LPG की किल्लत: क्या युद्ध बुझा देगा आपकी रसोई का चूल्हा?
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LPG की किल्लत: क्या युद्ध बुझा देगा आपकी रसोई का चूल्हा?

दिल्ली में गैस सिलेंडरों के लिए मची अफरातफरी। 50% सप्लाई कटी, डिलीवरी बंद और कालाबाजारी का डर। रेस्टोरेंट उद्योग पर भी संकट। क्या केंद्र स्पष्ट करेगा स्थिति?


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LPG Crisis : इस वक्त देश की राजधानी दिल्ली की गलियों में एक अजीब सी बेचैनी है। यह बेचैनी किसी राजनीतिक उठापटक की नहीं, बल्कि उस बुनियादी जरूरत की है जिससे हर घर का पेट पलता है, जी हाँ रसोई गैस। इजराइल/अमेरिका और ईरान के बीच सुलगते युद्ध ने सात समंदर पार भारत की रसोई में संकट की आग जला दी है। दिल्ली के राजघाट, मिंटो रोड और अजमेरी गेट जैसे इलाकों में स्थित गैस गोदामों के बाहर जो मंजर है, वह किसी आपातकाल से कम नहीं है। सुबह की पहली किरण के साथ ही लोग खाली सिलेंडर लेकर कतारों में खड़े हो रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें मिल रही है तो सिर्फ 'उम्मीद' और 'अगले दिन आने की सलाह'।


दोपहर की तपिश और खाली सिलेंडरों का बोझ
दिल्ली के राजघाट स्थित एक गैस गोदाम के बाहर खड़ी भीड़ की आँखों में थकान और चेहरे पर लाचारी साफ देखी जा सकती है। यहाँ मौजूद लोग वे हैं जो अपनी मेहनत की कमाई से सिलेंडर की पर्ची तो कटवा चुके हैं, लेकिन सिलेंडर लेने के लिए उन्हें खुद 'कुली' बनना पड़ रहा है। अमूमन जो सिलेंडर डिलीवरी मैन घर पहुँचाते थे, अब उन्हें लेने के लिए लोगों को मीलों पैदल चलना पड़ रहा है।

वहाँ मौजूद राकेश नाम के एक उपभोक्ता ने बताया, "एजेंसी वाले कहते हैं कि जब तक यह युद्ध चल रहा है, होम डिलीवरी नहीं हो पाएगी। हमें खुद ही सेल्फ सर्विस करनी पड़ रही है।" राकेश की कहानी अकेले उनकी नहीं है, बल्कि वहां खड़े सैकड़ों लोगों की है। लोग बताते हैं कि ऑनलाइन बुकिंग में 10 से 12 दिनों से समस्या आ रही है। पोर्टल खुलते ही बंद हो जा रहा है और डिजिटल इंडिया का सपना इस समय गैस की किल्लत के आगे दम तोड़ता नजर आ रहा है।

50 प्रतिशत की कटौती: गोदामों में सन्नाटा, सड़कों पर शोर
गैस गोदाम के स्टोर इंचार्ज राजू ने जो आंकड़े साझा किए, वे चौंकाने वाले हैं। उन्होंने बताया कि पहले इस गोदाम में रोजाना दो गाड़ियां आती थीं, जिनमें लगभग 700 से ज्यादा सिलेंडर होते थे। लेकिन पिछले चार-पांच दिनों से सप्लाई में 50 प्रतिशत की सीधी कटौती कर दी गई है। अब दिन भर में केवल एक गाड़ी आ रही है, जिसमें 360 सिलेंडर होते हैं।

सुबह 7:00 बजे गाड़ी आती है और पलक झपकते ही सारा स्टॉक खत्म हो जाता है। जो लोग पीछे रह जाते हैं, उनके हिस्से में सिर्फ निराशा आती है। इंचार्ज ने बताया, "हमने कमर्शियल सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी है। छोटे सिलेंडर, प्लास्टिक सिलेंडर और नैनो कट की सप्लाई भी रोक दी गई है। हमारा पूरा ध्यान सिर्फ घरेलू ग्राहकों पर है, फिर भी हम मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं।"

