WTO में चीन की चाल फेल, भारत ने निवेश समझौते (IFD) का किया खुला विरोध
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WTO में चीन की चाल फेल, भारत ने निवेश समझौते (IFD) का किया खुला विरोध

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने WTO के 14वें सम्मेलन में चीन समर्थित IFD समझौते को नकारा। भारत ने कहा- संगठन के मूल सिद्धांतों और समानता से समझौता नहीं होगा।


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India's Diplomacy In WTO : विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर भारत ने एक बार फिर अपनी कूटनीतिक मजबूती का परिचय देते हुए चीन के नेतृत्व वाले निवेश समझौते का डटकर विरोध किया है। कैमरून के याउंडे में चल रहे 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) के दौरान, भारत ने स्पष्ट किया कि वह 'विकास हेतु निवेश सुविधा' (IFD) समझौते को पिछले दरवाजे से शामिल करने की अनुमति नहीं देगा। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने वैश्विक मंच पर दो टूक कहा कि इस तरह के समझौते WTO के मूलभूत सिद्धांतों और समानता के नियमों के खिलाफ हैं। भारत का यह कड़ा रुख ऐसे समय आया है जब संगठन के कई अन्य देश इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं।


संगठन के मूल सिद्धांतों पर गहराता संकट
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने संदेश में चेतावनी दी कि IFD समझौते को WTO के ढांचे में शामिल करने से संगठन की कार्यात्मक सीमाएं कमजोर होंगी। उनके अनुसार, WTO एक सर्वसम्मति आधारित निकाय है, जहां हर सदस्य देश की राय मायने रखती है। चीन द्वारा समर्थित यह प्रस्ताव संगठन के उस मूल ढांचे को चोट पहुँचाता है, जो सदस्य देशों के बीच बराबरी और पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। भारत ने जोर देकर कहा कि 166 सदस्यीय इस निकाय में किसी भी नए नियम को थोपना वैश्विक व्यापारिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।

विरोध की मुख्य वजह: 'एनेक्स 4' का पेंच
भारत के विरोध की सबसे बड़ी तकनीकी वजह IFD को WTO के नियमों में 'एनेक्स 4' (Annex 4) के तहत शामिल करने की कोशिश है। एनेक्स 4 में वे समझौते आते हैं जो सभी देशों पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं होते, बल्कि केवल उन्हीं पर लागू होते हैं जो उन्हें स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं। भारत का मानना है कि इस रास्ते से चीन जैसे देश WTO के बहुपक्षीय स्वरूप को बदलकर अपनी विशिष्ट व्यापारिक शर्तों को थोपना चाहते हैं। 2017 में चीन द्वारा शुरू किए गए इस प्रस्ताव का भारत 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भी कड़ा विरोध कर चुका है।

समानता और संतुलन के लिए एमएफएन नियम जरूरी
पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि वैश्विक व्यापार में 'सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र' (MFN) नियम और 'विशेष एवं अलग व्यवहार' (S&DT) जैसे सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण हैं। ये नियम सुनिश्चित करते हैं कि विकासशील और विकसित देशों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में एक संतुलन बना रहे। भारत का तर्क है कि सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रक्रिया ही WTO की असली ताकत है। यदि कुछ चुनिंदा देश मिलकर नए नियम बनाएंगे, तो इससे विकासशील देशों के हितों को नुकसान पहुँचना तय है।

सुधार के लिए तैयार, लेकिन शर्तों के साथ
भारत ने दुनिया के सामने अपना रुख साफ कर दिया है कि वह WTO में सुधारों के लिए बातचीत के पक्ष में है। हालांकि, भारत का कहना है कि किसी भी नए समझौते को लागू करने से पहले उसके प्रभाव, सुरक्षा और पारदर्शिता पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। 29 मार्च को समाप्त हो रहे इस चार दिवसीय सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि वह वैश्विक व्यापार प्रणाली में किसी भी देश के एकतरफा दबदबे को स्वीकार नहीं करेगा। भारत 1995 से इस संगठन का सदस्य है और हमेशा से ही सदस्य देशों के सामूहिक हितों की रक्षा के लिए खड़ा रहा है।


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