
ट्रेड डील की आड़ में डंपिंग का खतरा, किसान से उपभोक्ता तक होगा असर
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में 500 अरब डॉलर की खरीद और टैरिफ कटौती से कृषि, डेयरी, खाद्य सुरक्षा और किसानों पर गंभीर असर की आशंका जताई जा रही है।
“यह विनाशकारी साबित हो सकता है। इसका मतलब पूरे भारत में डंपिंग हो सकता है, जिसका सीधा असर हमारे किसानों, स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर पड़ेगा,” यह चेतावनी सेफ फूड अलायंस के सदस्य अनंथु ने दी है। वह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के साथ एक नए व्यापार समझौते की घोषणा पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। पारस्परिक टैरिफ में कटौती और भारत द्वारा 500 अरब डॉलर से अधिक के ‘अमेरिकी उत्पाद खरीदने’ की कथित प्रतिबद्धता के दावों के बीच कृषि, डेयरी, खाद्य सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। द फेडरल ने अनंथु से बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि यह समझौता भारतीय किसानों, उपभोक्ताओं और खाद्य संप्रभुता के लिए क्या मायने रखता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ में कटौती की घोषणा सोशल मीडिया के ज़रिये की। सवाल यह है कि इस नए व्यापार समझौते और पारस्परिक टैरिफ का आम भारतीय नागरिक पर क्या असर पड़ेगा? सबसे पहले तो यह घोषणा केवल सोशल मीडिया पर की गई है। यह कहां चर्चा में आई? इसकी पृष्ठभूमि क्या है? किन मुद्दों पर मतभेद थे, क्या बातचीत हुई और आखिरकार क्या साइन किया जा रहा है—इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। यही सबसे बड़ा सवाल है।
अचानक 500 अरब डॉलर की बात सामने रखी जा रही है। इससे पहले भारत लगभग 50 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदता था। अब इसे दस गुना बढ़ाकर पेश किया जा रहा है। कोई इस पर कितना भरोसा कर सकता है? और इसके बदले भारत क्या समझौता कर रहा है—यह भी स्पष्ट नहीं है।
किस पर पड़ेगा असर?
असल में यह हम जानते हैं, लेकिन इस पर खुलकर चर्चा नहीं हो रही है। यही सबसे बड़ी चिंता है। किन उत्पादों को बढ़ावा दिया जाएगा और किस तरह का दबाव बनाया जाएगा? लंबे समय से वाणिज्य मंत्री और प्रधानमंत्री यह कहते आए हैं कि कृषि और डेयरी से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। क्या यह वादा निभाया गया है? यह दूसरा बड़ा सवाल है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। यह चिंता का विषय क्यों है? ट्रंप ने खुले तौर पर कहा है कि भारत 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी उत्पाद ऊर्जा, तकनीक, कृषि, कोयला और अन्य वस्तुएं खरीदेगा। यह विनाशकारी हो सकता है। इससे पूरे भारत में डंपिंग की आशंका बढ़ जाती है। 140 करोड़ लोगों को सिर्फ उपभोक्ता के रूप में देखा जा रहा है।
हो सकता है ट्रंप अमेरिका के लिए अच्छा फैसला ले रहे हों, लेकिन हमें यह देखना होगा कि भारत के लिए क्या सही है। व्यापार समझौता ऐसा ही होना चाहिए। पिछले दो दशकों में कई एफटीए और व्यापार समझौते बेहद एकतरफा रहे हैं, जो अमीर और विकसित देशों के पक्ष में गए हैं। वे भारत को सिर्फ एक बाजार के रूप में देखते हैं। उनके किसान और उद्योग भारी सब्सिडी पाते हैं और ऐसे नियम थोपे जाते हैं जो हमें बांधकर रखते हैं।
खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी पर खतरा
अमेरिका पहले भी भारत द्वारा दूध, पोर्क और मछली जैसे कृषि आयातों पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। सवाल यह है कि क्या यह समझौता भारत को अपने खाद्य सुरक्षा मानकों में बदलाव के लिए मजबूर करेगा? यह सबसे अहम चिंता है। एक तरफ आर्थिक असर है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़ा पहलू।
भारत में सख्त मानक और नियम हैं। उदाहरण के लिए, आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) उत्पादों की अनुमति नहीं है। भारत में निर्यात के लिए GM-फ्री प्रमाणन जरूरी है और इस पर पहले से कानूनी फैसले मौजूद हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या इन मानकों से समझौता किया गया है या किया जाएगा।
क्या अमेरिकी फल-सब्ज़ियां भारतीय बाजार में भर जाएंगी?
