
RSS के सौ साल और विपक्ष की उलझन, क्या भारत एकतरफा राजनीति की ओर?
RSS के 100 साल, कमजोर विपक्ष और मजबूत हिंदुत्व के बीच भारत 2026 में खड़ा है। क्या लोकतंत्र संतुलन पाएगा या एकतरफा राजनीति और गहरी होगी?
साल 2025 भारत की राजनीति और समाज के लिए वैचारिक दृष्टि से बेहद अहम रहा। इस वर्ष राजनीतिक स्पेक्ट्रम के वाम और दक्षिण दोनों छोरों की दो प्रमुख विचारधाराओं ने अपने-अपने सौ साल पूरे किए। इन दोनों विचारधाराओं ने बीते एक शताब्दी में भारतीय समाज और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। इनमें से एक विचारधारा के आधार पर हुए सत्ता परिवर्तन के परिणाम भारत पिछले करीब एक दशक से देख रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या 2026 कुछ अलग संकेत देगा या फिर मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया और अधिक मजबूत होगी?
RSS के 100 साल और हिंदुत्व की राजनीति
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वैचारिक धुरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अक्टूबर 2025 में अपने 100 वर्ष पूरे किए। संघ की स्थापना के. बी. हेडगेवार ने इस उद्देश्य से की थी कि हिंदू समाज को संगठित किया जाए। हेडगेवार का मानना था कि हिंदुओं की आंतरिक असंगठितता ही सदियों तक विदेशी शासन का मुख्य कारण रही।
हेडगेवार के बाद संघ के दूसरे सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर ने, जो दक्षिणपंथी विचारक वी. डी. सावरकर से काफी प्रभावित थे, ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा को आगे बढ़ाया। सावरकर की दृष्टि में राम द्वारा रावण वध का दिन “हिंदू समाज का जन्मदिन” था। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के इतिहासकार विनायक चतुर्वेदी के अनुसार, संघ की हिंदू इतिहास की समझ काफी हद तक सावरकर से ही आती है। यही कारण है कि हिंदुत्व की राजनीति में राम का विशेष महत्व है।
2014 के बाद बदली राजनीति की दिशा
बीते एक दशक में भाजपा सरकार ने हिंदू धर्म को अपनी राजनीति के केंद्र में आक्रामक रूप से स्थापित किया है, जो भारतीय संविधान की मूल धर्मनिरपेक्ष भावना से अलग दिशा मानी जाती है। इस दौरान भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को संसदीय चुनाव में टिकट नहीं दिया। नफरत भरे भाषण, अल्पसंख्यकों की लिंचिंग और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले लगातार सामने आए। हाल ही में क्रिसमस के अवसर पर देश के कई हिस्सों में चर्चों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं।
अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी। जनवरी 2024 में मंदिर को जनता के लिए खोला गया और नवंबर 2025 में उसके पूर्ण होने की घोषणा की गई। भाजपा प्रवक्ताओं ने इसे “तुष्टिकरण के बिना सर्वांगीण विकास” बताया और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता को ‘वोट बैंक राजनीति’ करार दिया।
हालांकि भाजपा इससे पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 और 1999 में सत्ता में रही थी, लेकिन 2014 के बाद जो आक्रामक हिंदुत्व राजनीति देखने को मिली, वह पहले कभी नजर नहीं आई। मोदी के नेतृत्व में ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में कदम तेज हुए।
हाशिये से केंद्र तक पहुंचा दक्षिणपंथ
100 वर्षों में दक्षिणपंथी राजनीति हाशिये से निकलकर केंद्र में आ गई है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जिस RSS पर प्रतिबंध लगा था, वही आज न केवल दिल्ली के मध्य में भव्य भवन में मौजूद है, बल्कि उसकी राजनीतिक शाखा केंद्र में मजबूत सरकार चला रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिल पाने के बावजूद उसके हिंदुत्व एजेंडे में कोई कमी नहीं आई।
कांग्रेस और वाम दलों की गिरती पकड़
दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी, जिसने 2024 में लगभग 100 सीटें जीतकर मोदी सरकार को झटका दिया था, 2025 में दिशाहीन नजर आई। राहुल गांधी, जिन्होंने ‘पप्पू’ की छवि से बाहर निकलकर मोदी सरकार के मुखर आलोचक के रूप में पहचान बनाई, राज्य विधानसभा चुनावों में एक भी जीत दर्ज नहीं कर पाए। कांग्रेस ने 28 दिसंबर को अपना 140वां स्थापना दिवस मनाया और दावा किया कि उसने अपने मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
हालांकि, यह बयान भी इस सच्चाई की ओर इशारा करता है कि पार्टी अपने ऐतिहासिक मूल्यों और जनाधार को संभालने में विफल रही। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवा रही कांग्रेस, जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और गरीबोन्मुखी सोच की प्रतीक थी, लंबे समय तक सत्ता में रहने के दौरान जनसंपर्क खो बैठी। आज उसकी सत्ता केवल कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश तक सीमित है और आंतरिक कलह के कारण कर्नाटक भी खतरे में दिखता है। केरल में भी नेतृत्व को लेकर खींचतान पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है।
वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), जिसने 2025 में अपने 100 साल पूरे किए, गहरे संकट में है। 1951-52 के पहले आम चुनाव में वाम दल संसद में दूसरी सबसे बड़ी ताकत थे, लेकिन आज उनकी संख्या दो अंकों में सिमट गई है। विश्लेषकों के अनुसार, इसकी वजह उनकी जड़ सोच, जातिगत यथार्थ को न समझ पाना और वैश्वीकरण के दौर में खुद को ढालने में विफलता है।
2026 की ओर: संभावनाएं और चुनौतियां
2026 में क्या यह रुझान जारी रहेगा? भविष्यवाणी से ज्यादा संभावनाओं पर नजर डालना जरूरी है। 2027 में होने वाली जनगणना, जिसमें जाति गणना भी शामिल होगी, सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों की निगाहें इसके नतीजों पर टिकी होंगी।
भाजपा ने खुद को केवल एक ‘बनिया पार्टी’ से आगे बढ़ाकर ओबीसी, एमबीसी और दलितों तक फैलाया है। अल्पसंख्यकों को छोड़कर लगभग सभी वर्गों को साधने की रणनीति पर काम हो रहा है। मोदी का कार्यकाल पूरा होना तय माना जा रहा है, और उनका फोकस पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों पर रहेगा। यदि यहां भी भाजपा को सफलता मिली, तो “कांग्रेस मुक्त भारत” का नारा “विपक्ष मुक्त भारत” में बदल सकता है।
हालांकि राजनीति शून्य-योग का खेल नहीं है। अर्थव्यवस्था चिंता का विषय बनी हुई है, वैश्विक हालात अनिश्चित हैं और विकास के आंकड़ों पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि गांधी-नेहरू की समावेशी राष्ट्रवाद की सोच अंततः बहुसंख्यकवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को चुनौती देगी।
2026 ऐसे ही सवालों, टकरावों और संभावनाओं के बीच भारत की राजनीति को एक नई दिशा देने वाला वर्ष साबित हो सकता है।

