
JNU ‘लॉन्ग मार्च’ से बढ़ा सियासी घमासान, लोकतंत्र पर बहस तेज
JNU में कुलपति की टिप्पणी के बाद छात्रों का ‘लॉन्ग मार्च’ विवाद बढ़ा। पूर्व छात्र नेता आनंद कुमार ने कहा कि कैंपस में विरोध की जगह घट रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।
फरवरी के अंत और मार्च 2026 की शुरुआत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (Jawaharlal Nehru University) में तनाव चरम पर पहुंच गया, जब सैकड़ों छात्रों ने शिक्षा मंत्रालय तक “लॉन्ग मार्च” निकालने की कोशिश की। यह विरोध उस समय भड़क उठा जब विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित (Santishree Dhulipudi पंडित( ने एक पॉडकास्ट में विवादित टिप्पणी की। उन्होंने भारत में दलितों के संघर्ष की तुलना अमेरिका के अश्वेत समुदाय से करते हुए कहा कि उन्हें “विक्टिम कार्ड खेलकर” आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
छात्रों को शिक्षा मंत्रालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया। इसी दौरान Indian Youth Congress के कुछ सदस्यों ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान “शर्टलेस” प्रदर्शन किया, जिस पर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। सरकार के मंत्रियों ने इस प्रदर्शन की आलोचना की और 14 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
हाल ही में कैंपस में हुए इन विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच Anand Kumar—जो कभी Banaras Hindu University Students’ Union और Jawaharlal Nehru University Students’ Union के अध्यक्ष रह चुके हैं—ने छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप, लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भूमिका और भारत में लोकतांत्रिक गिरावट की संभावनाओं पर अपनी राय रखी।
छात्र राजनीति का बदलता स्वरूप
दशकों के छात्र आंदोलन और सार्वजनिक जीवन के अनुभव के आधार पर आनंद कुमार कहते हैं कि कभी विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक संवाद और नागरिकता के विकास के केंद्र हुआ करते थे। उनके अनुसार 1960 और 1970 के दशक में विश्वविद्यालयों में छात्रों को लोकतांत्रिक राजनीति, संगठन और आंदोलन की कला सीखने का अवसर मिलता था।
उस समय छात्र संघों को सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का अहम हिस्सा माना जाता था। कुलपति और प्रशासन इस बात को अपनी जिम्मेदारी समझते थे कि कैंपस में आंदोलन, विरोध, सहयोग, प्रतिस्पर्धा और विवाद समाधान की संस्कृति बनी रहे।
लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है। आनंद कुमार के अनुसार, आज विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शनों पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध जैसा माहौल है। यदि कोई छात्र विरोध करता है तो उसे तुरंत “राष्ट्र-विरोधी” या “संविधान-विरोधी” करार दे दिया जाता है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
आनंद कुमार का मानना है कि यदि नागरिक निष्क्रिय हो जाते हैं तो सरकारों के पास यह समझने का कोई तरीका नहीं बचता कि उनकी नीतियां जमीनी स्तर पर कैसी दिखती हैं। छात्र आंदोलन लोकतंत्र के लिए एक तरह के “सुरक्षा वाल्व” की तरह काम करते हैं।ज्यादातर छात्र विश्वविद्यालयों में अपना भविष्य बनाने आते हैं। अगर वे सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कोई गंभीर समस्या मौजूद है।
उनके अनुसार आज संवाद, बहस और असहमति के लिए जगह कम होती जा रही है, जबकि लोकतंत्र का मूल तत्व ही यही है कि समाज अलग-अलग विचारों के साथ जीना सीखे।
विश्वविद्यालयों में खत्म होती संवाद की जगह
1970 के दशक और आज के समय की तुलना करते हुए आनंद कुमार कहते हैं कि उस दौर में भी सरकारें विरोध से खुश नहीं होती थीं, लेकिन वे उसे गंभीरता से लेती थीं। छात्र नेताओं को अपने विचार रखने के लिए मंच मिलते थे, भले ही वे विचार सरकार के खिलाफ हों।आज कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ ही नहीं हैं। जहां हैं भी, जैसे जेएनयू में, वहां भी उनके साथ संवाद और बातचीत सीमित हो गई है। कुमार के अनुसार यह स्थिति खतरनाक है।
क्या भारत में लोकतांत्रिक गिरावट हो रही है?