डर के साये में डिलीवरी मैन: 'गाली और धमकी के बीच कैसे करें काम?'
इस संकट का एक और काला पहलू 'डिलीवरी मैन' का डर है। राजघाट के पास खड़ा छोटू, जो सालों से गैस सिलेंडर घरों तक पहुँचाता था, आज डरा हुआ है। छोटू और उसके साथियों ने मार्केट में सप्लाई पर जाने से साफ मना कर दिया है। इसके पीछे का कारण हैरान करने वाला है।

डिलीवरी बॉय चांद और अनवर ने बताया, "जब हम मोहल्लों में 10 सिलेंडर लेकर जाते हैं, तो वहां 50 लोग घेर लेते हैं। लोग जबरन सिलेंडर छीनने की कोशिश करते हैं। अगर हम मना करें तो गाली-गलौज और मारपीट पर उतारू हो जाते हैं।" जमा मस्जिद और आईटीओ जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में स्थिति और भी खराब है। लोग धमकी देते हैं कि 'सिलेंडर नहीं दिया तो मार देंगे'। इसी डर की वजह से डिलीवरी मैन ने एजेंसी से कह दिया है कि ग्राहक खुद गोदाम आकर अपना सिलेंडर ले जाएं।

रमजान और रोजेदारों की परीक्षा
दिल्ली के इन इलाकों में मुस्लिम आबादी काफी घनी है और फिलहाल रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। कड़ी धूप में रोजा रखकर लोग सिलेंडर के लिए भटक रहे हैं। मिंटो रोड की बनारस गैस एजेंसी पर अपनी बारी का इंतजार कर रही हमर बानो का दर्द छलका, उन्होंने कहा, "तीन-चार महीने से सिलेंडर के लिए परेशान हैं। अब कहते हैं कि सर्वर बंद है। रोजे की हालत में ₹100 किराया लगाकर यहाँ आए हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।" घर का चूल्हा कैसे जलेगा, यह सवाल उन हजारों महिलाओं के चेहरे पर लिखा है जो घंटों से कतार में खड़ी हैं। कइयों के घरों में गैस खत्म हो चुकी है और बाजार में मिलने वाले छोटे रिफिल सिलेंडरों की कालाबाजारी भी शुरू हो गई है।

नियमों की बेड़ियाँ: अब 30 दिन की वेटिंग अनिवार्य
एजेंसियों के बाहर चस्पा किए गए नोटिस इस संकट की गहराई को और बढ़ा रहे हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अब नए नियम लागू कर दिए गए हैं। अब आप पिछला सिलेंडर लेने के ठीक 30 दिन बाद ही अगली बुकिंग कर पाएंगे। पहले यह सीमा कम थी, जिससे लोगों को सहूलियत होती थी। होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट को मिलने वाली नीले रंग के कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई पर ताला लग गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्कूलों और आंगनबाड़ियों में बच्चों के लिए बनने वाले मिड-डे मील की गैस बुकिंग भी बंद कर दी गई है।

कैशियर की मजबूरी: 'हाथ बंधे हैं, सिस्टम फेल है'
उषा गैस एजेंसी के कैशियर दीपक ने बताया कि लोग उन पर दबाव बना रहे हैं, लेकिन उनके हाथ बंधे हैं। उन्होंने कहा, "आज सुबह से सर्वर नहीं चल रहा। लोग 15-20 दिन पहले की बुकिंग का स्टेटस पूछ रहे हैं, लेकिन सॉफ्टवेयर में बदलाव के कारण हम कुछ नहीं कर पा रहे। हम सिर्फ उन्हीं को पर्ची दे रहे हैं जिनकी बुकिंग कन्फर्म है।" डिलीवरी बॉयज द्वारा सप्लाई पर न जाने पर उन्होंने दुख जताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि पब्लिक का प्रेशर इतना ज्यादा है कि डिलीवरी मैन को काम करने नहीं दिया जा रहा। लोग डीएसी (DAC) नंबर लिखवाकर खुद गोदाम की ओर भाग रहे हैं।

