
बिहार-कर्नाटक में बदली सियासत, क्या ढलान पर है जनता परिवार?
जेडीयू और जेडीएस के कमजोर होने के बीच जनता परिवार की राजनीति पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व के दौर में क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता नई चुनौती से जूझ रही है।
1977 के आम चुनाव के बाद उभरी जनता परिवार की राजनीतिक परंपरा आज अपने अंतिम चरण में पहुँचती हुई दिखाई दे रही है। बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) और कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लगातार कमजोर होने से राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह जनता परिवार की राजनीति का अंत है। 1975 में आपातकाल लगाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के विरोध में विभिन्न गैर-कांग्रेस ताकतें एकजुट हुई थीं और 1977 में बनी जनता पार्टी (Janata Party) ने सत्ता हासिल की थी। यही गठबंधन आगे चलकर जनता परिवार की व्यापक राजनीतिक परंपरा का आधार बना।
क्षेत्रीय दलों का धीरे-धीरे बिखराव
समय के साथ यह गठबंधन कई क्षेत्रीय दलों में बंटता चला गया। अंततः जनता परिवार की प्रमुख सक्रिय पार्टियां केवल जनता दल यूनाइटेड Janata Dal (United) और जनता दल सेक्युलर Janata Dal (Secular) ही बचीं। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने रणनीतिक रूप से क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को सीमित करने और विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश की। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बाद 2026 की शुरुआत में यह प्रक्रिया और तेज हो गई।
पुराने नेतृत्व का ढलता दौर
जब जेडी(एस) और जेडी(यू) ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (National Democratic Alliance) के साथ हाथ मिलाया, तो इसे भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा गया। इससे ऐसा लगा कि देश फिर से एक “प्रमुख दल प्रणाली” की ओर लौट रहा है, जिसमें एक राष्ट्रीय पार्टी का दबदबा हो।
इन दोनों क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिख रही है। जेडी(एस) के वरिष्ठ नेता एच डी देवगौड़ा )H. D. Deve Gowda) का राज्यसभा में जाना, उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी (H. D. Kumaraswamy) का केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना और जेडी(यू) प्रमुख Nitish Kumar का बिहार की सक्रिय राजनीति से दूर होना इस बदलाव के संकेत माने जा रहे हैं। यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि देश में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के कमजोर पड़ने का भी संकेत है।
बिहार में नई राजनीतिक स्थिति
नीतीश कुमार के बेटे Nishant Kumar हाल ही में जेडी(यू) में शामिल हुए हैं और उन्हें बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना जताई जा रही है। वहीं बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने की चर्चा भी तेज है।
ओडिशा में बीजद की चुनौती
जनता परिवार की कहानी केवल बिहार और कर्नाटक तक सीमित नहीं है। ओडिशा में बीजू जनता दल भी इसी परंपरा से जुड़ा दल है। इसे राज्य के प्रतिष्ठित नेता बीजू पटनायक (Biju Patnaik) के बेटे नवीन पटनायक (Naveen Patnaik) ने 1997 में बनाया था। कई दशकों तक ओडिशा की राजनीति पर प्रभुत्व रखने के बाद 2024 के विधानसभा चुनावों में सत्ता खोने के बाद पार्टी का भविष्य अनिश्चित दिखाई दे रहा है।
लालू की आरजेडी भी चुनौती में
बिहार में जनता दल की एक और शाखा राष्ट्रीय जनता दल है जिसे पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने 1997 में बनाया था। उनके बेटे तेजस्वी यादव Tejashwi Yadav अब पार्टी का नेतृत्व संभाल चुके हैं। हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार ने नई पीढ़ी के नेतृत्व के सामने चुनौती खड़ी कर दी है कि वे भाजपा की मजबूत राजनीतिक मशीनरी का मुकाबला कैसे करेंगे।
