चीन के मॉडल पर एक-दलीय शासन की तरफ बढ़ रहा है भारत: विनोद शर्मा
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'चीन के मॉडल पर एक-दलीय शासन की तरफ बढ़ रहा है भारत': विनोद शर्मा

कांग्रेस को अक्सर 'मुस्लिम पार्टी' होने का तमगा दिया जाता है। इस पर शर्मा ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 1984 में वाजपेयी जी ने सिखों के वोट के लिए खुलकर प्रचार किया था।


भारतीय राजनीति में इन दिनों एक अजीब सा खेल चल रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों का एक ऐसी पार्टी में विलय हो गया है, जिसके बारे में देश के आम लोगों ने शायद ही कभी सुना हो। इस पार्टी का नाम है 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI)। यह विलय केवल एक राजनीतिक उलटफेर नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे में लगी गहरी दीमक का एक बड़ा लक्षण है।

इस पूरे मुद्दे पर देश के सबसे अनुभवी राजनीतिक विश्लेषकों में से एक और 'हिंदुस्तान टाइम्स' के पॉलिटिकल एडिटर विनोद शर्मा ने खुलकर बात की है। उनका मानना है कि भारत का लोकतंत्र एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ से वह धीरे-धीरे चीन के 'सिंगल-पार्टी रूल' यानी एक-दलीय शासन व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है। आइए जानते हैं कि भारतीय राजनीति के इस मौजूदा संकट पर उनका क्या सोचना है।

क्या 'ग्रैंड रियूनियन' मुमकिन है?

आजकल राजनीतिक गलियारों में इस बात की बड़ी चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC), शरद पवार की एनसीपी और अन्य क्षेत्रीय दल एक बार फिर कांग्रेस के साथ मिलकर एक 'ग्रैंड रियूनियन' (बड़ा पुनर्मिलन) कर सकते हैं। जब विनोद शर्मा से पूछा गया कि क्या ऐसा होने वाला है, तो उन्होंने बहुत व्यावहारिक जवाब दिया।


शर्मा ने कहा, "यह विचार सुनने में बहुत अच्छा लगता है। राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि सभी अच्छे और कम-अच्छे लोगों को पार्टी की मदद के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन क्या यह वाकई जमीन पर मुमकिन है? मुझे इसमें संदेह है।" उन्होंने समझाया कि पिछले कुछ दशकों में क्षेत्रीय दलों ने अपने वोट बैंक को अपनी निजी जागीर (Fiefdom) समझ लिया है। उन्हें लगता है कि एक बड़ी पार्टी का हिस्सा बनने के बजाय अकेले रहना या स्वतंत्र रूप से मोलतोल करना उनके लिए ज्यादा फायदेमंद है। हालांकि, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) ने छोटे दलों को साथ जोड़कर केंद्र में बड़ी ताकत बनाई है, लेकिन विपक्ष के लिए ऐसा करना इतना आसान नहीं है।

वर्ष 2004 में जब यूपीए (UPA) का गठन हुआ था, तब स्थितियां अलग थीं। उस समय कांग्रेस के अलावा हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे मंझे हुए राजनेता सक्रिय थे, जो मुलायम सिंह यादव जैसे अड़ियल नेताओं को भी एक मंच पर ले आए। मुलायम सिंह अपनी अलग पहचान खोना नहीं चाहते थे, फिर भी वे सरकार का हिस्सा बने। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के पास इतनी राजनीतिक क्षमता, वजन और भरोसा बचा है कि वह इन सभी बिखरे हुए दलों को एक छतरी के नीचे ला सके?

राहुल गांधी की लीडरशिप और कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियां

राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी के कमजोर होने के बाद अब पूरे विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी को आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा। इस पर विनोद शर्मा कहते हैं कि यह आकलन समय से पहले है। कांग्रेस को सबसे पहले अपने घर को व्यवस्थित करना होगा।

हाल के दिनों में कांग्रेस ने कुछ अच्छे और समझदारी भरे कदम उठाए हैं। जैसे केरल और कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के सही हकदारों (जैसे डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया) को मौका दिया गया, न कि केवल राहुल गांधी के किसी करीबी को थोपा गया। इससे पार्टी के भीतर आंतरिक कलह शांत हुई। लेकिन परीक्षा इस बात की है कि क्या कांग्रेस हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में अपनी सरकारें बचा पाती है और चुनाव जीत पाती है।

राहुल गांधी के बारे में शर्मा का कहना है कि वे कांग्रेस के वास्तविक (De-facto) अध्यक्ष हैं। राजनीति में कागजी पद से ज्यादा जमीनी ताकत मायने रखती है। लेकिन राहुल गांधी की एक कमी यह है कि वे मुश्किल फैसलों का श्रेय या बदनामी खुद लेने के बजाय मल्लिकार्जुन खड़गे या अन्य नेताओं पर छोड़ देते हैं। सोनिया गांधी की ताकत यह थी कि वे सबको साथ लेकर चलती थीं। वे कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले सभी वरिष्ठ नेताओं से बात करती थीं, इसलिए उनके फैसलों को सब मानते थे। राहुल गांधी को नेता के रूप में अभी इस स्तर तक विकसित होना बाकी है। इसके अलावा, मुख्यधारा की मीडिया का कांग्रेस के प्रति रुख भी सहयोगात्मक नहीं है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी मीडिया ने बहुत बाद में इसे गंभीरता से लेना शुरू किया था।

शेल कंपनियां और अब 'शेल पार्टियां'

