
SC का लालू के खिलाफ CBI की FIR रद्द करने से इनकार, लैंड-फॉर-जॉब मामला
देश की शीर्ष अदालत ने लालू प्रसाद यादव को इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की प्रयोज्यता का मुद्दा उठाने की अनुमति दी है...
नई दिल्ली, 13 अप्रैल (पीटीआई): सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े 'जमीन के बदले नौकरी' (लैंड-फॉर-जॉब) मामले में सीबीआई की एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हालांकि बिहार के 77 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री को कार्यवाही के दौरान निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट प्रदान कर दी है।
धारा 17ए की प्रासंगिकता पर सुनवाई की अनुमति
देश की शीर्ष अदालत ने लालू प्रसाद यादव को इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17ए की प्रयोज्यता (Applicability) का मुद्दा उठाने की अनुमति दी है। इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने 24 मार्च को इस मामले में सीबीआई की एफआईआर को रद्द करने से मना कर दिया था। उच्च न्यायालय ने आरजेडी प्रमुख के उस तर्क को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी के अभाव में एजेंसी की कार्रवाई कानूनी रूप से अस्थिर है।
क्या है पूरा मामला?
अधिकारियों के अनुसार, यह 'लैंड-फॉर-जॉब' मामला 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री के पद पर तैनात थे। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य क्षेत्र (West Central Zone) में ग्रुप-डी की नियुक्तियां की गई थीं। कथित तौर पर ये नियुक्तियां उन उम्मीदवारों को दी गईं, जिन्होंने बदले में अपनी जमीन के टुकड़े लालू यादव के परिवार के सदस्यों या उनके सहयोगियों के नाम पर उपहार में दिए थे या हस्तांतरित किए थे।
लालू यादव का कानूनी पक्ष
लालू प्रसाद यादव ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि इस मामले में सीबीआई द्वारा की गई प्रारंभिक जांच, दर्ज की गई एफआईआर, उसके बाद की गई पूरी जांच और दाखिल की गई चार्जशीट कानूनी रूप से अमान्य हैं। उनके अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत सीबीआई ने आवश्यक पूर्व अनुमति (Prior Sanction) नहीं ली थी, जो ऐसे मामलों में कानूनी रूप से अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले के बाद, जहां एक तरफ लालू यादव को कोर्ट में पेशी से राहत मिली है। वहीं दूसरी तरफ एफआईआर रद्द न होने से उनकी और उनके परिवार की कानूनी मुश्किलें फिलहाल बनी हुई हैं।
(पीटीआई इनपुट्स के साथ)

