन्हें रोज़ आठ घंटे की नींद मिल जाती है।लेकिन बहुत से लोग अभी भी खोई हुई नींद को याद करते हुए William Wordsworth की पंक्तियों जैसा अनुभव करते हैं प्रकृति की हर शांत आवाज़ को याद करते हुए भी रात भर जागते रहना। विडंबना यह है कि काम के बाद आराम पाने और सोने के लिए हम स्क्रीन की ओर जाते हैं और अक्सर खुद को और अधिक जागता हुआ पाते हैं।