रेस्टोरेंट उद्योग पर मंडराया खतरा: NRAI की चेतावनी
इस संकट की आंच केवल घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश का विशाल रेस्टोरेंट उद्योग भी इसकी चपेट में है। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के कोषाध्यक्ष मनप्रीत सिंह का कहना है कि सरकार की तरफ से कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई रोकने से उद्योग पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। इस संकट को देखते हुए संस्था ने पूरे भारत में अपने 5 लाख सदस्यों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं।

मनप्रीत सिंह ने बताया, "हमने सदस्यों को मेन्यू छोटा करने और इंडक्शन जैसे इलेक्ट्रिक उपकरणों को अपनाने का सुझाव दिया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आधिकारिक सप्लाई बंद है और कहीं से सिलेंडर मिल भी रहा है तो वह भारी ब्लैक (कालाबाजारी) में मिल रहा है।" NRAI ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी को पत्र लिखकर इस क्षेत्र को 'आवश्यक सेवा' घोषित करने की मांग की है, लेकिन दो दिन बीत जाने के बाद भी सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया है।

कालाबाजारी का जिन्न और प्रशासन की सुस्ती
जब भी किसी अनिवार्य वस्तु की कमी होती है, तो 'कालाबाजारी' का जिन्न बाहर निकल आता है। दिल्ली के कई इलाकों से खबरें आ रही हैं कि गैस की किल्लत का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्व सिलेंडरों को दोगुने दामों पर बेच रहे हैं। चूंकि आधिकारिक बुकिंग 30 दिन के वेटिंग पीरियड पर डाल दी गई है, इसलिए मजबूर उपभोक्ता ब्लैक में सिलेंडर खरीदने को विवश हो रहा है। प्रशासन को यहाँ सख्त कदम उठाने की जरूरत है। अगर समय रहते छापेमारी और सख्त निगरानी नहीं की गई, तो यह संकट माफियाओं की जेब भरने का जरिया बन जाएगा।

केंद्र सरकार की चुप्पी और जनता का उहापोह
इस पूरी अफरातफरी के बीच केंद्र सरकार का रुख बेहद सुस्त नजर आ रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से अब तक कोई ऐसा स्पष्ट बयान नहीं आया है जो जनता के मन में बैठे 'डर' को कम कर सके। युद्ध वैश्विक मुद्दा हो सकता है, लेकिन देश के भीतर संसाधनों का प्रबंधन करना सरकार की जिम्मेदारी है।

सरकार को जनता के सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उहापोह की यह स्थिति अफवाहों को जन्म दे रही है, जिससे लोग 'पैनिक बुकिंग' और 'जमाखोरी' कर रहे हैं। जब तक सरकार पारदर्शी तरीके से सप्लाई का रोडमैप साझा नहीं करेगी, तब तक यह अफरातफरी शांत नहीं होगी। जनता को यह जानने का हक है कि देश के पास एलपीजी का कितना बफर स्टॉक है और यह संकट कब तक खिंचेगा।

सरकार से तीखे सवाल
दिल्ली की सड़कों पर सिलेंडरों के साथ खड़े लोग केवल एक ईंधन का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि वे अपनी चुनी हुई सरकार से जवाबदेही मांग रहे हैं। युद्ध सात समंदर पार हो रहा है, लेकिन उसका खामियाजा दिल्ली का वह आम आदमी भुगत रहा है जो रोज कमाता और रोज खाता है।

सरकार से सीधे सवाल:

स्पष्टता कहाँ है? सरकार आधिकारिक बुलेटिन जारी कर जनता को स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर रही?

कालाबाजारी पर लगाम के लिया क्या उपाय?

मिड-डे मील का क्या? युद्ध का बहाना बनाकर बच्चों के निवाले पर संकट पैदा करना कहाँ तक जायज है?


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