
चलती ट्रेन से कूदा स्विगी डिलीवरी बॉय, क्या गिग वर्कर्स मशीन बनते जा रहे हैं? AI with Sanket
गिग वर्कर्स इंस्टेंट डिलीवरी को संभव बनाते हैं, लेकिन अनंतपुर रेलवे स्टेशन पर एक स्विगी पार्टनर के गिरने से सुरक्षा, वेतन और जवाबदेही पर सवाल उठते हैं।
ऑनलाइन फूड डिलीवरी से लेकर आखिरी मील की आवाजाही तक गिग वर्कर्स आज भारत की शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। लेकिन तेज रफ्तार और सुविधा के इस मॉडल की एक बड़ी मानवीय कीमत भी सामने आ रही है। आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में सामने आए एक वायरल वीडियो ने इसी सच्चाई को उजागर किया है, जिसमें एक डिलीवरी वर्कर खाना पहुंचाने के लिए चलती ट्रेन से कूदता दिखाई दिया। इस घटना को लेकर हुई एक विस्तृत पैनल चर्चा में इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) के राष्ट्रीय महासचिव शेख सलाहुद्दीन, ब्रांड विशेषज्ञ दिलीप चेरियन और समाजशास्त्री व श्रम अधिकार कार्यकर्ता डॉ. आकृति भाटिया ने गिग वर्कर्स पर बढ़ते दबाव, जोखिम और जवाबदेही की कमी पर गंभीर सवाल उठाए।
अनंतपुर की घटना
अनंतपुर से सामने आए वीडियो में एक स्विगी डिलीवरी पार्टनर ट्रेन के चलने के दौरान उतरता दिखा, ताकि ट्रेन में बैठे यात्री को खाना सौंप सके। हालांकि, इस घटना में उसे गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन इसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि डिलीवरी की रफ्तार आखिर किन हालात में हासिल की जा रही है। पैनल में शामिल वक्ताओं का कहना था कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि ऐप-बेस्ड डिलीवरी सिस्टम में छिपे गहरे दबावों का नतीजा है।
‘इंसान नहीं, मशीन की तरह ट्रीट’
IFAT के शेख सलाहुद्दीन ने कहा कि ऐसे जोखिम अब अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की हकीकत बन चुके हैं। खासकर रेलवे स्टेशनों जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में डिलीवरी वर्कर्स से मशीनों की तरह काम की उम्मीद की जाती है। उन्होंने बताया कि डिलीवरी पार्टनर्स को स्टेशन परिसर में वाहन पार्क करना, प्लेटफॉर्म टिकट खरीदना, फुटओवर ब्रिज पार करना और कुछ ही मिनटों में अलग-अलग कोचों में कई ऑर्डर पहुंचाने होते हैं। ट्रेन छूटने, देरी होने या खाना खराब होने पर सीधे उनकी कमाई से जुर्माना काट लिया जाता है। उनका कहना था कि ट्रेन के 5–6 मिनट के ठहराव में डिलीवरी की समय-सीमा तय करना अव्यवहारिक है, लेकिन इस बात को बार-बार उठाने के बावजूद कंपनियों की ओर से कोई ठोस बातचीत नहीं होती।
सामूहिक बातचीत का अभाव
सलाहुद्दीन ने यह भी कहा कि गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों के बीच किसी तरह की संरचित बातचीत की व्यवस्था नहीं है। यूनियन लंबे समय से सरकार, कंपनियों और वर्कर्स के बीच त्रिपक्षीय संवाद की मांग कर रही है, लेकिन कंपनियां इससे बचती रही हैं। इसका नतीजा यह है कि वेतन, जुर्माने और काम की शर्तों में एकतरफा बदलाव होते हैं, जिनका विरोध करने का वर्कर्स के पास कोई मंच नहीं होता।
ब्रांड विशेषज्ञ दिलीप चेरियन ने बहस को रेलवे से हटाकर डिलीवरी ऐप्स के बिज़नेस मॉडल पर केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि असली समस्या उन एल्गोरिदम में है, जो जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर असंभव समय-सीमाएं तय करते हैं। उनका सुझाव था कि अगर ट्रेन में फूड डिलीवरी जैसी सेवाएं जारी रखनी हैं तो इन्हें केवल लंबे ठहराव वाले स्टेशनों तक सीमित किया जाए और डिलीवरी वर्कर्स को विशेष पास दिए जाएं। चेरियन के मुताबिक, असली जिम्मेदारी उन कंपनियों की है, जो इन सेवाओं को डिजाइन और प्रमोट करती हैं।
‘लचीलापन’ सिर्फ एक भ्रम
डॉ. आकृति भाटिया ने गिग वर्क को ‘लचीला’ कहे जाने पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि दुर्घटना या गिरने के बाद कई वर्कर्स सबसे पहले यह देखते हैं कि खाना सुरक्षित है या नहीं, क्योंकि खराब ऑर्डर पर जुर्माना या आईडी बंद होने का खतरा रहता है। उनका कहना था कि कंपनियां खुद को वर्कर्स का ‘पार्टनर’ बताती हैं, लेकिन वेतन, काम का आवंटन, रेटिंग और सज़ा सब कुछ कंपनी के हाथ में होता है। यह व्यवस्था लचीलापन नहीं, बल्कि दबाव भरा श्रम मॉडल है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और भारत की राह
डॉ. भाटिया ने बताया कि मेक्सिको और कोलंबिया जैसे देश गिग वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा देने और मुनाफे में हिस्सेदारी जैसी मांगों की ओर बढ़ रहे हैं। उनका कहना था कि असली साझेदारी तभी मानी जाएगी, जब मुनाफा भी साझा हो।
जमीनी सच्चाई
पैनल में इस बात पर भी चर्चा हुई कि कंपनियां वर्कर्स के असंतोष को सुलझाने के बजाय सेलिब्रिटी प्रचार और इन्फ्लुएंसर कैंपेन पर ज़ोर देती हैं। सवाल उठाया गया कि जब कंपनियां हड़ताल या प्रमोशनल ऑफर के दौरान ज्यादा भुगतान कर सकती हैं, तो वही भुगतान स्थायी क्यों नहीं किया जाता।
राजनीति की एंट्री
सलाहुद्दीन ने कहा कि अब गिग वर्कर्स एक बड़ा वोट बैंक बनते जा रहे हैं, इसलिए राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर ध्यान देने लगे हैं। कई राज्यों जैसे कर्नाटक, राजस्थान, झारखंड, बिहार और तेलंगाना में प्लेटफॉर्म वर्कर्स से जुड़े कानून बनाए जा चुके हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अब भी ठोस श्रम अधिकारों की कमी है।
10 मिनट डिलीवरी मॉडल पर सवाल
चर्चा के अंत में सलाहुद्दीन ने 10 मिनट डिलीवरी जैसे मॉडलों को खत्म करने की मांग की और कहा कि ये वर्कर्स के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। उन्होंने श्रम मंत्रालय, अदालतों और मानवाधिकार संस्थाओं से हस्तक्षेप की अपील की। डॉ. भाटिया ने ‘पैगाम’ रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 10,000 ऐप-बेस्ड वर्कर्स पर किए गए सर्वे में लगभग आधे लोगों ने हिंसा झेलने की बात कही, 99 फीसदी से ज्यादा ने मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं बताईं और ज्यादातर की मासिक आय 10 हजार रुपये से कम थी। कई वर्कर्स हफ्ते में एक दिन की छुट्टी भी नहीं ले पाते।

