भारत की व्यापक आर्थिक मजबूती की परीक्षा ले रहा है ईरान युद्ध, सरकारी आंकड़ों से संकेत
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वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी तक भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत स्थिति में थी; लेकिन पश्चिम एशिया के संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमत को 149 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया, जिससे रुपया गिरकर लगभग 94 प्रति डॉलर तक पहुंच गया।

भारत की व्यापक आर्थिक मजबूती की परीक्षा ले रहा है ईरान युद्ध, सरकारी आंकड़ों से संकेत

ईरान–इज़राइल–अमेरिका संघर्ष भारत को इन मोर्चों पर बुरी तरह प्रभावित कर रहा है: तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा; आयात कीमतों में वृद्धि; मालभाड़ा और बीमा लागत में तेज़ उछाल; और खाड़ी देशों से आने वाले प्रेषण (रेमिटेंस) में संभावित गिरावट।


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मार्च 2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में प्रवेश कर रही थी, लेकिन अमेरिका–इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए युद्ध ने अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाला है, ऐसा सरकारी आंकड़ों से पता चलता है।

वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा तैयार मार्च 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा एक “दो-गति” (टू-स्पीड) तस्वीर पेश करती है: एक तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था, जो फरवरी तक मज़बूती से प्रदर्शन कर रही थी, और दूसरी तरफ बाहरी माहौल, जो उसके बाद तेज़ी से बिगड़ गया — जिसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया का संघर्ष है।

युद्ध से पहले

तनाव बढ़ने से पहले भारत के व्यापक आर्थिक आधार मज़बूत थे। फरवरी में मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई चार महीने के उच्च स्तर 56.9 पर पहुंच गया, जबकि सर्विसेज़ पीएमआई 58.1 पर था। खुदरा ऑटोमोबाइल बिक्री में साल-दर-साल 25.2% की वृद्धि हुई, डिजिटल भुगतान की मात्रा 26.6% बढ़ी, और बैंक ऋण 14.5% की दर से बढ़ा — जो पिछले वर्ष के 11.1% से काफी अधिक है। सरकार ने वित्त वर्ष 2027 के लिए विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7.0–7.4% कर दिया था।

खुदरा महंगाई फरवरी में 3.21% पर थी, जो 10 महीने के उच्च स्तर पर होने के बावजूद नियंत्रण में थी। खास बात यह थी कि इसमें अभी तक कच्चे तेल की कीमतों के झटके का असर शामिल नहीं हुआ था — लेकिन यह स्थिति बदलने वाली थी।

चार प्रमुख प्रभाव के रास्ते

समीक्षा के अनुसार, यह संघर्ष चार तरीकों से भारत को प्रभावित कर रहा है:

1. तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा

2. आयात कीमतों में वृद्धि

3. मालभाड़ा और बीमा लागत में तेज़ बढ़ोतरी

4. खाड़ी देशों से आने वाले प्रेषण (रेमिटेंस) में संभावित गिरावट — जहां लगभग 92 लाख भारतीय काम करते हैं और हर साल करीब 40 अरब डॉलर भेजते हैं, जो भारत के कुल प्रेषण का लगभग 35% है।

आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों की संख्या, जो पहले हर हफ्ते 200–300 होती थी, अब घटकर सिर्फ एक रह गई है। कच्चे तेल की कीमतें दोगुने से भी अधिक बढ़ चुकी हैं—20 मार्च तक यह 69 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 149.9 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। कतर के रास लाफान (Ras Laffan) पर ईरान के मिसाइल हमलों ने एक ही झटके में वैश्विक एलएनजी क्षमता का 17% खत्म कर दिया, और इस व्यवधान के कई वर्षों तक जारी रहने की आशंका है। सऊदी अरब की रास तनूरा (Ras Tanura) रिफाइनरी, जो रोज़ 5.5 लाख बैरल तेल प्रोसेस करती है, मार्च की शुरुआत में अस्थायी रूप से बंद कर दी गई।

भारत के लिए स्थिति गंभीर है, क्योंकि वह अपने 80% से अधिक कच्चे तेल और लगभग 93% एलपीजी की आपूर्ति इन्हीं संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों से करता है। रिपोर्ट के अनुसार, एलपीजी पर सबसे अधिक दबाव है—रिफाइनरियों में इसका उत्पादन केवल 4–6% होता है, जिससे घरेलू स्तर पर इसकी भरपाई की गुंजाइश बहुत कम है।

शुरुआती असर दिखने लगा

मार्च के मध्य तक इस संकट का असर तेज़ी से दिखने लगा।

* ई-वे बिल जनरेशन (माल की आवाजाही का संकेतक) में महीने-दर-महीने 5.3% की गिरावट आई।

* फ्लैश पीएमआई आंकड़ों ने उत्पादन में नरमी का संकेत दिया।

* 24 मार्च तक रुपया गिरकर 93.88 प्रति डॉलर हो गया—संघर्ष शुरू होने के बाद से 3.1% की गिरावट।

* केवल मार्च महीने में ही 12.5 अरब डॉलर का पोर्टफोलियो निवेश बाहर निकल गया।

* MSCI इंडिया इंडेक्स में महीने के दौरान 10.65% की गिरावट दर्ज की गई।

सरकार के कदम

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने कई मोर्चों पर कदम उठाए हैं जैसे पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती की, रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए और सिर्फ 5 दिनों में 28% उत्पादन वृद्धि हासिल की।

यही नहीं, उर्वरक संयंत्रों के लिए गैस आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई और बढ़ते मालभाड़ा खर्च से निर्यातकों को बचाने के लिए 497 करोड़ रुपये की “राहत” योजना शुरू की गई।

भारत के पास 709.8 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो 11 महीने से अधिक के आयात को कवर कर सकता है—यह बाहरी झटकों के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच देता है।

आगे का रास्ता

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने समीक्षा की प्रस्तावना में साफ कहा है कि वित्त वर्ष 2027 के लिए 7.0–7.4% की विकास दर का अनुमान अब “काफी नीचे जाने के जोखिम” का सामना कर रहा है। उनका सुझाव स्पष्ट है: खाड़ी क्षेत्र में हालात जल्दी सामान्य होने की उम्मीद न करें, बल्कि धीरे-धीरे सुधार की योजना बनाएं, और इस संकट को भविष्य के आपूर्ति झटकों से निपटने के लिए भारत को संरचनात्मक रूप से मजबूत बनाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करें।

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