
EXCLUSIVE: गिग वर्कर्स रोबोट नहीं, शोषण होना चाहिए बंद- सांसद राघव चड्ढा
राघव चड्ढा का कहना है कि गिग वर्कर्स मनुष्य हैं, रोबोट नहीं। उनकी गरिमा, सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सरकारी कदम, प्लेटफ़ॉर्म नियम और समाज की जागरूकता मिलकर गिग वर्कर्स के जीवन में सुधार ला सकते हैं।
द फेडरल ने आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा से बातचीत की, जिन्होंने भारत के गिग वर्कर्स के सामने आने वाली चुनौतियों, 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को लेकर विवाद और सरकार द्वारा हाल ही में प्लेटफ़ॉर्म वर्क को रेगुलेट करने के कदमों पर चर्चा की। चड्ढा ने खुद डिलीवरी राइडर के रूप में काम करने का अनुभव साझा करते हुए बताया कि गिग वर्कर्स के लिए गरिमा, सुरक्षा और सामाजिक सिक्योरिटी जरूरी है।
राघव चड्ढा ने कहा कि जो मुद्दे मैं उठाता हूं, वे आमतौर पर मेरे रोजमर्रा के अनुभवों से आते हैं। एक सांसद के तौर पर मैं किसानों से लेकर उद्योगपतियों तक और गिग वर्कर्स तक हर किसी से मिलता हूं। उनके जीवन की चुनौतियां मेरे सामने आती हैं। यही वजह है कि मैंने गिग वर्कर्स के अधिकारों की आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि गिग वर्कर्स रोबोट नहीं हैं। उनका शोषण बंद होना चाहिए। चड्ढा खुद चार्टर्ड अकाउंटेंट और स्टार्टअप्स के समर्थक हैं और वे व्यवसाय विरोधी नहीं, बल्कि शोषण विरोधी हैं।
डिलीवरी राइडर की जिंदगी
चड्ढा ने बताया कि गिग वर्क सिस्टम को केवल ऊपर से देखकर समझा नहीं जा सकता। उन्होंने Blinkit के एक राइडर के साथ शाम 6 बजे से सुबह 2 बजे तक पैकेज डिलीवरी की। इस अनुभव से मैं समझ पाया कि 15-16 घंटे की डिलीवरी में शारीरिक और मानसिक तनाव कितना अधिक होता है। इस अनुभव के बाद मैंने गिग वर्कर्स के लिए अपने मुख्य मांगों को और जोर से उठाया।
सरकार ने लिया ऐतिहासिक कदम
चड्ढा ने कहा कि केंद्र सरकार ने उनकी बात सुनी और गिग वर्कर्स के पक्ष में निर्णय लिया। यह फैसला 10 मिनट डिलीवरी की मजबूरी को खत्म करता है और गिग वर्कर्स के जीवन में सुधार की राह खोलता है।
कंपनियों का विरोध
राघव चड्ढा ने बताया कि जब उन्होंने गिग वर्कर्स के हक़ में आवाज उठाई तो कई प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों ने पर्सनल और सोशल मीडिया हमला किया। उनके परिवार तक को निशाना बनाया गया। लेकिन जब आप शक्तिशाली सिस्टम के खिलाफ खड़े होते हैं तो प्रतिक्रिया मिलती है। मैं इसे समझता हूँ और आगे बढ़ता हूं।
क्या बेहतर शर्तें व्यवसाय को नुकसान पहुंचाएंगी?
चड्ढा का कहना है कि गिग वर्कर्स की भलाई के लिए खर्च करना व्यवसाय को नहीं डुबाएगा। सरकार ने ड्राफ्ट सोशल सिक्योरिटी नियम तैयार किए हैं, जिसमें वर्कर रजिस्ट्रेशन, सोशल सिक्योरिटी वेलफेयर फंड का निर्माण और ग्रिवेंस उठाने के लिए वर्कर्स बोर्ड, इससे गिग वर्कर्स को सुरक्षा और राहत मिलेगी।
रिपोर्ट से सच्चाई
Paigam Foundation की रिपोर्ट में पाया गया कि 91% गिग वर्कर्स फुल-टाइम काम करते हैं। 86% 10 मिनट डिलीवरी का विरोध करते हैं। 99% को शारीरिक और 98% को मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। कमाई लगभग ₹20,000–22,000 महीना, जिसमें से ईएमआई, ईंधन और खर्चा निकालने के बाद बहुत कम शेष रहता है। चड्ढा कहते हैं कि इंस्टेंट डिलीवरी के लिए हम इनोवेटिव बिज़नेस मॉडल डिज़ाइन कर सकते हैं तो क्यों न वर्कर्स की सुरक्षा के लिए भी वित्तीय मॉडल बनाएं?
आंशिक जीत, लेकिन बड़ा बदलाव
गिग वर्कर्स अब लेबर कोड के तहत परिभाषित हैं और ड्राफ्ट सोशल सिक्योरिटी नियम जनता के परामर्श के लिए जारी हैं। 10 मिनट डिलीवरी की क्रूरता खत्म हो गई है, जिससे वर्कर्स को मानसिक और शारीरिक राहत मिलेगी।
लोकतंत्र की ताकत
चड्ढा कहते हैं कि अगर गिग वर्कर्स सामूहिक रूप से आवाज उठाएं तो सरकारों को सुनना पड़ेगा। यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति नहीं, बल्कि मानवीय कारणों से भी जरूरी है। उन्होंने कई राज्य सरकारों जैसे तेलंगाना का उदाहरण देते हुए कहा कि सकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। अगर सरकारें, प्लेटफ़ॉर्म कंपनियां, वर्कर्स एसोसिएशन्स और नीति निर्माता साथ काम करें तो गिग वर्कर्स के जीवन में वास्तविक सुधार संभव है।