कर्नाटक में जेडी(एस) की रणनीति
कर्नाटक की राजनीति में जेडी(एस) अब भी अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश कर रही है। एच. डी. कुमारस्वामी ने संकेत दिया है कि वे 2028 के विधानसभा चुनावों में राज्य की राजनीति में फिर सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग हुई तो वे राज्य में लौटेंगे।
इन दिनों वे कर्नाटक के पुराने मैसूर क्षेत्र और वोक्कालिगा बहुल इलाकों में लगातार दौरे कर रहे हैं, ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया जा सके। 2024 के लोकसभा चुनाव में जेडी(एस) ने भाजपा के साथ गठबंधन किया था, जिससे भाजपा को इस क्षेत्र में लाभ मिलने की उम्मीद है।
जेडी(एस) और जेडी(यू) की समानताएं
इन दोनों दलों के बीच कई समानताएँ हैं। दोनों की जड़ें जनता आंदोलन में हैं और दोनों ने क्षेत्रीय तथा सामाजिक गठबंधनों के आधार पर अपनी राजनीति विकसित की। दोनों ही पार्टियों का नेतृत्व लंबे समय तक प्रभावशाली नेताओं के हाथों में रहा, जिनकी व्यक्तिगत छवि ने पार्टी की पहचान तय की।
हालांकि दोनों में एक बड़ा अंतर भी है। जेडी(एस) का आधार कर्नाटक के दक्षिणी हिस्से में वोक्कालिगा समुदाय के बीच मजबूत है, जिससे उसे क्षेत्रीय स्तर पर अभी भी राजनीतिक महत्व मिलता है। इसके विपरीत जेडी(यू) का प्रभाव पूरे बिहार में फैला हुआ था और उसकी राजनीति अधिकतर बदलते चुनावी समीकरणों और गठबंधनों पर निर्भर रही।
जेडी(एस) के 25 साल
जेडी(एस) ने हाल ही में अपने गठन के 25 साल पूरे किए। हालांकि पार्टी कई बार “किंगमेकर” की भूमिका निभाती रही है, लेकिन उसकी चुनावी ताकत समय के साथ कम होती गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की प्रासंगिकता अब अधिकतर प्रतीकात्मक रह गई है।
घटता जनाधार और विवाद
पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती यह भी है कि एच. डी. कुमारस्वामी के बेटे Nikhil Kumaraswamy लगातार चुनाव हारते रहे हैं—2019 का लोकसभा चुनाव, 2023 का विधानसभा चुनाव और 2024 का उपचुनाव। इससे संकेत मिलता है कि वोक्कालिगा बहुल क्षेत्रों में भी पार्टी की पकड़ कमजोर हो रही है। इसके अलावा परिवार से जुड़े कुछ विवाद—जैसे Prajwal Revanna से जुड़ा यौन उत्पीड़न मामला—ने भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाया है।
गिरावट की शुरुआत
कर्नाटक में जेडी(एस) की गिरावट की शुरुआत 2008 के विधानसभा चुनावों के बाद मानी जाती है। इससे पहले 2007 में भाजपा के साथ सत्ता साझा करने के समझौते के टूटने से पार्टी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा था। इसके बाद 2008 में भाजपा के बी एस येदियुरप्पा (B. S. Yediyurappa) मुख्यमंत्री बने और जेडी(एस) का प्रभाव काफी सीमित हो गया।
भाजपा का बढ़ता प्रभुत्व
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। भाजपा की मजबूत संगठनात्मक संरचना, स्पष्ट वैचारिक आधार और चुनावी रणनीति ने उसे एक प्रमुख राष्ट्रीय धुरी बना दिया है। इसके कारण कई छोटे और क्षेत्रीय दल या तो बड़े गठबंधनों में समाहित हो रहे हैं या धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं।
बिहार और कर्नाटक के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि जनता परिवार से निकले दल अब एक समान राजनीतिक यात्रा पर हैं—जहाँ उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व के बीच इन दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की है।
भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जनता परिवार की नई पीढ़ी भाजपा जैसी मजबूत राष्ट्रीय पार्टी का मुकाबला कर पाएगी, या फिर भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और सीमित होती चली जाएगी।

