मेडिकल बोर्ड से तय होगी पहचान? ट्रांसजेंडर बिल 2026 पर बहस तेज
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मेडिकल बोर्ड से तय होगी पहचान? ट्रांसजेंडर बिल 2026 पर बहस तेज

ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन बिल 2026 संसद में पेश होने के बाद विवादों में है। आत्म-पहचान का प्रावधान हटाने और मेडिकल बोर्ड से पहचान तय करने के प्रस्ताव पर विरोध तेज हो गया है।


केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किया गया Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026 अब विवादों के केंद्र में आ गया है। ट्रांसजेंडर अधिकार समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने इस विधेयक की तीखी आलोचना की है। केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने इस बिल को लोकसभा में पेश किया। प्रस्तावित संशोधन भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और उनकी पहचान से जुड़े मौजूदा कानून में महत्वपूर्ण बदलाव करने का प्रस्ताव देता है।

आत्म-पहचान के अधिकार पर विवाद

विवाद का मुख्य कारण वह प्रस्ताव है जिसमें स्व-परिभाषित लैंगिक पहचान (Self-perceived gender identity) के प्रावधान को हटाने की बात कही गई है। यह सिद्धांत पहले Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 में शामिल किया गया था।

मौजूदा कानून के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति जिला प्रशासन से प्रमाणपत्र प्राप्त करते समय अपनी लैंगिक पहचान स्वयं घोषित कर सकते थे। लेकिन नया संशोधन इस प्रावधान को हटाकर पहचान तय करने के लिए अधिक औपचारिक और संरचित प्रक्रिया लागू करने का प्रस्ताव देता है।

ट्रांस अधिकारों पर खतरे की आशंका

रिपोर्टों के अनुसार यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान तय करने के लिए एक अधिक सीमित कानूनी ढांचा लागू करना चाहता है। प्रस्ताव के अनुसार प्रमाणन की प्रक्रिया में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (Chief Medical Officer) की अध्यक्षता में एक मेडिकल बोर्ड शामिल होगा। इसके बाद अंतिम निर्णय जिला मजिस्ट्रेट की समीक्षा के बाद ही लिया जाएगा और तभी पहचान से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज जारी होंगे।

इन प्रस्तावित बदलावों पर ट्रांसजेंडर समुदाय और नागरिक समाज संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि आत्म-पहचान के सिद्धांत को हटाना एक बड़ा बदलाव है और यह उस ढांचे से पीछे हटने जैसा है जिसे एक दशक पहले सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी थी।

ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने मांग की कि 2019 के कानून में प्रस्तावित संशोधन को तुरंत वापस लिया जाए।

मेडिकल बोर्ड बनाम आत्म-पहचान

कार्यकर्ताओं ने अपने बयान में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया, जो नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी बनाम भारत संघ (National Legal Services Authority vs Union of India) में दिया गया था। इस फैसले में अदालत ने व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान—पुरुष, महिला या तीसरे लिंग—के रूप में स्वयं निर्धारित करने का अधिकार दिया था।कार्यकर्ताओं का कहना है कि नया संशोधन इस सिद्धांत से अलग हटता है क्योंकि इसमें पहचान की पुष्टि मेडिकल बोर्ड और जिला प्रशासन द्वारा जांच के जरिए करने की व्यवस्था की जा रही है।

उनके अनुसार यह बदलाव आत्म-निर्णय के अधिकार को खत्म कर देता है और उसकी जगह राज्य द्वारा अनिवार्य सत्यापन की प्रक्रिया लागू करता है। इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की निजता और गरिमा पर असर पड़ सकता है और उनकी पहचान लगातार सरकारी निगरानी के दायरे में आ सकती है।

