
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ विवाद में घिरी, चर्चा में रक्षा मंत्रालय की चुप्पी
जनरल एम एम नरवणे की अप्रकाशित किताब पर विवाद गहराया हुआ है। गलवान और अग्निवीर मुद्दों पर सवाल के बीच रक्षा मंत्रालय की चुप्पी से पारदर्शिता पर बहस तेज हो चुकी है।
दो साल बहुत लंबा समय होता है… फैसला या तो इस तरफ होना चाहिए या उस तरफ, लेकिन इसे यूं अधर में नहीं लटकाया जा सकता। मेजर जनरल संजय सोई (सेवानिवृत्त) की यह स्पष्ट टिप्पणी पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर बढ़ती बेचैनी को दर्शाती है। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले प्रकाशित होने वाली यह पुस्तक अब तक जारी नहीं हुई है, जिससे राजनीतिक विवाद और संस्थागत असहजता पैदा हो गई है।
‘एआई विद संकेत’ कार्यक्रम में द फेडरल ने रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल डॉ. यश मोर (सेवानिवृत्त) और मेजर जनरल संजय सोई (सेवानिवृत्त) से बातचीत की।
चुप्पी पर बहस
मुद्दा सिर्फ किताब की सामग्री का नहीं है, बल्कि विवाद के बीच जनरल नरवणे की चुप्पी भी केंद्र में है। जब अप्रकाशित संस्मरण के अंश सार्वजनिक डोमेन में आकर राजनीतिक हलचल पैदा करें, तो क्या पूर्व सेना प्रमुख की सोची-समझी चुप्पी पर्याप्त है?
मेजर जनरल सोई ने नरवणे के संयम का बचाव किया। उन्होंने कहा कि चुप्पी का मतलब है कि एक सैनिक के रूप में मैं किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ना चाहूंगा। उनके अनुसार, जब तक किताब आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं होती, तब तक उस पर चर्चा का अधिकार किसी को नहीं है। उन्होंने नरवणे के रुख को गरिमापूर्ण और सैन्य परंपरा के अनुरूप बताया।
अग्निवीर योजना और गलवान संकट
मेजर जनरल मोर ने व्यापक दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख का पद अत्यंत सम्मानित और ऐतिहासिक होता है। उनके अनुसार, संस्मरण केवल व्यक्तिगत कथाएं नहीं होते, बल्कि राष्ट्रीय दस्तावेज होते हैं। “किताब का 95 प्रतिशत हिस्सा उनके जीवन से जुड़ा होगा, जिसे देश के हर नागरिक, खासकर रक्षा अभ्यर्थियों को पढ़ना चाहिए। हालांकि, लीक हुए अंशों में जिन दो मुद्दों का उल्लेख बताया जा रहा है, वे अहम हैं—अग्निवीर योजना और गलवान संकट। अग्निवीर योजना पर मोर ने कहा कि कथित तौर पर नरवणे को 25 प्रतिशत स्थायी नियुक्ति मॉडल पर आपत्ति थी।
गलवान को लेकर उन्होंने गहरी चिंता जताई। सार्वजनिक डोमेन में बहुत कम जानकारी है। क्या हुआ था? कर्नल बी. संतोष बाबू और 19 अन्य जवानों ने अपनी जान क्यों गंवाई? उनके अनुसार, यह राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन का विषय है।
सुरक्षा की लाल रेखाएं
मेजर जनरल सोई ने लेखन के महत्व को स्वीकार किया, लेकिन सीमाओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशनल योजनाएं, रणनीतियां, तैनाती पैटर्न, खुफिया सूचनाएं जैसी बातें रेड फ्लैग होती हैं और उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि दो साल की देरी अत्यधिक है। कहीं कुछ जोड़ना-घटाना हो सकता है, लेकिन फैसला लेना जरूरी है। अनिर्णय सबसे बुरी स्थिति है। उनके अनुसार, संवेदनशील अंशों को संपादित कर समाधान निकाला जा सकता था।
निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता
मोर ने 1999 के कारगिल युद्ध के बाद हुए सुधारों का उदाहरण दिया। कारगिल के बाद रक्षा खुफिया एजेंसी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जैसे पदों की स्थापना हुई। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या गलवान संकट पर ऐसा कोई संस्थागत अध्ययन हुआ? उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी सैन्य रहस्य उजागर करने की मांग नहीं कर रहा, बल्कि उच्च रक्षा प्रबंधन और नागरिक-सैन्य निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता है।
संस्थागत असहजता
चर्चा में यह भी सवाल उठा कि जिस रक्षा मंत्रालय ने चीन सीमा संकट के दौरान नरवणे पर भरोसा किया, वही मंत्रालय उनकी किताब को मंजूरी देने में हिचक क्यों दिखा रहा है। मोर ने नरवणे की ईमानदारी को गोल्ड स्टैंडर्ड बताया और कहा कि जिम्मेदारी व्यक्ति से अधिक प्रणाली की है। उन्होंने संस्थाओं के भीतर असहमति और आलोचना को स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया। सोई ने भी माना कि किताब को अनिश्चितकाल तक रोके रखना संस्थागत विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।
प्रकाशक की भूमिका
चर्चा में प्रकाशक पेंगुइन की भूमिका पर भी सवाल उठे। मोर ने पूछा कि जब किताब को आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली थी, तो उसके अंश मीडिया तक कैसे पहुंचे? हालांकि, यह भी कहा गया कि समीक्षा के लिए अग्रिम प्रतियां भेजना प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
राष्ट्रीय हित और चर्चा की जरूरत
यह सवाल भी उठा कि क्या जनरल नरवणे का कुछ मुद्दों पर खुलकर बोलना राष्ट्रीय हित के खिलाफ होगा? मोर ने संतुलित जवाब दिया यह फैसला स्वयं नरवणे का है, लेकिन देश को अंततः इन सवालों का सामना करना होगा ताकि संस्थाएं मजबूत हो सकें। गलवान के दौरान टैंकों की तैनाती और युद्ध जैसी स्थिति ने भारत-चीन सैन्य संबंधों में ऐतिहासिक बदलाव लाया। भविष्य की तैयारी के लिए उस दौर को समझना आवश्यक है।
मनोबल का प्रश्न
पूरी बहस के केंद्र में मनोबल का मुद्दा भी रहा। आम नागरिक भले ही राजनेताओं या पत्रकारों पर संदेह करें, लेकिन वर्दीधारी सैनिकों के प्रति सम्मान कायम है। यदि किसी पूर्व सेना प्रमुख को अधर में लटका हुआ दिखाया जाता है, तो इससे सहानुभूति और संस्थागत प्रक्रिया पर सवाल दोनों खड़े हो सकते हैं। दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखे कि यह विवाद अनावश्यक रूप से बढ़ गया है। उन्होंने परिपक्वता के साथ मामले को सुलझाने और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करते हुए पुस्तक को गरिमापूर्ण ढंग से प्रकाशित करने की जरूरत बताई।
फिलहाल जनरल नरवणे ने केवल एक संक्षिप्त ट्वीट के जरिए किताब की स्थिति स्पष्ट की है। आगे वे बोलेंगे या नहीं, यह अनिश्चित है। लेकिन यह स्पष्ट है कि अब यह बहस केवल एक संस्मरण तक सीमित नहीं रही। यह पारदर्शिता, संस्थागत विश्वास और लोकतंत्र में सुरक्षा व जवाबदेही के संतुलन का सवाल बन चुकी है।