यह सबसे बड़ी आशंकाओं में से एक है। पहला मुद्दा उत्पादन का है। दूसरा यह कि क्या GM उत्पादों को अनुमति दी जाएगी। अमेरिका लंबे समय से मक्का, गेहूं, कैनोला और सोयाबीन के लिए दबाव बनाता रहा है। अगर ये उत्पाद भारत में आते हैं, तो इससे हमारे किसान, बाजार, स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और पर्यावरण सभी प्रभावित होंगे।यह सिर्फ बीज संप्रभुता या किसानों की आजीविका का सवाल नहीं है, बल्कि सामूहिक सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है। अगर ये समझौते सच साबित होते हैं, तो दांव पर बहुत कुछ लगा है।
जीरो टैरिफ की मांग
कुछ कृषि उत्पादों पर शून्य टैरिफ की बात की जा रही है। इस पर अनंथु कहते हैं कि पहले टैरिफ की कहानी समझनी होगी। ट्रंप ने पहले टैरिफ बहुत बढ़ाए और फिर घटा दिए। पहले टैरिफ 3, 5, 10 या 15 प्रतिशत के आसपास थे। उन्हें 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर फिर 18 प्रतिशत पर लाना भारत के लिए कोई बड़ी डील नहीं है।
दूसरी बात यह है कि जिन उत्पादों पर भारत ने स्वास्थ्य और सुरक्षा कारणों से जानबूझकर ऊंचे टैरिफ लगाए थे, अब उन पर शून्य टैरिफ की मांग की जा रही है। इसका मतलब अस्वास्थ्यकर उत्पादों की डंपिंग और उसके गंभीर परिणाम होंगे। यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य समेत हर चीज को प्रभावित करता है।
ग्रामीण अमेरिका को फायदा, ग्रामीण भारत का क्या?
अमेरिकी कृषि सचिव ने कहा है कि यह समझौता ग्रामीण अमेरिका को फायदा पहुंचाएगा। इस पर अनंथु कहते हैं कि कम से कम उन्होंने ईमानदारी दिखाई। उन्होंने साफ कहा कि यह समझौता अमेरिकी किसानों और उनकी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है। यही हम भी कह रहे हैं भारत को भारतीय किसानों, भारतीय कृषि और ग्रामीण आजीविका की चिंता करनी चाहिए। अगर डंपिंग होती है, तो भारतीय किसान बुरी तरह प्रभावित होंगे। उपभोक्ताओं के रूप में भी हमें सतर्क रहना होगा, क्योंकि हमारे पास जो पहुंचेगा, वह अस्वास्थ्यकर भी हो सकता है।
डंपिंग का असर कैसे पड़ता है?
डंपिंग के कई उदाहरण हैं। जब गेहूं या कपास आयात हुआ, तो वह सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी कम कीमत पर आया। MSP खुद ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन आयात और भी सस्ता था। दालों या मसालों की कीमतें क्या होंगी?
जब श्रीलंका के साथ एफटीए के तहत टैरिफ घटाए गए, तो वियतनाम से डंपिंग शुरू हो गई। रातोंरात वियतनाम काली मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया। कर्नाटक और केरल के किसान तबाह हो गए और 15 साल बाद भी संभल नहीं पाए। यही डंपिंग की हकीकत है।
भारतीय और अमेरिकी किसानों की तुलना
अमेरिकी किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है। अगर भारतीय किसान को 10 रुपये की सब्सिडी मिलती है, तो अमेरिकी किसान को 1,000 रुपये मिलते हैंयानी सौ गुना ज्यादा। फायदा उन्हें होगा, उनकी अर्थव्यवस्था को होगा, लेकिन कीमत भारतीय किसानों को चुकानी पड़ेगी।
यूरोपीय संघ समझौते से तुलना
यूरोपीय संघ के साथ चल रही बातचीत में भी वही समस्या है—गोपनीयता। लगभग दो दशकों से बातचीत चल रही है, लेकिन क्या दिया गया और क्या बचाया गया, कोई नहीं जानता। अब अमेरिका के साथ अचानक रातोंरात घोषणा हो गई। भारत पहले ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के साथ एफटीए कर चुका है, जिसका असर डेयरी सेक्टर पर दिख रहा है। कच्चा दूध भले न आए, लेकिन प्रोसेस्ड उत्पाद बाजार को बिगाड़ रहे हैं। यही हाल कृषि में भी होगा। यह एक अशुभ संकेत है। भारत को जागना होगा। सार्वजनिक बहस, पारदर्शिता और मजबूत सुरक्षा उपाय जरूरी हैं, ताकि हमारी पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था, किसान और कृषि सुरक्षित रह सकें।