आनंद कुमार का मानना है कि यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंता का संकेत है। वे राजनीतिक दलों पर भी दोहरे रवैये का आरोप लगाते हैं। एक तरफ वे विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, दूसरी तरफ छात्रों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए वास्तविक मंच नहीं देते।
छात्र बेरोजगारी, शिक्षा के निजीकरण और अवसरों की कमी जैसे मुद्दे उठा रहे हैं। कुमार कहते हैं कि यदि भविष्य के नागरिक इन मुद्दों को उठा रहे हैं, तो उन्हें गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
1970 के दशक के जेएनयू की यादें
आनंद कुमार 1970 के दशक का एक उदाहरण देते हैं। उस समय जेएनयू में छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर कुलपति कार्यालय का “घेराव” किया था। स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी और उस समय की प्रधानमंत्री Indira Gandhi के कार्यालय ने पुलिस भेजने का सुझाव दिया। लेकिन तत्कालीन कुलपति G. Parthasarathi ने प्रधानमंत्री से कहा कि “ये मेरे छात्र हैं, मैं उनसे बातचीत करके समाधान निकालूंगा।” पुलिस नहीं बुलाई गई और अंततः बातचीत से समाधान निकला।
बढ़ती हिंसा और चिंता
कुमार बताते हैं कि आज विश्वविद्यालयों में हिंसा की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। कई मामलों में छात्रों और शिक्षकों पर हमले हुए, लेकिन आरोपियों को सजा नहीं मिली। इससे छात्रों का लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर विश्वास कमजोर होता है।
छात्र राजनीति से निकले बड़े नेता
दिलचस्प बात यह है कि आज सत्ता में बैठे कई नेता खुद छात्र राजनीति से उभरे हैं। उदाहरण के तौर पर Narendra Modi ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत गुजरात के नव निर्माण आंदोलन से की थी। Arun Jaitley भी Delhi University Students’ Union के अध्यक्ष रह चुके थे।
कुमार के अनुसार इन नेताओं ने छात्र राजनीति से लाभ उठाया, लेकिन आज वही शांतिपूर्ण छात्र आंदोलनों को “राष्ट्र-विरोधी” कहकर खारिज करते हैं।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी विरोध की परंपरा
भारत में विरोध की संस्कृति नई नहीं है। देश का स्वतंत्रता आंदोलन भी विरोध प्रदर्शनों से ही बना। 1905 के बंगाल विभाजन विरोध आंदोलन से लेकर 1920 के दशक में छात्रों के ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार तक, छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। Jawaharlal Nehru और Subhas Chandra Bose जैसे नेताओं ने भी छात्रों को राजनीतिक जागरूकता के लिए प्रेरित किया।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व
आनंद कुमार के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही लोकतंत्र और तानाशाही के बीच सबसे बड़ा अंतर है। भारत में B. R. Ambedkar और Mahatma Gandhi जैसे नेताओं ने उन लोगों को आवाज दी जिनकी आवाज पहले नहीं सुनी जाती थी।लेकिन अगर समाज में डर, असहिष्णुता और नफरत बढ़ती है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
नागरिकों की जिम्मेदारी
आनंद कुमार कहते हैं कि भले ही संस्थागत मंच सीमित हो गए हों, नागरिकों को पीछे नहीं हटना चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक सक्रिय रहते हैं।
लोग पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर भी आवाज उठा सकते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति या संस्था से नहीं, बल्कि नागरिकों के सामूहिक प्रयास से चलता है।
अंत में वे चेतावनी देते हैं कि यदि विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक संस्कृति खत्म हो गई, मीडिया की स्वतंत्रता घट गई और राजनीतिक दलों में भाई-भतीजावाद बढ़ गया, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।
उनके शब्दों में—लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब नागरिक शांतिपूर्ण, सामूहिक और संस्थागत तरीके से अपने अधिकारों के लिए खड़े होते हैं।