परिभाषा में बदलाव पर भी चिंता

समुदाय संगठनों ने “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा में बदलाव पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधन इस परिभाषा को सीमित कर सकता है, जिससे कई ऐसी लैंगिक पहचानें कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकती हैं जिन्हें 2019 के कानून में मान्यता दी गई थी।पहले के कानून में ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, जेंडर क्वीयर और अन्य विविध लैंगिक पहचानें स्पष्ट रूप से शामिल थीं। आलोचकों का कहना है कि संशोधित परिभाषा कई व्यक्तियों को उस कानूनी ढांचे से बाहर कर सकती है जो उनके अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया था।

निजता और मेडिकल गोपनीयता का मुद्दा

इस संशोधन पर एक और बड़ी आपत्ति जेंडर-अफर्मिंग चिकित्सा प्रक्रियाओं से जुड़ी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रस्तावित बिल में अस्पतालों को ऐसी चिकित्सा प्रक्रियाओं की जानकारी जिला प्रशासन को देने का प्रावधान किया गया है।इससे मेडिकल गोपनीयता और व्यक्तिगत निजता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्वास्थ्य से जुड़े फैसले मरीज और डॉक्टर के बीच गोपनीय रहने चाहिए, न कि उन्हें प्रशासनिक रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध

इस विवाद ने राजनीतिक प्रतिक्रिया भी पैदा की है। Communist Party of India (Marxist) यानी CPI(M) ने इस संशोधन का कड़ा विरोध किया है। पार्टी ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और पहले से मान्यता प्राप्त अधिकारों को कमजोर करने वाला कदम बताया है।पार्टी के CPI(M) पोलित ब्यूरो( Polit Bureau) ने बयान जारी कर कहा कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित लैंगिक आत्म-निर्णय के सिद्धांत को कमजोर करता है।

बयान के अनुसार यह बिल आत्म-पहचान की जगह मेडिकल बोर्ड और जिला प्रशासन के प्रमाणन की व्यवस्था लागू करता है, जिससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अनावश्यक नौकरशाही और चिकित्सकीय निगरानी का सामना करना पड़ सकता है।

‘प्रतिगामी’ दृष्टिकोण का आरोप

CPI(M) ने यह भी कहा कि प्रस्तावित संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को अत्यधिक सीमित कर देता है। उनके अनुसार इससे ट्रांस पुरुषों, नॉन-बाइनरी व्यक्तियों और जेंडर-फ्लूइड लोगों को कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर किया जा सकता है।पार्टी ने आरोप लगाया कि यह संशोधन समाज में कठोर लैंगिक श्रेणियों को लागू करने की एक व्यापक वैचारिक कोशिश को दर्शाता है और इसे लैंगिक समानता के लिए एक प्रतिगामी दृष्टिकोण बताया।

कानूनी चुनौतियों की संभावना

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस संशोधन को लेकर विवाद संवैधानिक सिद्धांतों पर नई बहस शुरू कर सकता है। LGBTQ अधिकारों से जुड़े कई वकीलों का मानना है कि पहचान और गरिमा का अधिकार सीधे तौर पर उस निजता के अधिकार से जुड़ा है जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही मान्यता दे चुका है।उनका कहना है कि यदि लैंगिक पहचान को मेडिकल और प्रशासनिक सत्यापन के अधीन किया जाता है, तो अदालत में इसे चुनौती दिए जाने पर संवैधानिक प्रश्न उठ सकते हैं।

आगे क्या होगा

ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं के लिए यह बहस केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं बल्कि पहचान और आत्म-निर्णय के अधिकार का मुद्दा है। कई लोग याद दिलाते हैं कि 2019 का कानून भी पहचान प्रमाणन में नौकरशाही प्रक्रिया को लेकर पहले से आलोचना झेल चुका है।आलोचकों का कहना है कि नया संशोधन उन चिंताओं को दूर करने के बजाय उन्हें और मजबूत कर सकता है।

जैसे-जैसे यह विधेयक संसद की प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा, इस पर बहस और तेज होने की संभावना है। नागरिक समाज संगठन, राजनीतिक दल और कानूनी विशेषज्ञ इस मुद्दे पर जन अभियान से लेकर संभावित न्यायिक चुनौती तक की तैयारी कर रहे हैं।

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