
पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के संस्मरण पर संसद में टकराव, क्या है ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’?
पूर्व थलसेनाध्यक्ष एम एम नरवणे की संस्मरण Four Stars of Destiny पर राहुल गांधी के सवालों से लोकसभा में हंगामा हुआ। आखिर क्या है यह पूरा मामला।
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के संस्मरण फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी 2 फरवरी को बजट सत्र के दौरान लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस का केंद्र बन गई। वर्ष 2021-22 के दौरान सेना प्रमुख रहे नरवणे की इस पुस्तक के मुद्दे को जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उठाने की कोशिश की, तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह सहित सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कड़ा विरोध किया।
राहुल गांधी जब एक प्रकाशित मैगजीन स्टोरी के जरिए नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के अंश पढ़ने लगे, तो अध्यक्ष और बीजेपी नेताओं ने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की। अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि वे किसी व्यक्ति को निशाना नहीं बना सकते, केवल नीतियों पर बात कर सकते हैं। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी के चरित्र और देशभक्ति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
क्यों विवादों में है नरवणे की आत्मकथा?
सवाल यह है कि सरकार के लिए यह किताब इतनी संवेदनशील क्यों है। बताया जाता है कि यह अप्रकाशित आत्मकथा जनरल नरवणे के कार्यकाल के दौरान लिए गए अहम सैन्य और नीतिगत फैसलों का विवरण देती है। इनमें 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ भारत का तनावपूर्ण सैन्य गतिरोध और अग्निपथ भर्ती योजना की रूपरेखा से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
इस किताब को लेकर आधिकारिक स्तर पर समीक्षा चल रही है। भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय इसके कंटेंट की जांच कर रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस को निर्देश दिया गया है कि समीक्षा पूरी होने तक किताब के अंश या सॉफ्ट कॉपी जारी न की जाए। यह आत्मकथा जनवरी 2024 में प्रकाशित होने वाली थी, हालांकि 2023 में पीटीआई ने इसके कुछ अंश रिपोर्ट किए थे।
लद्दाख गतिरोध से जुड़े अहम खुलासे
इस आत्मकथा का सबसे अहम खुलासा पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत-चीन टकराव से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नरवणे ने 31 अगस्त 2020 की रात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से हुई बातचीत का जिक्र किया है, जब चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने रेचिन ला दर्रे पर टैंक और सैनिक तैनात कर दिए थे, जिससे हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए थे।
किताब के अनुसार, राजनाथ सिंह ने नरवणे से कहा था—“जो उचित समझो, वह करो।” नरवणे लिखते हैं कि उस रात घटनाक्रम के बाद रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के बीच लगातार फोन कॉल्स हुए। उन्होंने लिखा, “मैंने रक्षा मंत्री को स्थिति की गंभीरता बताई। उन्होंने कहा कि वे मुझे दोबारा फोन करेंगे और लगभग रात 10:30 बजे उन्होंने ऐसा किया।”
नरवणे आगे लिखते हैं कि उस कॉल के बाद उनके दिमाग में सैकड़ों विचार कौंध गए। “मुझे पूरी जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। मैंने गहरी सांस ली और कुछ मिनटों तक चुपचाप बैठा रहा। दीवार घड़ी की टिक-टिक के अलावा सब शांत था,” उन्होंने लिखा।
अग्निपथ योजना पर क्या कहती है किताब?
आत्मकथा में जून 2022 में लागू की गई अग्निपथ भर्ती योजना का भी जिक्र है। नरवणे के मुताबिक, सेना की शुरुआती राय यह थी कि 75 प्रतिशत जवानों को सेवा में बनाए रखा जाए और 25 प्रतिशत को रिहा किया जाए, जबकि अंतिम योजना में केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी रखने का प्रावधान किया गया।
उन्होंने प्रस्तावित 20,000 रुपये मासिक वेतन पर भी आपत्ति दर्ज की थी। नरवणे लिखते हैं कि यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं था। हम ऐसे प्रशिक्षित सैनिक की बात कर रहे थे, जिससे देश के लिए जान देने की अपेक्षा की जाती है। एक सैनिक की तुलना किसी दिहाड़ी मजदूर से नहीं की जा सकती। बाद में यह वेतन बढ़ाकर 30,000 रुपये किया गया।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक सूत्र ने यह भी बताया कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों में सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को बिना अनुमति सामग्री प्रकाशित करने से रोका गया है, लेकिन ये नियम स्पष्ट रूप से रक्षा सेवाओं पर लागू नहीं होते।इस तरह जनरल नरवणे की आत्मकथा न केवल सैन्य फैसलों को लेकर अहम खुलासे करती है, बल्कि संसद के भीतर भी बड़े राजनीतिक टकराव की वजह बन गई है।

