
खामेनेई का भारत कनेक्शन : यूपी का गांव, कश्मीर की नमाज और कर्नाटक का दौरा
1979 की ईरानी क्रांति से जुड़ी धार्मिक वंशावली का संबंध उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंटूर गांव से जुड़ता है, जो लखनऊ से लगभग 70 किलोमीटर दूर है।
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की रविवार को हमलों में मौत की गूंज भारत में भी सुनाई दी, जहां शिया समुदाय और कई धर्मगुरुओं ने इस घटना की निंदा की। कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए। जम्मू-कश्मीर, जहां बड़ी शिया आबादी रहती है, में श्रीनगर के लाल चौक और सैदा कदल समेत बडगाम, बांदीपोरा, अनंतनाग और पुलवामा में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर मार्च निकाला, मातम मनाया और नारे लगाए, जबकि राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने शांति बनाए रखने की अपील की।
लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा के पास लोग इकट्ठा हुए, पोस्टर लेकर शोक सभाएं कीं। पंजाब के लुधियाना, राजस्थान के अजमेर और जोधपुर, तथा नई दिल्ली, बिहार, झारखंड और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन हुए।
वहीं कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले के अलीपुर गांव में, जहां खामेनेई 1980 के दशक में गए थे, वहां स्वैच्छिक बंद रखा गया। ग्रामीणों ने तीन दिन का शोक घोषित कर सार्वजनिक कार्यक्रम स्थगित कर दिए।
हालांकि खामेनेई का जन्म मशहद (ईरान) में हुआ और वे इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए, लेकिन उनका जीवन और वंश भारत से कई तरह से जुड़ा रहा। जैसे उत्तर प्रदेश से पारिवारिक संबंध, कश्मीर और कर्नाटक की यात्राएं, और 1979 की ईरानी क्रांति के बाद के शुरुआती वर्षों में भारत से संपर्क।
खामेनेई का उत्तर प्रदेश कनेक्शन
हालांकि अली खामेनेई की सीधी भारतीय नागरिकता या जन्म संबंधी जड़ें नहीं थीं, लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति से जुड़ी धार्मिक वंशावली का संबंध उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंटूर गांव से जुड़ता है, जो लखनऊ से लगभग 70 किलोमीटर दूर है।
यह गांव सैयद अहमद मुसवी हिंदी से जुड़ा है, जो रूहोल्लाह खामेनेई के दादा थे। उनका जन्म 19वीं सदी की शुरुआत में किंटूर में हुआ था, बाद में वे नजफ गए और फिर ईरान के खोमेइन में बस गए।
किंटूर कभी अवध रियासत में शिया विद्वता का केंद्र था, लेकिन अब वहां केवल कुछ ही शिया परिवार बचे हैं। मुसवी परिवार मूल रूप से 18वीं सदी की शुरुआत में ईरान के निशापुर से भारत आया था और किंटूर में बस गया था। लगभग 1830 में सैयद अहमद के ईरान लौटने से परिवार का फारसी जड़ों से पुनः जुड़ाव हुआ और आगे चलकर यही वंश इस्लामी क्रांति के नेतृत्व तक पहुंचा।
खामेनेई की कश्मीर यात्रा
खामेनेई का कश्मीर से भी एक उल्लेखनीय संबंध रहा। 1980 के अंत या 1981 की शुरुआत में उन्होंने कश्मीर का दौरा किया था।
एक संस्मरण के अनुसार, उस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण श्रीनगर में सुन्नी जुमे की नमाज में उनकी भागीदारी थी। वे मीरवाइज मौलवी फारूक के साथ एक प्रमुख सुन्नी मस्जिद में खड़े हुए और संक्षिप्त संबोधन दिया।
उस समय घाटी में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच गहरा अविश्वास था। ऐतिहासिक रूप से दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे की मस्जिदों में जाने से भी बचते थे। ऐसे माहौल में खामेनेई की मौजूदगी और भाषण का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था।
बताया जाता है कि इस कदम ने दोनों समुदायों के बीच संवाद का रास्ता खोला और बाद के वर्षों में आपसी धार्मिक कार्यक्रमों में भागीदारी बढ़ी।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने खामेनेई की हत्या पर चिंता जताते हुए कहा कि शोक मना रहे लोगों को शांतिपूर्वक मातम मनाने दिया जाना चाहिए और प्रशासन को संयम बरतना चाहिए।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे “इतिहास का दुखद और शर्मनाक क्षण” बताया।
कर्नाटक से जुड़ाव
खामेनेई का कर्नाटक से भी एक कम-ज्ञात संबंध रहा है। चिक्कबल्लापुर जिले के गौरिबिदनूर तालुक के अलीपुर गांव-जहां शिया आबादी बहुसंख्यक है, से उनका संबंध रहा।
1981-82 में खामेनेई ने अलीपुर का दौरा किया था, जहां उन्होंने ईरानी सरकार की सहायता से बने एक अस्पताल का उद्घाटन किया। इस यात्रा ने दक्षिण भारत के इस छोटे से गांव और ईरान के धार्मिक प्रतिष्ठान के बीच स्थायी संबंध स्थापित किए।
गांव में लंबे समय से ईरान के साथ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंध बने हुए हैं, और कई संस्थाएं ईरानी सहयोग से स्थापित की गई हैं।
इस तरह, भले ही खामेनेई का राजनीतिक जीवन ईरान तक सीमित रहा हो, लेकिन उनकी पारिवारिक वंशावली, धार्मिक यात्राएं और सांस्कृतिक संपर्क भारत से गहराई से जुड़े रहे।

