Capital Beat : भारत में इन दिनों रसोई गैस यानी एलपीजी की किल्लत को लेकर सियासत गरमा गई है। गुरुवार 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों में विपक्ष ने गैस की कमी और कालाबाजारी को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने की आशंका ने आम जनता में घबराहट पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि संघर्ष के कारण चुनौतियां जरूर आई हैं। उन्होंने नागरिकों से पैनिक न करने की अपील की है। पीएम ने विश्वास जताया कि भारत इस वैश्विक संकट से सफलतापूर्वक बाहर निकल आएगा। हालांकि, विपक्षी दल सरकार के इन दावों से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री खुद घबराए हुए दिख रहे हैं। विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में खाली सिलेंडर लेकर प्रदर्शन किया। प्रियंका गांधी समेत कई महिला सांसदों ने प्रतीकात्मक चूल्हा जलाकर भविष्य की कठिनाइयों की ओर इशारा किया।
डिजिटल बुकिंग और सप्लाई पर उठे सवाल
कांग्रेस प्रवक्ता सुजाता पॉल ने चर्चा के दौरान दावा किया कि देशभर में लोग सिलेंडर बुक करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आधिकारिक वेबसाइटों पर बुकिंग नहीं हो रही है और हेल्पलाइन नंबर भी काम नहीं कर रहे हैं। लोगों को रात में बुकिंग करने की सलाह दी जा रही है, लेकिन वह विंडो भी खुल नहीं रही है। पॉल ने आरोप लगाया कि यह संकट सरकार की विदेश नीति की विफलताओं का परिणाम है। ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं के साथ संबंध बिगड़ने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। यदि यह युद्ध हफ्तों तक चला, तो क्या देश फिर से लकड़ी और कोयले पर खाना बनाने को मजबूर होगा?
कालाबाजारी और ऊंचे दामों का आरोप
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रवक्ता शुभंकर भट्टाचार्य ने देश के कुछ हिस्सों में एलपीजी की ब्लैक मार्केटिंग की खबरें साझा की हैं। उन्होंने बताया कि कई क्षेत्रों में गैस सिलेंडर 1,600 रुपये या उससे भी अधिक कीमत पर बेचे जा रहे हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की जा रही है, लेकिन उपलब्धता को लेकर बड़ा सवाल खड़ा है। भट्टाचार्य के अनुसार, यह संकट केवल घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवहन और छोटे व्यवसायों को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। होर्डिंग यानी जमाखोरी को रोकना अब राज्य सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
बफर स्टॉक और भविष्य की रणनीति
वरिष्ठ पत्रकार विवेक देशपांडे ने इस विवाद को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से जोड़कर देखा है। उन्होंने कहा कि जनता के बीच डर बैठ चुका है और लोग अब हॉट प्लेट्स जैसे वैकल्पिक साधनों की खरीदारी कर रहे हैं। देशपांडे ने सरकार की तैयारियों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या संभावित संकट के लिए 3-4 महीने का बफर स्टॉक तैयार नहीं किया जाना चाहिए था? भारत तेल और गैस के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है, इसलिए आपूर्तिकर्ताओं के साथ मजबूत कूटनीतिक रिश्ते अनिवार्य हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो आम उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय तनावों की मार झेलनी पड़ सकती है।
चुनावों पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी एक ऐसा मुद्दा है जो सीधे तौर पर हर घर की रसोई से जुड़ा है। अगर यह संकट जल्दी हल नहीं हुआ, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने वाला नहीं है। वर्तमान में सरकार का सारा जोर सप्लाई को सुचारू बनाने और जमाखोरी रोकने पर है। वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें और सप्लाई रूट की स्थिति ही तय करेगी कि यह विवाद कितनी जल्दी थमेगा।
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