
2029 की राह 2026 से तय होगी, BJP बनाम INDIA की बड़ी लड़ाई
2026 के विधानसभा चुनाव BJP और INDIA गठबंधन दोनों के लिए निर्णायक होंगे। यही नतीजे 2029 तक देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे।
बीता हुआ वर्ष स्पष्ट रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नाम रहा, लेकिन क्या नए साल में विपक्ष सत्ता के संतुलन को बदल पाएगा? वर्ष 2026 दोनों पक्षों के लिए चुनौतियों से भरा है, जो सैद्धांतिक रूप से भले ही बराबर दिखाई दें, लेकिन इनसे निपटने का तरीका यह तय करेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के लिए 2029 तक का सफर आसान रहेगा या मुश्किलों से भरा।
2026 की शुरुआत के महज़ तीन महीने बाद ही भाजपा को विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन के विभिन्न घटकों के साथ बड़े और निर्णायक चुनावी मुकाबलों का सामना करना होगा। तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होने वाले ये चुनाव बेहद अहम माने जा रहे हैं।
दक्षिण और पूर्व की चुनौती
तमिलनाडु और केरल भाजपा के लिए दक्षिणी मोर्चे पर अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अपार संसाधनों के बावजूद भाजपा यहां स्थायी और निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर पाई है, सिवाय कुछ अस्थायी और सीमित जीतों के। वहीं पश्चिम बंगाल में पार्टी का विस्तार एक जारी परियोजना जैसा है, जहां पिछले एक दशक में भाजपा का प्रभाव बढ़ा भी है और घटा भी, लेकिन हर कदम पर उसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से कड़ा मुकाबला मिला है।
असम, जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, एक दशक पहले भाजपा के हाथों चला गया। इसके बाद वहां की राजनीति तेजी से ध्रुवीकृत हुई और कांग्रेस तथा छोटे क्षेत्रीय दल अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करते नजर आए।
2026 के चुनाव और 2029 की राह
मार्च से मई के बीच होने वाले ये विधानसभा चुनाव सिर्फ राज्य सरकारों का भविष्य तय नहीं करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक के राजनीतिक माहौल की दिशा भी तय करेंगे। 2027 में सात और 2028 में नौ राज्यों में चुनाव होने हैं, ऐसे में 2026 का परिणाम बेहद निर्णायक साबित हो सकता है।
विपक्ष के लिए ये चुनाव केवल कुछ राज्यों में जीत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह साबित करने का मौका हैं कि INDIA गठबंधन आंतरिक मतभेदों और अस्थिरता के बावजूद भाजपा के खिलाफ एक विश्वसनीय विकल्प बन सकता है। विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी अब तक साझा राजनीतिक कथा और समन्वित चुनावी रणनीति का अभाव रही है। क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं, अहंकार, एक-दूसरे पर अविश्वास और वोट बैंक की प्रतिस्पर्धा बार-बार एकता के रास्ते में बाधा बनी हैं।
तमिलनाडु में कांग्रेस की दुविधा
कांग्रेस, जो INDIA गठबंधन की धुरी मानी जाती है, तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की डीएमके के साथ मजबूत और स्थिर गठबंधन में है। डीएमके को भरोसा है कि वह लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटेगी। हालांकि कांग्रेस के कुछ युवा नेता, जो डीएमके के वोटों के सहारे जीते हैं और राहुल गांधी से अपनी नजदीकी का दावा करते हैं, पार्टी नेतृत्व को अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) से गठबंधन की सलाह दे रहे हैं।
तमिलनाडु के कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि डीएमके को छोड़कर TVK की ओर झुकाव आत्मघाती होगा। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को चेताया है कि चुनाव से ठीक पहले डीएमके से रिश्ते तोड़ना भारी नुकसान पहुंचा सकता है। फिलहाल हाईकमान ने इसी सलाह को स्वीकार किया है।
बंगाल में बदले समीकरण?
जहां तमिलनाडु में यथास्थिति बनाए रखने की बात हो रही है, वहीं बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर “शांत बैकचैनल बातचीत” चल रही है। दो साल पहले तक यह असंभव माना जा रहा था, लेकिन अब भाजपा के आक्रामक अभियान और बदलती जमीनी परिस्थितियों के कारण दोनों पक्षों में पुनर्विचार हो रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर मुस्लिम वोट बैंक में संभावित सेंध और भाजपा के अपने समर्थक समुदायों में चुनौतियों के चलते ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ फिर से गठबंधन पर खुले मन से सोच रही हैं। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि ऐसा गठबंधन सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन को मजबूती देगा।
कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियां
2026 में विपक्ष की चुनौती सिर्फ चुनावी नहीं है। खासकर कांग्रेस पार्टी को संगठनात्मक, वैचारिक और नेतृत्व से जुड़े कई संकटों का सामना करना पड़ रहा है। 5 जनवरी से कांग्रेस देशभर में मनरेगा को खत्म करने और उसकी जगह नए कानून लाने के खिलाफ आंदोलन शुरू कर रही है। यह मुद्दा विपक्ष को भाजपा के खिलाफ एक मजबूत जनआंदोलन खड़ा करने का अवसर देता है।
हालांकि कांग्रेस के भीतर यह भी चिंता है कि अगर संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत नहीं किया गया, तो यह आंदोलन केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगा। पार्टी के भीतर अनुशासन की कमी, नेताओं का पलायन और वरिष्ठ नेताओं की सार्वजनिक नाराजगी कांग्रेस को कमजोर कर रही है।
2026: विपक्ष के लिए अवसर या चूक?
तमिलनाडु, बंगाल और केरल में भाजपा के लिए राह आसान नहीं है। 2026 के उत्तरार्ध में बड़े चुनाव नहीं होने से विपक्ष को खुद को संगठित करने का समय मिलेगा। आर्थिक चिंताएं, संघवाद के सवाल और सामाजिक तनाव विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं, बशर्ते INDIA गठबंधन अस्थायी समझौतों से आगे बढ़े।
जनगणना और आगे की राजनीति
इस वर्ष करीब पांच साल की देरी के बाद जनगणना भी होगी, जिसमें पहली बार जातिगत गणना शामिल होगी। इसके बाद परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े और विवादास्पद राजनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं। भाजपा इन प्रक्रियाओं को अपने पक्ष में मोड़ने की पूरी कोशिश करेगी, लेकिन इससे पैदा होने वाले राजनीतिक झटके उसे पूरी तरह अछूता भी नहीं छोड़ेंगे।
अंततः, जैसा कि बंगाल के एक वरिष्ठ राज्यसभा सांसद ने कहा, चुनौती सिर्फ चुनावी गणित की नहीं, बल्कि राजनीतिक कल्पनाशीलता की है। विपक्ष अगर इसे साध पाया, तो 2026 उसके लिए एक नई शुरुआत साबित हो सकता है।