इस इंटरव्यू का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह था, जब विनोद शर्मा ने टीएमसी बागियों के विलय वाली पार्टी को 'शेल पार्टी' (Shell Party) कहा। उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में समझाया, "अब तक हमने शेल कंपनियों के बारे में सुना था, जहाँ लोग अपना काला धन या अवैध कमाई छुपा कर रखते हैं। अब देश में 'शेल पार्टियां' बन गई हैं, जहाँ बागी विधायकों या सांसदों को 'पार्क' (सुरक्षित रखना) किया जाता है।"

NCPI एक ऐसी पार्टी है जो चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड (पंजीकृत) तो है, लेकिन उसे मान्यता (Recognised) नहीं मिली है। यह केवल दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कानूनी पेचीदगियों से बचने और बीजेपी व एनडीए के करीब बने रहने का एक शॉर्टकट रास्ता है। विनोद शर्मा ने अफसोस जताते हुए कहा कि अपने 40 साल से ज्यादा के पत्रकारिता करियर में उन्होंने राजनीतिक नैतिकता को इतने निचले स्तर पर कभी नहीं देखा। आपातकाल (Emergency) के दौर में भी राजनीति में एक 'आँख की शर्म' होती थी, जो अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

कहाँ जा रहा है भारत का लोकतंत्र?

विनोड शर्मा का मानना है कि यह लड़ाई केवल 'कांग्रेस-मुक्त भारत' या 'विपक्ष-मुक्त भारत' की नहीं है। पूरा सिस्टम अब चीन के मॉडल यानी 'सिंगल-पार्टी रूल' की तरफ बढ़ रहा है। बीजेपी ने सत्ता में आते ही दावा किया था कि वह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनेगी, और आज कागजों पर वह है भी।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की हालत पर उन्होंने कहा कि जिस देश में स्वतंत्र मीडिया नहीं है, वहाँ लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। आज लोकतंत्र की परिभाषा को ही पलट दिया गया है। अगर आप सरकार की आलोचना करते हैं, तो आपको देशविरोधी या भारत को कमजोर करने वाला मान लिया जाता है। राजनीतिक दल खुद को ही 'राष्ट्र' समझने लगे हैं, ठीक वैसे ही जैसे कभी नारा दिया गया था 'इंदीरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा'। आज सत्ता की भूख और बदले की राजनीति की कोई सीमा नहीं रह गई है।

सेक्युलरिज्म और उत्तर प्रदेश का चुनावी समीकरण

कांग्रेस को अक्सर 'मुस्लिम पार्टी' होने का तमगा दिया जाता है। इस पर शर्मा ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 1984 में वाजपेयी जी ने सिखों के वोट के लिए खुलकर प्रचार किया था, भले ही उनकी पार्टी 2 सीटों पर सिमट गई, लेकिन उन्होंने देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बचाए रखा। भारत के मुस्लिम मतदाता हमेशा गैर-मुस्लिम सेक्युलर नेताओं (जैसे मुलायम सिंह, चंद्रशेखर) पर भरोसा करते आए हैं। लेकिन आज कांग्रेस इस मुद्दे पर बहुत रक्षात्मक (Defensive) हो जाती है और अपने मूल सिद्धांतों को भूल जाती है।

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों और सपा-कांग्रेस गठबंधन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के पास 'संविधान बचाने' का एक सटीक नारा था। बीजेपी के '400 पार' के नारे को विपक्ष ने जनता के अधिकार छीनने की साजिश के रूप में पेश किया और राहुल गांधी के हाथ में दिखनी वाली लाल किताब (संविधान) इसका प्रतीक बन गई।

चुनौती यह है कि क्या विपक्ष इस कहानी को आगे बढ़ा पाएगा। भारत का बहु-दलीय ढांचा (Multi-party structure) ही लोकतंत्र की जान है, क्योंकि यह जनता को विकल्प देता है। बीजेपी का इतिहास रहा है कि उसने हमेशा क्षेत्रीय दलों (जैसे जेडीयू, जेडीएस) का सहारा लिया और बाद में उन्हें ही कमजोर कर दिया।

चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका

विनोड शर्मा ने देश की संवैधानिक संस्थाओं, विशेषकर चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "इतिहास इस चुनाव आयोग को एक ऐसे संस्थान के रूप में याद रखेगा जिसने सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी को जिताने के लिए काम किया, न कि जनता को निष्पक्ष रूप से अपनी सरकार चुनने में मदद की। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।"

न्यायपालिका के बारे में उन्होंने कहा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट का एक शानदार इतिहास रहा है। इसी न्यायपालिका ने कभी इंदिरा गांधी को अयोग्य घोषित किया था और 'केशवानंद भारती' जैसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसने संविधान के मूल ढांचे की रक्षा की। लेकिन आज संस्थाएं अपने ही गौरवशाली इतिहास को भूलती जा रही हैं।

'माँ की रसोई' का सिद्धांत

इंटरव्यू के अंत में विनोद शर्मा ने विपक्ष और कांग्रेस को एक बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी दल को अपना वजूद किसी दूसरी पार्टी में मिलाना भी पड़े, तो देशहित में ऐसा करना चाहिए। बीजेपी देश में स्थायी बहुमत चाहती है और वह इस रास्ते पर काफी आगे बढ़ चुकी है।

उन्होंने कहा, "कांग्रेस के नेताओं को अपना दिल बड़ा करना होगा। उन्हें सभी को space (जगह) देनी होगी। कांग्रेस को एक 'माँ की रसोई' (Mother's Kitchen) की तरह काम करना होगा। रसोई में अगर कोई सदस्य कमजोर है और कोई मजबूत, तो माँ उन्हें काम अलग-अलग दे सकती है, लेकिन जब रात को खाने की मेज सजती है, तो माँ सभी को बराबर खाना परोसती है। विपक्ष को एकजुट रखने का यही एकमात्र रास्ता है।"

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