एलपीजी संकट से देश का रेस्टोरेंट सेक्टर संकट में, लाखों रोज़गार दांव पर
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एलपीजी संकट से देश का रेस्टोरेंट सेक्टर संकट में, लाखों रोज़गार दांव पर

एलपीजी की कमी से देशभर के रेस्टोरेंट संकट में हैं। उद्योग का कहना है कि सप्लाई जल्द नहीं सुधरी तो लाखों रोजगार और 6.6 लाख करोड़ का इकोसिस्टम प्रभावित हो सकता है।


यदि एलपीजी (LPG) की आपूर्ति का संकट कई हफ्तों या महीनों तक जारी रहता है, तो यह रेस्टोरेंट उद्योग के लिए अस्तित्व का संकट बन सकता है। यह चेतावनी प्रसिद्ध रेस्टोरेंट उद्यमी जोरावर कालरा ने दी। उनका कहना है कि भारत के कई रेस्टोरेंट पहले ही अपने मेनू कम कर चुके हैं या एलपीजी सिलेंडरों की कमी के कारण बंद होने की कगार पर हैं।

AI with Sanket कार्यक्रम के एक एपिसोड में संकेट उपाध्याय ने कई रेस्टोरेंट ब्रांड्स के संस्थापक जोरावर कालरा और अनुभवी रेस्टोरेंट कारोबारी एडी सिंह से बातचीत की। इस चर्चा में उन्होंने देशभर के होटलों और रेस्टोरेंटों को प्रभावित कर रहे बढ़ते ईंधन संकट पर बात की। दोनों उद्योग नेताओं ने कहा कि एलपीजी की कमी पहले से ही संचालन को बाधित कर रही है और अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो यह एक बड़े आर्थिक झटके में बदल सकती है।

कालरा ने स्थिति की तुलना मार्च 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के शुरुआती दिनों से की। उन्होंने कहा कि उस समय 15–20 दिनों के भीतर ही उद्योग को अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस होने लगा था। उनका मानना है कि यदि एलपीजी की आपूर्ति सीमित रही तो मौजूदा स्थिति भी उसी तरह गंभीर हो सकती है।

उद्योग का आर्थिक महत्व

कालरा ने भारत की अर्थव्यवस्था में हॉस्पिटैलिटी उद्योग के बड़े योगदान पर जोर दिया। उनके अनुसार रेस्टोरेंट सेक्टर कृषि के बाद देश में दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है।यह उद्योग लगभग 80 लाख लोगों को सीधे रोजगार देता है और 80 लाख लोगों को सहायक उद्योगों के माध्यम से समर्थन देता है। इसके अलावा यह क्षेत्र भारत के जीडीपी में लगभग 2–3 प्रतिशत योगदान करता है।

कालरा ने बताया कि यह पूरा उद्योग लगभग ₹6.6 लाख करोड़ का इकोसिस्टम है और हर दिन लगभग ₹1,800 करोड़ का योगदान जीडीपी में करता है।लेकिन कमर्शियल एलपीजी की कमी—जिसका उपयोग रेस्टोरेंट की रसोई में व्यापक रूप से होता है—इस उत्पादन को खतरे में डाल रही है। कालरा का अनुमान है कि अगर एलपीजी आधारित संचालन बंद हो जाता है तो उद्योग को रोजाना ₹1,200 से ₹1,300 करोड़ तक का नुकसान हो सकता है।

उन्होंने कहा कि यह केवल वित्तीय नुकसान का मुद्दा नहीं है। उनके शब्दों में, “यह युद्ध जैसी स्थिति है। हम समझते हैं कि सभी को संसाधनों की बचत करनी चाहिए, लेकिन यदि एलपीजी की आपूर्ति शून्य हो जाती है तो रेस्टोरेंट चल ही नहीं सकते।”

एलपीजी सिलेंडरों की कमी

चर्चा के दौरान सबसे बड़ी चिंता कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की उपलब्धता को लेकर जताई गई। कालरा ने बताया कि रेस्टोरेंटों को कानूनी रूप से केवल 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर ही इस्तेमाल करने की अनुमति है और वे घरेलू सिलेंडरों का उपयोग नहीं कर सकते।लेकिन कई जगहों पर तेल कंपनियों ने कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति या तो बहुत कम कर दी है या पूरी तरह रोक दी है। कुछ मामलों में तो पूरी तरह प्रतिबंध जैसा माहौल बन गया है।

कालरा ने यह भी कहा कि सरकार के ईंधन आपूर्ति संबंधी उपायों में अभी घरेलू उपभोक्ताओं और पाइप्ड गैस नेटवर्क को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन रेस्टोरेंटों द्वारा इस्तेमाल होने वाली कमर्शियल एलपीजी को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है।

उन्होंने बताया कि उद्योग का केवल लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा पाइप्ड नेचुरल गैस या सीएनजी नेटवर्क का उपयोग करता है, जो इस संकट से प्रभावित नहीं हैं। लेकिन बाकी 75 प्रतिशत रेस्टोरेंट एलपीजी पर निर्भर हैं, और वही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

कालरा के अनुसार भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का केवल लगभग 40 प्रतिशत देश में ही उत्पादन करता है, जबकि 60 प्रतिशत आयात करता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा सामान्यतः स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर आता है, जहां भू-राजनीतिक तनाव के कारण व्यवधान पैदा हुए हैं।

