महाभियोग का दबाव या रणनीति? जानिए क्यों जज देते हैं इस्तीफा
x

महाभियोग का दबाव या रणनीति? जानिए क्यों जज देते हैं इस्तीफा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने महाभियोग से पहले इस्तीफा देकर प्रक्रिया खत्म कर दी है। इससे पहले देश में दो मामले आए थे जब सौमित्र सेन और पी डी दिनाकरन ने इस्तीफा दिया था।


इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल को अपने पद से इस्तीफा दे दिया और इसे सीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा। उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी, लेकिन इस्तीफे के साथ ही यह कार्यवाही स्वतः समाप्त हो गई। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह तीसरी बार है जब किसी मौजूदा जज ने महाभियोग से ठीक पहले पद छोड़ दिया।

महाभियोग प्रक्रिया क्यों है मुश्किल?

भारत में किसी जज को हटाना बेहद कठिन और जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी होता है। अब तक किसी भी जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं जा सका है। इससे पहले भी दो मामलों में प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन अंत में जजों ने इस्तीफा दे दिया।

पहले भी हुए ऐसे मामले

जस्टिस सौमित्र सेन (2011): फंड हेराफेरी के आरोपों में घिरे। राज्यसभा से प्रस्ताव पास हुआ, लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले इस्तीफा दे दिया।

जस्टिस पी.डी. दिनाकरन (2011): कदाचार के आरोपों की जांच शुरू होने से पहले ही प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पद छोड़ दिया।

इस्तीफे का असर क्या होता है?

महाभियोग से पहले इस्तीफा देने पर पूरी संसदीय प्रक्रिया स्वतः खत्म हो जाती है। मौजूदा नियमों के अनुसार, ऐसे मामलों में जज के रिटायरमेंट लाभ—जैसे पेंशन—पर कोई रोक नहीं लगती, इसलिए उन्हें सभी सुविधाएं मिलती रहती हैं।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला मार्च 2025 का है, जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में कार्यरत थे। उनके सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने के बाद वहां से लगभग 15 करोड़ रुपये का जला हुआ और अधजला कैश बरामद हुआ।हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि यह पैसा उनका नहीं है और घटना के समय वह शहर से बाहर थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कोई भी व्यक्ति अपना पैसा ऐसी जगह नहीं रखेगा जहां सबकी पहुंच हो।

जांच में क्या हुआ?

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने जांच शुरू की। इसके बाद अप्रैल 2025 में उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया और उनसे न्यायिक कार्य भी वापस ले लिया गया।जुलाई 2025 में 100 से ज्यादा सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया। लोकसभा अध्यक्ष ने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। लेकिन रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने 13 पन्नों का पत्र लिखकर जांच प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया और इसे ‘पूर्वाग्रह से ग्रसित’ बताया।

अब आगे क्या?

कानून के मुताबिक, महाभियोग से पहले इस्तीफा देने पर पूरी प्रक्रिया स्वतः समाप्त मानी जाती है। ऐसे में जस्टिस वर्मा को रिटायरमेंट के सभी लाभ मिलते रहेंगे और उनके खिलाफ संसद में चल रही कार्रवाई यहीं खत्म हो जाएगी।

Read More
Next Story