बिहार: क्या नीतीश का फैसला बीजेपी की व्यापक योजना को दर्शाता है? | Talking Sense With Srini
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बिहार: क्या नीतीश का फैसला बीजेपी की व्यापक योजना को दर्शाता है? | Talking Sense With Srini

Talking Sense With Srini के नए एपिसोड में बताया गया है कि किस तरह बीजेपी गठबंधनों, पार्टी टूट और कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाकर अपने विस्तार की रणनीति बनाती है। बिहार में हो रहा राजनीतिक पुनर्संयोजन राज्य की राजनीति को नया रूप दे सकता है।


बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने के नीतीश कुमार के फैसले ने राज्य की राजनीति में इसके प्रभाव को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही यह कदम अचानक लग सकता है, लेकिन यह उस व्यापक पैटर्न में फिट बैठता है जिसने बीजेपी को पूरे भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद की है। यह बात द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने Talking Sense With Srini के नवीनतम एपिसोड में कही।

श्रीनिवासन के अनुसार यह घटना “ब्लैक स्वान” यानी अप्रत्याशित घटना बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह बिहार में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के भीतर जेडीयू की धीरे-धीरे कमजोर होती स्थिति का संकेत हो सकती है।

उन्होंने कहा, “जहां बीजेपी बहुत तेजी से स्वाभाविक रूप से नहीं बढ़ पाती, वहां वह एक तरह की ‘अधिग्रहण रणनीति’ अपनाती है।” उन्होंने इसकी तुलना कॉरपोरेट दुनिया के मर्जर और एक्विजिशन से की। “कभी-कभी यह पहले गठबंधन बनता है और बाद में उसमें समाहित हो जाता है।”

क्षेत्रीय रणनीति, राष्ट्रीय लक्ष्य

श्रीनिवासन ने महाराष्ट्र को इसका प्रमुख उदाहरण बताया। एक समय ऐसा था जब बीजेपी, शिवसेना की जूनियर पार्टनर हुआ करती थी। लेकिन 2019 से 2022 के बीच हुए राजनीतिक घटनाक्रम में पार्टी में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट बीजेपी के साथ गठबंधन में आ गया।

इसी तरह एनसीपी में भी विभाजन हुआ, जब अजित पवार शरद पवार से अलग हो गए।

श्रीनिवासन ने कहा, “इसका नतीजा यह हुआ कि महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी।” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह रणनीति हर राज्य में अलग तरीके से लागू होती है। उन्होंने कहा, “कुल मिलाकर रणनीति एक जैसी हो सकती है, लेकिन उसका क्रियान्वयन अलग-अलग होता है।”

महाराष्ट्र में यह बदलाव पार्टी टूट के जरिए एक तरह के ‘हॉस्टाइल टेकओवर’ जैसा था। वहीं बिहार में यह बदलाव कहीं ज्यादा सहज दिखता है, जहां नीतीश कुमार का कदम टकराव के बजाय धीरे-धीरे सत्ता हस्तांतरण जैसा माना जा रहा है।

कांग्रेस की गिरावट से बीजेपी को फायदा

श्रीनिवासन ने बीजेपी के उभार को भारतीय राजनीति में हुए व्यापक संरचनात्मक बदलावों से भी जोड़ा। आजादी के बाद कई दशकों तक कांग्रेस भारतीय राजनीति पर हावी रही। लेकिन 1990 के दशक के बाद देश में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ।

2014 के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय ध्रुव बनकर उभरी है।

श्रीनिवासन का मानना है कि कांग्रेस की कमजोरी ने इस बदलाव को संभव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा, “कांग्रेस की मजबूत चुनौती देने में असफलता ने बीजेपी को कई राज्यों में राजनीतिक खाली जगह भरने का मौका दिया।”

हालांकि यह विस्तार हर जगह समान नहीं रहा। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां और वैचारिक राजनीति अब भी बीजेपी के विस्तार को सीमित करती हैं।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी के बढ़ते वोट शेयर के बावजूद अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी है।

बिहार में राजनीतिक पुनर्संयोजन

आगे देखते हुए श्रीनिवासन का मानना है कि बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत एक दल के प्रभुत्व वाली व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।हालांकि फिलहाल बीजेपी के पास मजबूत संगठन, वैचारिक एकजुटता और प्रभावशाली नेतृत्व है, लेकिन उन्होंने जल्दबाजी में कोई अंतिम निष्कर्ष निकालने से सावधान किया।

उन्होंने कहा, “भारत अब भी एक जीवंत लोकतंत्र है,” और यह भी जोड़ा कि देश में राजनीतिक परिस्थितियां समय के साथ बदलती रही हैं।

फिलहाल नीतीश कुमार का यह कदम एक और राजनीतिक पुनर्संयोजन की शुरुआत हो सकता है जो आने वाले वर्षों में बिहार में शक्ति संतुलन को बदल सकता है।

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