छोटे व्यवसायों पर सबसे बड़ा असर

उद्योग नेताओं के अनुसार इस संकट का सबसे बड़ा असर छोटे रेस्टोरेंटों, सड़क किनारे ढाबों और असंगठित क्षेत्र के कारोबारियों पर पड़ेगा कालरा ने छोटे ढाबा मालिकों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अक्सर केवल एक एलपीजी सिलेंडर के सहारे अपना व्यवसाय चलाते हैं। यदि उन्हें हर हफ्ते मिलने वाला एक सिलेंडर भी न मिले तो उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता।

उन्होंने नियामकीय प्रतिबंधों का भी जिक्र किया। उदाहरण के लिए कई क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण नियमों के कारण कोयले के उपयोग पर प्रतिबंध है। दिल्ली में तो ढाबा मालिक तंदूर भी नहीं जला सकते क्योंकि चारकोल के इस्तेमाल पर रोक है। ऐसे में उनके पास खाना बनाने का कोई विकल्प नहीं बचता।

कालरा ने बताया कि नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI), जहां वे उपाध्यक्ष हैं, ने पहले ही रेस्टोरेंटों को ईंधन बचाने और वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की सलाह जारी कर दी है।

संकट से निपटने की रणनीतियां

एडी सिंह, जिनकी कंपनी कई प्रसिद्ध रेस्टोरेंट चलाती है जिनमें Olive Bar & Kitchen भी शामिल है, ने बताया कि बड़े रेस्टोरेंट समूहों को भी संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में उनके कई रेस्टोरेंट पाइप्ड गैस का उपयोग करते हैं, इसलिए वे फिलहाल सुरक्षित हैं। लेकिन अन्य शहरों में जहां पाइप्ड गैस उपलब्ध नहीं है, वहां इंडक्शन कुकिंग जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।

रेस्टोरेंट अपने मेनू में भी बदलाव कर रहे हैं। शेफ हर डिश का विश्लेषण कर रहे हैं और यह देख रहे हैं कि कौन-सी चीजें इंडक्शन या इलेक्ट्रिक उपकरणों पर बनाई जा सकती हैं।

हालांकि सिंह ने माना कि ये समाधान छोटे कारोबारियों के लिए बहुत महंगे और व्यावहारिक नहीं हैं, क्योंकि असंगठित क्षेत्र के पास न तो पर्याप्त जगह होती है, न पैसा और न ही आवश्यक बुनियादी ढांचा।

व्यापक आर्थिक असर

दोनों रेस्टोरेंट कारोबारियों ने चेतावनी दी कि यह संकट कई अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकता है। रेस्टोरेंट उद्योग एक बड़े इकोसिस्टम का हिस्सा है जिसमें फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म, गिग वर्कर्स, सप्लायर्स और किसान शामिल हैं।यदि रेस्टोरेंट बंद होते हैं तो स्विगी और जोमैटो जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों के कारोबार पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि उनका व्यवसाय काफी हद तक रेस्टोरेंटों पर निर्भर है। हजारों गिग वर्कर्स भी इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी आजीविका कमाते हैं।

इसके अलावा खाद्य सामग्री के सप्लायर, किचन उपकरण विक्रेता और लॉजिस्टिक्स सेवाएं देने वाले व्यवसाय भी प्रभावित होंगे। सिंह ने कहा कि उद्योग में काम करने वाला हर व्यक्ति लगभग चार से छह परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण करता है, इसलिए आर्थिक असर बहुत तेजी से बढ़ सकता है।

कालरा ने भी चेतावनी दी कि यदि रेस्टोरेंट बड़े पैमाने पर बंद होते हैं तो इस क्षेत्र से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े लगभग 1.6 करोड़ लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।

उद्योग की मांगें

संकट से निपटने के लिए उद्योग संगठनों ने सरकार के सामने कुछ तत्काल मांगें रखी हैं।पहली मांग यह है कि रेस्टोरेंटों को “आवश्यक सेवा” (Essential Service) का दर्जा दिया जाए ताकि ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।दूसरी मांग यह है कि तेल कंपनियों को कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति बनाए रखने का निर्देश दिया जाए, भले ही उसे सीमित या राशनिंग के साथ क्यों न करना पड़े।

कालरा ने कहा कि यदि उत्पादन कम हुआ है तो उद्योग राशनिंग को समझ सकता है, लेकिन आपूर्ति को पूरी तरह शून्य करना स्वीकार्य नहीं है।उन्होंने सरकार से एलपीजी के आयात बढ़ाने और घरेलू उत्पादन में तेजी लाने की भी अपील की। उनके अनुसार एक बड़ी तेल कंपनी ने संकेत दिया है कि वह उत्पादन क्षमता में लगभग 15 प्रतिशत तक वृद्धि कर सकती है, जिससे अल्पकाल में आपूर्ति स्थिर हो सकती है।

आगे का रास्ता

कठिन परिस्थितियों के बावजूद दोनों उद्योग नेताओं ने उम्मीद जताई कि स्थिति अंततः सुधरेगी। कालरा ने कहा कि हॉस्पिटैलिटी उद्योग बेहद लचीला है और संकटों से उबरने की क्षमता रखता है।उनके अनुसार रेस्टोरेंट उद्योग दुनिया में सबसे अधिक जोखिम वाले व्यवसायों में से एक है, इसलिए इसमें काम करने वाले लोग स्वभाव से आशावादी होते हैं।हालांकि एडी सिंह ने चेतावनी दी कि यदि यह संकट महीनों तक जारी रहा तो बड़े पैमाने पर रेस्टोरेंट बंद होने की नौबत आ सकती है।

फिलहाल भारत भर के रेस्टोरेंट संचालक स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि ईंधन आपूर्ति जल्द सामान्य हो जाएगी, ताकि यह संकट और न बढ़े।

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