
क्या TMC बागियों के मुकदमों को धोने के लिए फिर चालू हुई सियासत की 'वाशिंग मशीन'?
TMC के इस बिखराव ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर "वाशिंग मशीन थ्योरी" को जिंदा कर दिया है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का सीधा आरोप है कि ममता का साथ छोड़ने वाले इन तमाम नेताओं का अतीत बेहद विवादित और घोटालों से भरा रहा है।
पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल होने के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसकी कल्पना भारतीय राजनीति में किसी ने नहीं की थी। महज एक महीने के भीतर, जो पार्टी कभी बंगाल की निर्विवाद राजा थी, वह इस कदर बिखर चुकी है कि पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अपने ही घर में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं। संकट सिर्फ कोलकाता की विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह दिल्ली में संसद के गलियारों तक पहुंच चुका है।
पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा के दो-तिहाई से अधिक निर्वाचित विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए अपना अलग गुट बना लिया। इसके ठीक बाद, पार्टी के कई लोकसभा और राज्यसभा सांसदों ने भी उसी बागी रास्ते को चुन लिया है। सोमवार (8 जून) को जब ममता और अभिषेक दिल्ली में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) ब्लॉक की एक बेहद अहम बैठक में शामिल हो रहे थे, ठीक उसी वक्त उनकी पार्टी के कई बागी सांसद नई दिल्ली में एक केंद्रीय मंत्री और एक असंतुष्ट सांसद के आवास पर पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुवेंदु अधिकारी से सीक्रेट मीटिंग कर रहे थे।
विद्रोह का चेहरा: कौन हैं टीएमसी के टॉप बागी?
इस समय टीएमसी के भीतर दो समानांतर विद्रोह चल रहे हैं—एक कोलकाता की विधानसभा में और दूसरा दिल्ली की संसद में। इन दोनों गुटों में टीएमसी के सबसे बड़े और सबसे पुराने चेहरे शामिल हैं:
ऋतब्रत बनर्जी: विधानसभा में विपक्ष के नए नेता बनकर उभरे हैं, जिन्हें पार्टी ने बगावत के तुरंत बाद निष्कासित कर दिया था।
जावेद खान: कस्वा से चार बार के विधायक और अब बागी गुट में उपनेता।
चंद्रनाथ सिन्हा: बोलपुर से चार बार के विधायक और ममता सरकार के पूर्व मंत्री।
रतीन घोष: मध्यमग्राम के अनुभवी विधायक और पूर्व मंत्री।
काकोली घोष दस्तिदार: लोकसभा में बागी सांसदों के गुट की मुख्य रणनीतिकार और नेता।
शताब्दी रॉय: बीरभूम से चार बार की लोकसभा सांसद और जानी-मानी अभिनेत्री।
प्रसून बनर्जी: हावड़ा के सांसद और पूर्व राष्ट्रीय फुटबॉलर।
अरूप चक्रवर्ती: तालडांगरा से लोकसभा सांसद।
सुखेंदु शेखर राय: राज्यसभा में 15 साल तक टीएमसी की बुलंद आवाज रहे वरिष्ठ नेता।
सुष्मिता देव: असम के कद्दावर दिवंगत नेता संतोष मोहन देव की बेटी और राज्यसभा सांसद।
हालांकि, इन दोनों बागी गुटों ने अभी तक आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता नहीं ली है, लेकिन लोकसभा में इनका धड़ा केंद्र सरकार यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बिना शर्त समर्थन देने के लिए आवेदन कर चुका है।
24 घंटे में दो बड़े राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे
पार्टी के संसदीय दल को सबसे बड़ा झटका इस हफ्ते तब लगा जब दो वरिष्ठ राज्यसभा सांसदों ने संसद से इस्तीफा दे दिया। ममता बनर्जी के सबसे वफादार साथियों में शुमार रहे सुखेंदु शेखर राय ने सोमवार को संसद और पार्टी को अलविदा कह दिया। उन्होंने यहां तक संकेत दिए कि वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। इसके ठीक दो दिन बाद, बुधवार (10 जून) को सुष्मिता देव ने भी राज्यसभा के सभापति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। सुष्मिता के इस्तीफे के तुरंत बाद उनकी असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ एक मुस्कुराती हुई तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जिसने यह साफ कर दिया कि उनका अगला ठिकाना कौन सा होने वाला है।
चर्चा में 'वाशिंग मशीन' थ्योरी: दागियों का पाला बदल खेल
टीएमसी के इस महा-बिखराव ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर "वाशिंग मशीन थ्योरी" को जिंदा कर दिया है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का सीधा आरोप है कि टीएमसी छोड़ने वाले इन तमाम नेताओं का अतीत बेहद विवादित और घोटालों से भरा रहा है। केंद्रीय एजेंसियों (ED और CBI) के शिकंजे से बचने और अपने दाग धोने के लिए ये नेता ममता का साथ छोड़कर बीजेपी नीत एनडीए के खेमे में शरण ले रहे हैं। आइए डालते हैं इन नेताओं के दागदार इतिहास पर एक नजर:
1. ऋतब्रत बनर्जी (बलात्कार और आपराधिक धमकी के आरोप): टीएमसी से निकाले गए ऋतब्रत बनर्जी पर बलात्कार, महिला की लज्जा भंग करने, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी देने जैसे कई गंभीर मामले अदालतों में लंबित हैं। सीपीआई(एम) से निकाले जाने के बाद वे 2020 में टीएमसी में आए थे और अब ममता उन्हें गद्दार कह रही हैं।
2. चंद्रनाथ सिन्हा (शिक्षक भर्ती घोटाला): बोलपुर के इस कद्दावर नेता पर बंगाल के प्राथमिक शिक्षक भर्ती घोटाले में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इसी साल प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत सिन्हा और उनके परिवार की करीब 3.65 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की थी। 2024 में ईडी ने उनके घर से 40 लाख रुपये नकद भी बरामद किए थे।
3. जावेद खान (चुनावी हिंसा का मामला): कसबा से चार बार के विधायक जावेद खान पर 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद तिलजला-प्रगति मैदान इलाके में हिंसा भड़काने का आरोप है। इस मामले में उनके खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज है और वे अलीपुर कोर्ट से जमानत पर बाहर हैं।
4. रतीन घोष (नगर निकाय भर्ती घोटाला): उत्तर 24 परगना के मध्यमग्राम से आने वाले रतीन घोष पर बंगाल के बहुचर्चित नगर पालिका (मुनिसिपल) भर्ती घोटाले में शामिल होने के आरोप हैं और ईडी उनके खिलाफ गहन जांच कर रही है।
संसदीय दल के बागियों का भी है काला अतीत:
काकोली घोष दस्तिदार: बागी सांसदों की नेता काकोली घोष दस्तिदार 2016 के बहुचर्चित 'नारद स्टिंग ऑपरेशन' (रिश्वत कांड) की मुख्य आरोपियों में से एक हैं। इसके अलावा उन पर लोक सेवकों को रोकने और दंगा भड़काने की साजिश के मुकदमे दर्ज हैं।
शताब्दी रॉय: बीरभूम की इस सांसद का नाम 2010 के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल को हिलाकर रख देने वाले 'शारदा चिटफंड घोटाले' की जांच में सामने आया था। अब बागी होकर वे कह रही हैं कि टीएमसी भ्रष्टाचार से भरी पड़ी है।
प्रसून बनर्जी: हावड़ा के सांसद और पूर्व फुटबॉलर भी नारद स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर पैसे लेते हुए पाए गए थे और केंद्रीय एजेंसियां उनकी जांच कर रही हैं।
बापी हलदार: मथुरापुर से सांसद बापी हलदार पर पंचायत फंड की हेराफेरी और वित्तीय अनियमितताओं का मुकदमा दर्ज है।
अरूप चक्रवर्ती: तालडांगरा के सांसद अरूप चक्रवर्ती 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार-हत्याकांड के बाद आंदोलनकारी डॉक्टरों को जनता के गुस्से की धमकी देने के कारण पूरे देश में विवादों में घिरे थे।
क्या बंगाल बीजेपी में सब कुछ ठीक है?
दिलचस्प बात यह है कि टीएमसी के इन दागदार नेताओं के बीजेपी खेमे की तरफ जाने से खुद बंगाल बीजेपी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। बैरकपुर से पूर्व सांसद और वर्तमान केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह के साथ पांच बीजेपी विधायकों ने पुलिस से संपर्क कर टीएमसी से बागी हुए सांसद पार्थ भौमिक की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है। भौमिक पर 2021 के चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप है। यह घटना साफ दिखाती है कि बीजेपी की राज्य इकाई टीएमसी के इन 'विवादित' चेहरों का स्वागत करने के हक में पूरी तरह से नहीं है। खुद शुवेंदु अधिकारी, जो इस समय बागियों के सूत्रधार बने हुए हैं, 2020 में टीएमसी छोड़ने से पहले नारद घोटाले के आरोपी रह चुके हैं।
वजूद की लड़ाई
तृणमूल कांग्रेस के इस बिखराव से यह साफ है कि सत्ता जाते ही वैचारिक निष्ठा और पार्टी के प्रति वफादारी पूरी तरह गायब हो चुकी है। केंद्रीय जांच एजेंसियों के डर और सत्ता की मलाई चाटने की ललक ने ममता बनर्जी के 26 साल पुराने किले को ध्वस्त कर दिया है। अब देखना यह है कि क्या ममता बनर्जी इस बिखराव के बाद खुद को दोबारा खड़ा कर पाएंगी, या फिर 'वाशिंग मशीन' की यह राजनीति पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस का नामोनिशान ही मिटा देगी।

